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जितना आवश्यक स्थापित प्रतिमा की प्राण-प्रतिष्ठा है, उतनी ही आवश्यक प्रकाशित कृति की सटीक समीक्षा है। वो भी धर्माचार्य की भांति किसी मर्मज्ञ साहित्याचार्य से।।

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