नोटबंदी के दौर में 17 दिसंबर 2016 को लिखित एक गीतिका
नोटबंदी के दौर में 17 दिसंबर 2016 को लिखित एक गीतिका
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ढलती शाम होते हैं (गीतिका)
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(1)
जो फँसते लाइनों में हैं, वो बस जन आम होते हैं
बड़े लोगों के सारे काम ढलती शाम होते हैं
(2)
लिखीं हैं सिर्फ कागज पर सुनहरी घोषणाएं सब
अभी भी चोर-दरवाजों से काले काम होते हैं
(3)
सभी गलती हमेशा सिर्फ चोरों की नहीं होती
सुना है पहरेदारों में भी कुछ बदनाम होते हैं
(4)
समूचा देश रिश्वत के हवाले हो चुका समझो
यहाँ अब रिश्वतों के भी सुनिश्चित दाम होते हैं
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रचयिता : रवि प्रकाश ,बाजार सर्राफा
रामपुर (उत्तर प्रदेश)
मोबाइल 99976 15451