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शेर की तरह दहाड़ा जो, मेरा यार आदमी ।
पूँछ उठाकर देखा तो, निकला वह सियार आदमी ।

“आदमी की औक़ात ” न केवल कविता के शीर्षक की दृष्टि से ही उपयुक्त है , बल्कि यह शीर्षक भी एक पूरी कविता है , इसलिए-यदि पूरी कविता को “आदमी का महाकाव्य ” कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी ।
दिल को छूने बाली बात लिखने के लिए मेरा पुन: आशीर्वाद
बेटा नीरज ,

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