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10 Jun 2020 · 1 min read

गुमां है ।

उसे अपनी अदाकारी पे इतना गुमान है
गर वो इंसान है तो क्यों नही इंसान है ।

हर कोई अपने दर्द लिए घूम रहा है यहाँ
ये बस्तियां अब क्यों इतना परेशान है ।

तुम्हारी अदब , तुम्हारी बातें बता रही है
हमसे मिलता जुलता ही खानदान है ।

अंधेरों में ज़िन्दगी पूरी गुजार दी हमने
हमारे घर मे ना कोई रोशनदान है ।

मत मारो उसे आख़िर गलती क्या है उसकी
वो इंसान जरूर है मगर बदजुबान है ।

हमारे ही लफ्ज़ गुनगुना रहे हो आजकल
तुम्हारे मुँह में भी क्या हमारी जुबान है ।

घूट घूट कर जी रहे है क्यों यहा ‘हसीब’
ये दुनिया अब दुनिया नही शमशान है ।

– हसीब अनवर

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