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19 Jun 2021 · 1 min read

*मुक्तक* (सुबह-सबेरे)

“मुक्तक” (सुबह-सबेरे)
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सुबह-सबेरे, तुम उठना सीखो।
पूरब की तुम, नित लाली देखो।
घूम फिर ताजी हवा अब खाओ,
खेतों की वो हरियाली देखो।

स्वरचित सह मौलिक
…. ✍️पंकज “कर्ण”
…………. कटिहार।

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