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20 May 2020 · 1 min read

ग़ज़ल

बाहर से सब सुनहरा है
भीतर दुख इक गहरा है…..

महफिल महफिल हँसता जो
दिल मे लेकर सहरा है………

बदन उमर की गाड़ी से निकला
दिल सोला नुक्कड़ पे ठहरा है……

मन उड़ता-फिरता पंछी है…..
जिस्म लगे इक पिंजरा है………

ख़्वाब भी कैसे आएँ अब
नींदों पर भी पहरा है……..

उसको दिखता,न वो सुनता है
पापी जग अंधा, बहरा है……..

#निकीपुष्कर#

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