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26 May 2020 · 1 min read

प्यार

इन्कार इन्कार बस इन्कार करती हो तुम.
क्यों मेरा जीना दुश्वार करती हो तुम.

तुम्हारे लिए मैने तेरी गलियों की खाक छानी.
ऐसा क्या है जो इकरार नही करती हो तुम.

कुछ तो गुस्ताखी जरुर हुई होगी मुझसे.
क्यों नही मेरा प्यार स्वीकार करती हो तुम.

है अगर प्यार कुछ तुम्हारे भी दिल में.
तो क्यों नही इजहार करती हो तुम.

दीप की दुआ जो हुई कबूल तुम्हें मांग लेने की.
देखेंगे उस खुदा को कैसे इंकार करती हो तुम.

✍️✍️…दीप

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