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15 May 2020 · 1 min read

न जाने मुझे ये क्या हो गया है

ना जाने मुझे यह क्या हो गया है
मेरा मानस जाने कहां खो गया है
पुण्य धरा पर मानव मूल्य नित्य घट रहा है
ये कौंन सा परिवर्तन चल रहा है
जो संस्कृति चट कर रहा है
सेवा अब व्यापार बन गई है
कुटिल भ्रष्ट बेईमानों की खूब चल रही है
हत्या लूट बलात्कार चोरी और भ्रष्टाचार
आतंकवाद और माफियाओं से रंगे हुए अखबार
नव बंधुओं के अध जले शव
नेताजी के गले में बड़े-बड़े हार
हांफती जिंदगी दुर्घटनाएं और स्वागत के इस्तहार
पढ़ते-पढ़ते संवेदनहीन हो गया है
मेरा मानस जाने कहां खो गया है
पत्र पत्रिकाएं तो बहुत बढ़ गई हैं
साहित्य संस्कृति छोड़, सुर्ख़ियों में लग गई हैं
नहीं चाहिए सुर्खियां, नहीं चाहिए कथनी और करनी में अंतर वाले कुटिल चेहरे
आधुनिकता का विकृत चेहरा
अरे वावरो ये धर्म धरा है, विश्व आज फिर निहार रहा है
साहित्य संस्कृति त्याग और बलिदानों की खबरें लाओ
उठो बीरो तुम भारत की संतान हो
मेरे सोए मानस को जगाओ, भारत का परचम विश्व में लहराओ

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