Sahityapedia
Sign in
Home
Your Posts
QuoteWriter
Account
15 May 2020 · 1 min read

ग़ज़ल-221 2121 1221 212

मजबूरियाँ हमें तड़पाती कभी-कभी।
लाचारियाँ फितरत दिखाती कभी-कभी।।

मिलता नहीं कहीं भी मरहम सुन ले ख़ुदा,
मुफ़लिस को भूख बहुत रुलाती कभी-कभी।

उजड़ा चमन तो शाख़ पे पत्ता भी था नहीं,
ये बागबां के दिल को जलाती कभी-कभी।

रिश्ते वही रखो जो ख़ुशी से निभा सको,
टूटे दिलों की चीख डराती कभी-कभी।

हैं हौसले बुलंद तो अब डर हमें कहाँ,
जग जीतने के सपन सजाती कभी-कभी।

कोई न पाप में अब आएगा साथ ही,
करनी ख़ुद बन कर सज़ा आती कभी-कभी।

हमने उसे ही देखा है देखा नहीं ख़ुदा,
माँ की दुआ ही कष्ट मिटाती कभी-कभी।

रंजना माथुर
अजमेर (राजस्थान )
मेरी स्वरचित व मौलिक रचना
©

Loading...