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बिल्कुल, आपकी कविता बदलाव को आमंत्रित करती है।
लेकिन अपवाद को मुख्य धारा नहीं मान सकते।
भारत विविधताओं का देश है, हर जगह अलग अलग प्रथा है।

इसी देश में कोई एक शादी तो कोई करता चार, कोई गऊ को मारता तो कोई करता उससे प्यार।
कोई अपने बच्चे नहीं पाल पाता कोई, कुता को भी पालता।
यहां हर चीज़ में बदलाव की जरूरत है।
यहां अपना एक संविधान है।
अपना अपना।

लिखते रहिए ,,,
हर दिशा में,

कहीं गांव की लज्जा दिखता तो कहीं गोवा की साज सज्जा दिखता।
ये भारत है, यहां हर चीज़ बिकता ।

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