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25 May 2020 · 1 min read

#रुबाइयाँ// तन्हाई

#तन्हाई

कविता मेरे साथ चले तो , जाती है हार तन्हाई।
लोग बहाते हैं आँसू भी , करती है वार तन्हाई।
भीड़ संग चलकर पाते हैं , कुछ ख़ुशियों की सौग़ातेंं;
मैं कवि हूँ मेरी तो है , यह सच्ची यार तन्हाई।

औरों को तो रंक बनाती , पर राजा मुझे तन्हाई।
मुस्क़ान मौन भर सृजन करूँ , बजती मन में शहनाई।
अंतर में भावों के झरने , कर कलकल ध्वनि बहते हैं;
तान यही कविता की बनते , करने क्षण-क्षण सुखदाई।

(C)आर.एस.’प्रीतम’

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