Sahityapedia
Sign in
Home
Your Posts
QuoteWriter
Account
11 Jun 2020 · 1 min read

मेरी मुझसे छनती है

जब जब मौसम से ठनती है।
अपनी किस्मत बनती है।

आहिस्ता बढ़ पाती गाड़ी,
हवा खिलाफत चलती है।

कम रफ्तार बचाती ठोकर,
शाम सलामत ढलती है।

वर्षा चलती छतरी ताने,
गर्मी पंखा झलती है।

सर्दी देती धूप गुनगुनी,
दिल को ठण्डक मिलती है।

कुछ न पहुँच में अपनी लेकिन,
चीज जरूरी मिलती है।

सबको सबसे शिकवा ही है,
किससे किसकी निभती है।

रूखी दुनियाँ क्या कर लेगी,
मेरी मुझसे छनती है।

संजय नारायण

Loading...