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30 May 2020 · 1 min read

वर्तमान

जिंदगी का आलम वही है बस हूर बदल गए है
पेड़ो की डलिया वही है खजूर बदल गए है
कौन सुनता है कम्बख्त बेज़ुबाँ की
राजनीत वही है बस हुज़ूर बदल गए है

सुना है लोग छूते थे पैर कभी जिसके
आज उनके मगरूर बदल गए है
इंसा सभी वही है इस जहाँ मे
बस अपने अपने सुरूर बदल गए है

सोचता हू कभी अकेला तन्हा होकर
जिया हू जिसके लिए रातें काटकर
ना जाने क्या दिन आ गए है आज
हम वही है लेकिन उनके नूर बदल गए है

कहना कुछ नहीं है जहाँ मे अब तो
देखता हू जिंदगी का आयाम क्या होता है
अब थोड़ा ज़ब हम बदलने क्या लगे
वह बोले लगता है भाई आप के गुरुर बदलने लगे है

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