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31 May 2020 · 1 min read

पद का मद

पद के मद में चूर हुए
आदत से मजबूर हुए

पास गए जब गैरों के
तब अपनों से दूर हुए

भूल गए सेवा करना
जब से बड़े हजूर हुए

आसमान पर नजरें है
वो इतने मगरूर हुए

चूहों तक से डरते थे
आज बड़े वे शूर हुए

महफ़िल के चेहरे सारे
सुबह तलक बेनूर हुए

घरों में थे मर्यादा में
बाहर बे- शऊर हुए

बचपन के उदारवादी
उम्र बढ़ी तो क्रूर हुए

छोड़ दिये जितने दुश्मन
बाद में सब नासूर हुए

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