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9 May 2020 · 1 min read

अपने अंदर डूबकर

अपने अंदर डूबकर , अन्तः जगत निहार ।
क्या अच्छा क्या बुरा है मन में करो विचार ।।

पंछी है आकाश में भले उड़े दिन रैन ।
मानव जो उड़ता फिरे उसे कहाँ है चैन ।।

बीते दिन में घूमकर बीता भी कुछ देख ।
मिल जाएंगे वहां से कछुक पुराने लेख ।।

एक हाथ से कभी भी बजे न ताली यार ।
बजती दोनों हाथ से फिर क्या सोच विचार ।।

समय खिसकता जा रहा ज्यों मुट्ठी से रेत ।
बीत गई है रात अब फिर भी पड़ा अचेत ।।

देकर दुःख उसको सदा होता था नित मुग्ध ।
एक करारी चोट पर कहे किसे संदिग्ध ।।

घड़ी दो घड़ी का रहे यह जीवन का खेल ।
सबका हित करते रहो बना सभी से मेल ।।

ऐंसे नर को त्यागिये जो है झूँठ लबार ।
निज स्वारथ को साधकर कर दे तुम्हें किनार ।।

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