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14 Jun 2020 · 1 min read

सिसकता बचपन

सिसकता बचपन
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सपने आंखों से देखती नन्ही परी
जिंदगी ढूंढ़ती गली-गुचों में कली
आशाओं का पर लिये फुदकती चली
उटकेरती स्वच्छ किये कुड़ों में जिंदगी
उठाये बोझ नन्हे कंधो पर पेट पालती नन्ही परी।।

मलिन वस्त्रों में लिपटी वो नन्ही परी
केश उलझे हुए मुख झुर्रियों सी पड़ी
वो बचपन को खोकर सड़कों पर पड़ी
उस शर्मो हया से दो जून की रोटी बड़ी
उठाये बोझ नन्हे कंधों पर पेट पालती नन्ही परी ।।

बढ़ते नन्हे कदम हर मौसम को भेदती
मलबों में अपना रोजी-रोजगार ढूंढती
उठाये बोझ कुटुंब का दिन रात खटती
वो उम्र दर उम्र जीवन की खाई पाटती
उठाये बोझ नन्हे कंधों पर पेट पालती नन्ही परी।।

स्कूलों के दिन कुडों करकट में बितानी पड़ी
पेट की खातिर अपने जीवन की कुर्बानी बड़ी
अच्छे दिन की आस में टूटती सांसों की लड़ी
कब तक भटके इन गलियों में है लाचारी बड़ी
उठाये बोझ नन्हे कंधों पर पेट पालती नन्ही परी ।।

“”””””””सत्येन्द्र प्रसाद साह(सत्येन्द्र बिहारी)”””””””””””

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