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10 May 2020 · 1 min read

अधूरा सफ़र

न छोड़ो अभी यह अधूरा सफर है ।
मंजिल की थोड़ी कठिन रहगुजर है ।।

चले जो निरंतर वो कहते यही है ।
कि कदमो से छोटी रही ये डगर है ।।

हरे पत्तों से एक दिन यह भरेगा ।
भले आज दिखता जो सूखा शज़र है ।।

वो ऊंचा मकां है कलह का बसेरा ।
जहां अपने मिलजुल रहें वो ही घर है ।।

डरता वहीं है जो मरने से डरता ।
डरे मौत से ना वही तो निडर है ।।

गरीबों का प्यारा रहे जो जगत में ।
तो भगवान के दर उसी की कदर है ।।

जिसका हृदय गर कपट से भरा है ।
खाता वही ठोकरें दर बदर है ।।

मधुर प्रेम से दिन गुजरता है जिसका ।
सुखद नींद सोता वही रात भर है ।।

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