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25 Dec 2018 · 1 min read

भोर की चहक

ऊषा नववधु
ओढ़े लालिमा की चूनर
टंका गोटा किरण
रवि रश्मियों का
जड़े हैं
नगीने ओस के
फैलाए आँचल सरिता रूपी
जिसका न ओर-छोर
सुर जल तरंगिणी का
करता कल-कल
ज्यों बाजे
नव वधु की रेशमी पायल
स्वरलहरी में
बाजे मधुर घंटियां
भोर की देवालय में
सुरभि फुलवारी की
महकाती
मानो वधू ऊषा का
कोमल तन
लो हो गयी भोर
चहक उठा शोर।

रंजना माथुर
अजमेर (राजस्थान )
मेरी स्व रचित व मौलिक रचना
©

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