मेरी जवानी है।
सर्द रात है, चुप आसमान,
तारों में भी है कोई गुमान।
चलती सड़कों पर कदम मेरे,
जैसे ढूंढ रहे हों भूले अरमान।
ये आवारगी, ये तन्हाई का सफर,
हर सांस में उलझा एक नया कहर।
नींद खोई आँखों से दूर कहीं,
जैसे दिल में हो कोई अरमान महीन।
अगर होते अपने शहर में तो,
छत पर खड़े चाँद को देखते।
अपने घर की वो गरम रजाई,
माँ के हाथों की खुशबू बसाई।
बाबा के किस्सों की वो मिठास,
बहन की हंसी का अनोखा एहसास।
दीवारें गवाह होंगी मेरी कहानी की,
अभी जहां रहती मेरी जवानी है।
©अभिषेक पाण्डेय अभि