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3 Jun 2020 · 1 min read

क्या मानवता मर गयी है

स्तब्ध हू निशब्द हू
देखकर माँ तेरे मानव कि दानवता
कोई कैसे छीन सकता है माँ
निवाला किसी के पेट का

शर्मिंदा हू, आहत हू
ज़ब सुनता हू करनी तेरे इंसान की
जो मरो पर तो रोता है लेकिन माँ
आज छीन लिया बेज़ुबान की जिंदगी

पीड़ा है, वेदना है
सुनता हू माँ ज़ब तेरे इन इंसानों कि करतूतों को
क्षडिक सा सहम जाता हू
देखकर अमानवता भरी तेरी नस्लों को

रूठा हू, टुटा हू
देखकर लीला ही हैवानो कि
आस लगाए बैठा हू माँ तेरे से
उठा ले माँ मौत के इन सौदागरों को

खुश हू, अचंभित हू
तूने एक छोटी सी विपदा डाली है जो
दुम दबाकर बैठ गए है सब
देख कर तेरी एक छोटी सी लीला को

आशा है विश्वास है
कब तक तोड़ेगे मानवता को ये हैवान
माँ तू ऐसे ही प्रकट होते रहना
ताकि बची रहे मानवता कि मान

मातु वन्दे मातु वन्दे
कृपा है तेरी सबसे महान
छोड़ा तूने एक छोटा सा अस्त्र
तभी आज बच रही है प्रकृति कि जान
ऐसे ही माँ कर तू कोई खेल ऐसा
पछताये गज कि लेने वाला जान

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