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5 Jun 2021 · 1 min read

पावस बहुत रुलाती हो

पावस बहुत रुलाती हो,
तरसा तरसा कर आती हो….

पीली चमड़ी वाली गर्मी,
होजाती जब बहुत अधर्मी
झुलसाती धरती का आँचल
बिन पानी रीते सब बादल ।

पावस हड़काओ सूरज को
रोके आग उगलते मद को
कहो मेघदूतों से जाकर
बांधे धूप सूर्य का आगर ।

इधर उधर बादल पागल से
बिना वस्त्र घूमें बालक से
सूख रहे नदियों के आँचल
सब कूपों के सूख रहे तल |

तेरा आना टलता जितना
सूखे का भय पलता उतना
रुण्ड-मुण्ड वृक्ष लतिकाएं
खड़े निरीह से मुख लटकाएं ।

पावस बहुत रुलाती हो,
तरसा तरसा कर आती हो….

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