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28 May 2020 · 1 min read

निःशब्द

आओ थोङा निःशब्द हो जाए
शब्दों ने जो घाव दिए हैं
मौन का उन पर मरहम लगाएं।

शब्द फेंके थे किसी ने
जहर बुझे तीरों के जैसे
क्यों रख लिए सहेज कर मन में?
किताबों में रखे कोई गुलाब जैसे

कर दो क्षमा जो कहा सुना
मत ढोओ अब पीङा का दावानल
धुल जाने दो सब किल्बिष
बरसे आंसू का गंगाजल

भीतर उबलता लावा भी
अब शान्ति का अभिदान मांगे
कर दो विलय सब शब्द मन से
निःशब्द अपना स्थान मांगे।।

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