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21 Jun 2016 05:40 PM

वाह ! बहुत सुंदर दोहे.

प्यार मुहब्बत का हुआ , ऐसा रूप खराब |
गुलशन का हर शूल ज्यों, चुभने को बेताब ||

कई पीढ़ियों बाद में ‘प्रीत’ का यह साहित्य।
शुरू किया ‘अर्चना’ ने ‘क्रान्त’ हो गये धन्य।।

✍ Dr.Krant M.L.Verma
krantmlverma@gmail.com

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