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21 Feb 2019 · 1 min read

बचपन

घर के छोटे छोटे कमरे महल जैसे लगते थे
माँ के सादे खाने हमें छप्पन भोग लगते थे

दादी का दुलार और नानी की कहानी थी
गुड़िया की शादी भी ,धूमधाम से रचते थे

कपड़े की गेंद और कागज़ की नाव होती थी
जेबें खाली थीं और खुद को नवाव समझते थे

कल की चिंता न आज की परवाह होती थी
गहरी नींद सोते ,पल वो तो बेफिक्र से होते थे

दुनियादारी की समझ और न होशियारी थी
हंस कर मिलने वाले सब अपने ही लगते थे

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