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29 May 2020 · 1 min read

बरसात करनी है

——— ग़ज़ल———–
221-2121-1221-212

ए अब्र तू ठहर जा मुलाकात करनी है
सूखा पड़ा है सहरा ये बरसात करनी है

अरमान कितने दिल में रखे हैं संभाल कर
जब भी मिलेंगे उनसे ये सौगात करनी है

बातों में ही कमी थी या चेहरा खराब था
कुछ तो बताओ हमको भी अब बात करनी है

अब कौन कैसा है यहाँ किससे है वास्ता
फिर क्यों हमें उनसे मुसावात करनी है

किसका गुनाह था यहाँ किसको सज़ा मिली
अब इसकी आपको यहाँ इस्बात करनी है

दो पैसे की कमाई को आए हैं शहर में
मेहनत उन्हें तो यूँ ही दिन रात करनी है

कितना बदलना है बता ‘सागर’ तेरे लिए
या ज़िदगी हमारी यूँ खैरात करनी है

#सागर

अब्र – बादल
मुसावात – बराबरी,समानता
इस्बात- साबित करना

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