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19 May 2020 · 1 min read

विवशता

हुईं विपरीत शुभ घड़ियाँ, गमों के मेघ छाये हैं।
विवशता हो गयी ऐसी,सभी पर भय के साये हैं।
हजारों मील की दूरी, नहीं वाहन मिले कोई-
बहुत छोटी हुईं राहें, श्रमिक पैदल भी आये हैं।

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