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20 May 2020 · 2 min read

यह सियासत नही तो और क्या है?

सड़कों पर चलने को मजबूर ये मजदूर,
भूख और प्रयास से व्याकुल हुए ये मजदूर,
शासन,प्रशासन की उपेक्षा से आहत ये मजदूर,
व्यवस्था के कुप्रबंधन से निराशा में ये मजदूर,
हजारों मिल पैदल चल कर घर को जाते ये मजदूर,
दुर्घटनाओं में घायल हो जाते ये मजदूर,
बे मौत ही मारे जाते ये मजदूर,
जब कभी अपनी उपेक्षा से आहत हो जाते हैं,
तब कभी कभी ये अपनी उपस्थिति दिखाते हैं,
तो निरंकुश प्रशासन से पीटे जाते हैं,
आक्रोश में आकर उपद्रव भी कर जाते हैं,
होते हैं स्वंयम भी घायल,
और पुलिस कर्मियों को भी घायल कर जाते हैं,
कभी पुलिस की डर से भागते हैं,
तो रेल की पटरियों पर जाते हैं,
कभी खेत खलिहानों से होकर गुजरते हैं,
तो कभी नदी, नालों को पार कर के जाते हैं,

इनके हालातों पर क्या पसीजे हैं हम,
शासकों की उपेक्षा क्या अभी भी है कम,
इन्हें देखकर तो विधाता की भी आंखें ना हुई नम,
पर देखते ही बनता है,इनका हौसला,इनका दम।

चलो कुछ तो लाज कांग्रेसियों को आई,
उन्होंने इसके लिए आवाज उठाई,
रेलों को चलाकर इन्हे घर भेजो भाई,
तब बड़ी देर बाद शासकों को होस आई,
और तब उन्होंने कुछ ट्रैने चलवाई,
लेकिन किराये के भाड़े पर नियत डूबाई।

यहां पर भी कांग्रेसियों ने पांसा फैंका,
मजदूरों के किरायों को देने का दावा ठोका,
तब अपने रेल मंत्री ने यह कहलवाया,
पिच्चासी प्रतिशत का तो हम दे रहे हैं किराया,
लेकिन मजदूरों ने तो पोल, पट्टी खोल कर रख दी,
जब उन्होंने किराया अदा करने की बात कह दी,
सरकार को यह पसंद नहीं आया था,
अब उन्होंने रेलों को कम करके दिखाया था।

मजदूरों का सब्र तो अब टूट गया था,
सरकारों पर उनका भरोसा ना रहा था,
वह अब निर्भीक होकर घरों को चल पड़े थे,
राह में तो अभी कितने ही अवरोध खड़े थे ,
कोई पैदल यात्रा ना करें,यह फरमान सुनाया,
लेकिन व्यवस्था के नाम पर कुछ करके ना दिखाया।

अब फिर कांग्रेस की ओर से यह प्रस्ताव आया,
तुम हमें स्वीकृति दे दो,हम बसें चलाकर लोगों को भेजेंगे,
सरकार को इस प्रस्ताव पर सियासत दिखाई दिया,
उन्होंने इसके लिए बसों की सूची को मंगवाया,
और उसमे कुछ नंबरों को सही नहीं पाया,
साथ ही इसके यह ऐलान कर दिया,
फर्जी तरीके से कांग्रेस ने सरकार को गुमराह किया,

लेकिन तब भी, लगभग नौ सौ बसों को सही ठहराया गया,
फिर भी बसों को चलाने का आदेश नहीं आया,
मजदूर तो इनके चक्रव्यू में फंसे हुए हैं,
हजारों की संख्या में स्टेशनों पर ही अटके हुए हैं,
ये सियासत पर सियासत कर रहे हैं,
वहां मजदूर इनकी सियासत में उलझे हुए हैं।
यह सियासत नही तो और क्या है?
सियासतदानों की सियासत भी एक कला है।।

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