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5 May 2022 · 1 min read

आसमान का विलाप

लग रहा है आज गुस्से में वो
जो यूं बिजलियां गिरा रहा है
टूटा है शायद दिल उसका भी
जो ये रूप हमको दिखा रहा है

हम समझ बैठें है बारिश जिसे
लगता है वो आंसू बहा रहा है
आसमां को पहले ऐसे नहीं देखा
कोई तो गम है जो छुपा रहा है

ओढ़ लिया है धुंध का हिजाब उसने
हमसे अपना चेहरा छुपा रहा है
हम भी रग रग से वाकिफ है उसकी
जाने क्या सोचकर आंसू बहा रहा है

देखकर ये हालत उसकी
ये पहाड़ भी अब कराह रहा है
सूख गए है आंसू उसके भी
जो नदी से मिलने जा रहा है

कोई गुस्ताखी हुई तारों से या
चांद उसे धोखा दे रहा है
जो निकले है आज आंसू उसके
कोई तो उसे दगा दे रहा है

कसूर नहीं है चिड़िया का कोई
क्यों उसका घोंसला गिरा रहा है
ये फितरत तो इंसान की है
फिर आसमां क्यों आज़मा रहा है

है गुस्सा इतना कि आज घर, मिट्टी
सबकुछ बहाकर ले जा रहा है
हर जगह फैला दी चीखो पुकार
हमको ये कैसा मंज़र दिखा रहा है

संभल जा अब तो ऐ आसमां
क्यों इतना कहर बरपा रहा है
रूठा है तुझसे जो चांद आज
वही तुमको मनाने आ रहा है

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