Sahityapedia
Login Create Account
Home
Search
Dashboard
Notifications
Settings
15 Jul 2016 07:44 AM

बहुत खूब ..क्या बात है
पर अपना अपना अनुभव है
मुझे लिखनी होती ये कविता तो कुछ इस तरह होती हे हे
”पागल हैं माता पिता ,दें खुशियों की खान
उनसा इस संसार में ,कोई नहीं महान..”

You must be logged in to post comments.

Login Create Account
15 Jul 2016 10:15 AM

बंटी जी आज के दौर में आपकी बात सही है । लेकिन माता पिता सब जानकार पागल बनकर भी खुश रहते हैं । इसी को मोह कहते हैं ।

Loading...