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10 May 2020 · 1 min read

एहसान रिश्तों का

अपनों के साथ बिताए कुछ लम्हों को याद करने का दिन आ गया,
364 दिन बेफिक्री के बाद इक दिन फ़िक्र का आ गया,
पुरे साल खुद में ही खोने के बाद अपनों में जीने का वक़्त आ गया,
जिन रिश्तों से मिली जिंदगी उनको सिर्फ इक दिन याद करने का वक़्त आ गया,
सुख में कभी ना याद कर दुख में सिर्फ मां को पुकारा,
अाई कोई मुसीबत तो ढाल पापा को बनाया,
रिश्ता भाई बहन का भी सिर्फ दिखावे का हो गया,
लेकिन इक दिन इनके नाम कर गुनाहों को सब माफ कर लिया,
बयां चाहकर भी ना हो पाए जिन रिश्तों का अस्तित्व जो
उन रिश्तों को इक दिन में समेटकर जज्बातों को झुका दिया,
दुनिया दिखाई जिन रिश्तों ने और सिखाई दुनिया की पहली सीख,
क्यूं उन रिश्तों का महत्व सिर्फ सोशल मीडिया पर रह गया,
चिल्लाए जिन पर पूरे साल हम और कभी ना जिनको आराम दिया,
नाम उनके करके सिर्फ इक दिन बाकी दिन कोई हाल ना जाना,
खुशियां जिन्होंने कुर्बां की हमारी इक मुस्कान पर सारी,
कायनात की सारी खुशी उनके कदमों में रखने की बारी है हमारी,
रिश्तों के जिन भवरों में फंसकर दुनिया की नौका पार की,
उन रिश्तों पर सिर्फ इक दिन क्यूं हमने तो पूरी जिंदगी वार दी।

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