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12 May 2020 · 3 min read

पाप की हांडी! फूटने को भरी है!!

श्रमिकों का श्रम बल , अब लुटने को है,
शायद अब पाप का भांडा फूटने को है,
धन पतियों के उद्यम, में वृद्धि के लिए,
सरकारों ने नियमों में बदलाव किए,
इतनी व्यथा क्या, अब तक कम थी,
कोरोना के नाम पर,लगाई थी पाबंदी,
बिना रोजी किए , कैसे भर पेट भोजन करें,
कैसे गृह स्वामियों का किराया भरें,
अपने नौनिहालों की भूख को कैसे कम करें,
अपने गृहणियों की जरूरत को कैसे पुरी करें,
इन्हीं सवालों के लिए तो हम सड़कों पर उतरे,
जब कहे गए वायदे झूठे निकलने लगे,
भूखे पेट की आग में जब जलने लगे,
तब ही तो हम अपने घरों को चलने लगे,
जिन्हें हमने चुना था,उन्हींने हमारा ध्यान न धरा,
घर जाने लगे हम तो,डण्डों से हमको पिटा गया,
मार खाते गए, आह भरते हुए,
कड़ी धूप में, पसीने के संग आंसू भी बहे,
इस उम्मीद में,कभी तो अपनी मंजिल दिखे,
चलते रहे हम बस चलते रहे,
हर मुश्किल को हम झेलते रहे,
बच्चे भी हमारे, कंधों पर बैठकर,
भूख,प्रयास से मचलते रहे,
हां कहीं,कभी, किसी की दया पर जो भोजन मिला,
उनको दुआएं देकर,हम आगे बढ़ गये,
हजारों मिल का सफर, तय करते हुए,
कब रात ढल गई,कब भोर हुई,
कभी धूप के पसीने से नहाते हुए,
कभी वर्षा के पानी में भीगते हुए,
कुछ पता ही नहीं चला,हम कहां पहुंच गए,
घर पर पहुंचना है, यह ध्येय बनाए हुए,
महीने से भी ज्यादा वक्त गुजर गया,
हमारे चलने पर, खूब अब हल्ला मचा,
फैलाएंगे यह कोरोना, इन्हें कैसे भी रोकोना,
बस इतना ही आसाराम काफी था,
अब डंडों का उपयोग बाकी था,
ओलों समान यह बरसने लगे,
डंडे तो अब हम पर पड़ने लगे,
चलते, चलते यों ही,हो चले थे निढाल,
सिर पर गठरी का बोझ,
और कांधे पर नौनिहाल,
थक कर हो रहे चूर चूर,
पर हुक्मरानों का मद ना हुआ चकनाचूर,
करने लगे थे अब हमें मजबूर,
यह चले जाएंगे तो,
कहां से मिलेंगे हमें मजदूर,
क्या,क्या ना तिकड़म इन्होंने दिखाए,
कितने ही तोहमतें हम पर लगाए,
लेकिन हम पर किसी को रहम ना आई,
हमें रोकने को ही इन्होंने, पुलिस भी लगाई,
और वह भी क्या करते,
उन्होंने शपथ जो है खाई,
सरकार के आदेश कैसे ना निभाएं,
सरकार जहां भेजदे, वह वहीं जाएं,
वह अगर कह दें, तो लाठी चलाएं,
और यदि वह कहदें, तो गोली चलाएं,
कभी कोई, हमको समझाते भी हैं,
कभी गुस्से में लाल पीले हुए जाते हैं,
कभी कभी हमें दुलारते भी हैं,
लेकिन अब हम श्रमिकों का सब्र टूट सा गया है,
किसी के कहें पर अब भरोसा नहीं रहा है,
उस आंसियां को हम छोड़ गए हैं,
जिसमें हमारे सपने पले हैं,
अब हम अपने उस आंसियां को पाने को मचल रहे हैं,
जिसे छोड़ कर हम, यहां तक पहुंचे हैं,
अब चाहे कोई कुछ भी करले,
हम ना रुकेंगे,
चाहे जान भी जाए,हम ना थमेंगे,
और अब वह समय आया भी है,
जब सोते हुए, हमें सदा के लिए सुला गया है,
वह चाहे,सड़क की दुर्घटना में मिली मौत हो,
चाहे रेल की पटरी पर मिली मौत हो,
यह कहर तो हम पर ही बरपा है,
भूख,प्यास से तो गरीब ही मरा है,
कितनो को यह राहत मिल नहीं पाई थी,
कोरोना की आफत तो हम पर ही आई थी,
तो अब उसी कोरोना को आगे रखकर एक और चाल चली है,
आठ घण्टे को बदल कर बारह घण्टे में बदलाव किए हैं,
क्योंकि शोषण ही तो,हमारा प्रारब्ध है,
और वह शोषक हैं, तो यही उनका कर्तब्य है,
हमारे नीति नियंता, राष्ट्र निर्माण में जुटे हैं,
कितने ही बड़े बड़े कामों से थके पड़े हैं,
और हम हैं क्या, सिर्फ मजदूर ही तो हैं,
हम हैं भी तो, सिर्फ मजबूर हुए पड़े हैं,
लेकिन शायद अब अति होने लगी है,
पाप की हांडी, अब फूटने को भरी पड़ी है।।

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