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10 Jun 2020 · 1 min read

सोचें या कहें ।

तुम्हें सोचे या गजलें कहे कोई
मिसरा , विसरा शेर कहे कोई ।

दिल आजकल तन्हा रहता है
इसमें आकर भी तो रहे कोई ।

दर्द बेहिसाब देते हो यार तुम
इतना भी दर्द कैसे सहे कोई ।

लहरें तेज है समंदर के अभी
इसमें भला कैसे बहे कोई ।

– हसीब अनवर

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