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15 Jun 2020 · 2 min read

मानवाधिकार कार्यकर्ती इरोम शर्मिला चानू

नवंबर 2000 से लेकर 9 अगस्त 2016 तक भूख हड़ताल रहना एक “अजीबो-गरीब” रिकॉर्ड है पर उन्होंने यह ‘आमरण-अनशन’ रिकॉर्ड बनाने के लिए नहीं किये थे बल्कि ‘सशस्त्र बल विशेष शक्तियां अधिनियम’ हटाने के लिए किये थे ? आप सोच रहे होंगे भारत में इतने मेहनत के बाद कोई कानून या अधिनियम बनते है और कोई इसे हटाने के लिए “लगातार 16 वर्षों” से भूख हड़ताल पर है ! कोई पागल ही होगी, आप भी जानते हैं– यह पागल कौन है ? पर मैं इस मणिपुरी “44 वर्षीया” (अविवाहिता!) को एक सच्चे और अहिंसक अर्थों में महिला “महात्मा गांधी” कहूँगा, क्योंकि ’21 वीं सदी’ में जहाँ हिंसा इतनी बढ़ गयी है वहां एक सामान्य सी महिला ने इतने वर्षों तक असामान्य कार्य कि भूखी रहकर उक्त क़ानून (पूर्वोत्तर राज्यों के विभिन्न हिस्सों में लागू इस कानून के तहत सुरक्षा बलों को थोड़ी-सी संशय पर ही किसी को भी देखते ही गोली मारने या बिना वारंट के जबरिया किसी के घर घुसकर गिरफ्तार करने या फिर इन सबके आर में महिला के साथ छेड़- छाड़ व बलात्कार को अंजाम देने की खुली छूट हासिल थी, से संबंधित अधिकार वाला क़ानून के विरुद्ध इरोम शर्मिला चानू ने इम्फाल के ‘जस्ट पीस फाउंडेशन’ गैर सरकारी संगठन के बैनर तले अनशन शुरू की व भूख हड़ताल करती रहीं। सरकार ने शर्मिला के इस प्रयास को ‘आत्महत्या’ का प्रयास माना और फिर गिरफ्तार कर ली जाती रही । चूंकि यह गिरफ्तारी एक साल से अधिक नहीं हो सकती और उनकी भूख- हड़ताल लम्बी होती चली गयी, अतः हर साल उन्हें रिहा करते ही दोबारा गिरफ्तार कर लिया जाता था।नाक से लगी एक नली के जरिए उन्हें तरल पदार्थ दिया जाता था तथा इस के लिए पोरोपट-इम्फाल के सरकारी अस्पताल के एक कमरे को अस्थायी जेल बना दिया गया था । वे गांधीजी के मार्ग को चुनी । लगातार 16 वर्षों तक अनशन से उनकी शारीर क्षीणतम होती चली गयी और अपने व्यक्तिगत अरमानों को तिलांजलि भी दी, परंतु सरकार पसीजे भी नहीं । जब उन्हें लगा कि केजरीवाल की भाँति राजनीति चुनकर सदन पहुंची जाय, लेकिन ‘मणिपुरी आयरन लेडी’ के इस निर्णय से जनता क्षुब्ध है, जनता उनके विचारों से सहमत नहीं हैं और वहां की जनता खुले तौर उनकी साथ नहीं दे रहा है । जनताओं को उनके व्यक्तिगत सपने से कोउ मतलब नहीं है, मानो जनता उन्हें हमेशा अनशनकारी माहिला के तौर पर ही देखते रहना ही चाहते थे की वे कोई देवी है…. और जनता को उनकी अरमानों से क्या मतलब है?

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