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8 May 2020 · 1 min read

हैरत नहीं की अब जान बेहतर है

हैरत नहीं की अब जान बेहतर है
मुझसे हुआ यह गुमान बेहतर है

अदा की है ज़नाब कीमतें बहुत ही
यूं ही नही आज ईमान बेहतर है

जो हुआ तो हुआ अब कहकर भी क्या
खामोश है मगर दास्तान बेहतर है

ठहर कर उदासी फिर चली जाती है
ख्यालो का एक ये मकान बेहतर है

ना जाने किस तसव्वुर में जीने लगे है
कि हकीकत मे भी अजान बेहतर है

कहें दिल से और सिर्फ दिल ही सुने
ऐसी गुफ्तगू की जुबान बेहतर है

छोडो भी मलाल गुज़री बातो क्रा ‘मनी
कुछ यादो का होना कुर्बान बेहतर है
शिवम राव मणि

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