*** " हे माँ : तूझे मैं क्या लिखूं......! " ***
” प्रकृति की,
अतुल्य रचना है तू…!
संस्कृति की,
अनमोल संरचना है तू….!
जगत की,
जनन बिंदु है तू…!
अनुपम ममता की,
संसार और सिंधु है तू…!
चांद और सूरज की,
आधार एवं परिक्रमण बिंदु है तू…!
हे माँ…..!
तूझे अब मैं क्या लिखूं….! ”
” तू अटल है,
तू ही सकल है…!
तू अज़र है ,
केवल तू ही, अमर है…!
तू ही जल है,
तू ही निर्मल है…!
तू ही शक्ति ,
तू ही प्रबल है…!
तू ही मित,
तू ही अपरिमित…!
तू ही असीम नील गगन है…
तू ही मेरी अनमोल चमन है…!
तू ही गीत,
तू ही अक्षुण्ण सरगम-संगीत…!
इस भव-भूतल में,
केवल तू ही है ”अमृत…!”
हे माँ…!
तूझे अब मैं क्या लिखूं…..! ”
” तू ही पवित्र आत्मा की आधार…
तू ही ”मनु” सोच की संसार…!
तू ही प्रेम, तू ही धर्म…
तू ही कृति, तू ही कर्म,
और तू ही है मेरी सकल मर्म…!
तू ही है अमर तत्त्व…
पृथ्वी-घूर्णन की, तू ही है जड़त्व…!
तू ही अज (ब्रम्हा) है,
तू ही जलज है…!
तू ही है मंदिर की मूरत…
तू ही है निर्मल गंगा से भी, खूबसूरत…!
तू ही रुप है, तू ही दीप-धूप…
और तू ही है सकल स्वरुप…!
तू ही धूपों में, है सुकुन छांव…
तू ही है, मेरी मन-सागर की इठलाती नाव…!
तू ही है अप्रतिम आस मेरी…
तू ही है अगम-विश्वास मेरी…!
हे माँ…!
तूझे अब मैं क्या लिखूं….! ”
” पवित्र मन की, हर रंग है तू…
हर एक दुःख-दर्द में,
नि:स्वार्थ, नि:शर्त, हर पल…
हर वक्त, मेरी संग है तू…!
तू ही अनुराग है…
तू ही ममता की जड़-पराग,
और अप्रतिम राग है…!
तू ही है,
अप्रतिम राग की ”जननी” जान है…
हे माँ..!
तेरी ममता कितनी महान है…!
तेरी शक्ति से, न कोई अनजान है…
इस धरा पर “हे माँ…!”
केवल तू ही भगवान है…!
इस धरा पर ”हे माँ..!” ,
केवल तू ही भगवान है ।।
हे माँ…!
तूझे अब मैं क्या लिखूं…!
हे माँ…!
तूझे अब मैं क्या लिखूं…!! ”
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* बी पी पटेल *
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
१० / ०५ / २०२०