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23 May 2020 · 1 min read

बिटिया

थाम अपनी हथेलियों पर तर्जनी मेरी,
कहती बिटिया मैं जीने का आधार हूँ ।

किलकारियों की गूंज से , मुस्कुराहट के भाव से,
कहती बिटिया मैं खुशियों का कोषागार हूँ ।।

नींद के झौके में या भूख की सिसकियों में,
कहती बिटिया मैं जीवन चक्र का प्रकार हूँ।

ऋतुएं बसती हैं सीरत में जिसके ,
कहती बिटिया मैं ही पतझड़ -सावन, मैं ही बसंत-बहार हूँ।

मैं मधुर संगीत हूँ, मैं कलरव हूँ,
कहती बिटिया मैं रस छंद अलंकार हूँ।

मैं प्रकृति हूँ, मैं संस्कृति हूँ,
*कहती बिटिया मैं मानव पर उपकार हूँ।

रिश्ते- नातो की जननी मैं,
कहती बिटिया मैं खुद में ही परिवार हूँ।

नन्हें पैरों की अठखेलिया और बंद चक्षुओं से,
कहती बिटिया ” माँ ” मैं तेरा ही अवतार हूँ।

थाम अपनी हथेलियों पर तर्जनी मेरी,
कहती बिटिया मैं जीने का आधार हूँ ।।

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