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16 May 2020 · 3 min read

राहत में आम आदमी कहां पर है?

आधी रात में शुरू हुआ,
ताला बंदी का शोर,
ऐसे ही देखा था,
हमने नोट बंदी का दौर,
आ गई थी अचानक,
ताला बंदी की आफत,
तैयार नहीं था कोई भी,
ना की कभी ऐसी कोई चाहत,
बस एक झटके में,
कर दी आपने अपने मन की,
सोची भी नहीं ,
दूसरे के तन की,
फंस गए कितने ही,
घर से अपने दूर,
आए थे जो अपने घरों से,
होकर कुछ मजबूर,
कोई घुमने को थे आए,
तो कुछ लोग रोजगार पाने को थे आए,
घोषणा होते ही हतप्रभ रह गए,
घर तो जा न सके,
घाट के भी ना रहे,
रुपया, पैसा प्रर्याप्त नहीं,
रहने, खाने का इंतजाम नहीं,
हम निठल्ले तो तीर्थाटन को आए थे,
किन्तु जो रोजी रोटी कमाने को आए थे,
उनकी तो रोजी ही चली गई,
गृह स्वामी भी आशंकित हो गये,
किराया कैसे देंगे,
सोचने लगे,
खाली हाथ यह बैठे हैं,
जो कमाया है,
उससे पेट भर रहे हैं,
तो कहने लगे, यहां रह कर क्या करोगे,
जब तक रुपया पैसा है,
तब तक तो खा लोगे,
फिर उसके बाद क्या करोगे,
क्यों नहीं तुम घर चले जाते,
कुछ दिन वहीं कमा के खाते,
उनको भी इसका अहसास हो रहा था,
वह भी यही सोच रहा था,
सरकारों ने तब तक देर कर दी थी,
खाने पीने की कोई व्यवस्था नहीं की थी,
हतास निरास वह घर को निकल गये,
यूं ही पैदल, पैदल घर को चल पड़े ,
प्रारंभ में तो सरकारें,
देखती रही थी,
लेकिन अब भीड़ बढ़ने लगी थी,
तब,यह कहा जाने लगा,
इससे तालाबंदी का क्या लाभ हुआ,
अब सरकारें हरकत में आई थी,
मजदूरों को रोकने की रणनीति बनाई थी,
खाने का हम इंतजाम करेंगे,
मजदूरों को ऐसे नहीं जाने देंगे,
लेकिन खाने का इंतजाम कम पड़ गया था,
अब मजदूरों का धैर्य खत्म हो गया था,
वह घर को पलायन करने लगे थे,
सरकार अब भी समाधान ना कर पाई,
घर भेजने की व्यवस्था नहीं कर पाई,
अब रोकने को सख्ती दिखा रही थी,
पुलिस के माध्यम से लाठी बरसा रही थी,
किन्तु अब लोगों को रोकना भारी पड़ने लगा था,
यहां, वहां पर मजदूरों का जमावड़ा लगा था,
कोई पैदल चल रहे थे,
कोई साइकिल पर चल रहे थे,
कोई औटो रिक्सा पर निकल रहे थे,
किसी ने ट्रकों का आसरा लिया,
कोई ट्रालौं पर लदा हुआ था,
आए दिन दुर्घटना घटने लगी,
आतुर हो चले मजदूरों की जान गई,
सरकारों की अब किरकिरी हो रही थी,
तब डेढ़ माह बाद, सरकार ने रेल चलवाई,
लेकिन यह भी प्रर्याप्त नहीं हो पाई,
मजदूरों की संख्या करोड़ों में थी,
रेलों में व्यवस्था सैकड़ों में हुई,
श्रमिकों का आवागमन रुक नहीं पाया,
सरकारों को अब होने लगा पछतावा,
धीरे, धीरे, व्यवस्थाओं को बढ़ाना पड रहा,
तालाबंदी में अब कुछ छूट का प्रावधान किया,
साथ ही किया राहत का ऐलान,
जिसका विवरण हो रहा है आम,
यह जो पैकेजे राहत है आया,
इसमें भी हमने अपने को दूर ही पाया,
इस राहत में हम पर नहीं दिखाई दी नजरें इनायत,
नहीं मिल पाई हमें फौरी यह राहत,
हम तो जिस हाल में थे,
उससे भी बदहाल हो गये,
और आपकी निगाह में, जो पहले ही खुशहाल थे,
वह और ज्यादा मालामाल हो रहे,
उनकी दिखाई मासूमियत आपने देख ली,
पर हमारा विलाप आपको सुनाई नहीं दिया,
सब देख रहे हैं, उन्होंने इस दौर में क्या सहा,
और आपने यह नहीं देखा,
हमने इस दौर में क्या क्या नहीं भोग लिया,
उनकी आवाज आप तक आसानी से पहुंच जाती है,
इधर हमारी व्यथा आप तक पहुंच नहीं पाती है,
हमें यह लगता है कि आप उन्हीं के हो गए हैं,
हम तो अब भी, पहले की तरह खाली हाथ ही रह गए हैं।

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