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18 May 2020 · 1 min read

((( एक सिंदूरी शाम )))

जाने क्यों नही अच्छा लगता है अब नाम अपना
तुम ही कोई अच्छा सा नाम दे दो न मुझे ,,

हर सुबह तेरे ही याद शुरुवात होती है मेरी
एक सिंदूरी शाम अपना दे दो न मुझे ,,

अब क्यों किसी ईट-पत्थर के मकां की तलाश करू
अपने दिल में उम्र भर का आराम दे दो न मुझे ,,

दिल को ज़न्नत लगता है तेरा मुझे यू खामोशी से मनाना
इस बार फिर किसी बात पे रूठ जाने दो न मुझे,,

जमाना क्या समझ पायेगा हमारी मोहब्बत को
इसे आखरी सांस तक निभाने का हक़ दे दो न मुझे ,,

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