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अत्यंत मार्मिक व सत्य कथन । महात्मा व वीर शिरोमणि भीष्म ( देवव्रत ) के साथ हो रहे अन्याय को देखकर बहुत दुख होता है। उनके जीवन का प्रथम अन्याय स्वयं उनके पिता ने ही किया जिसकी वजह से उनको यह भीष्म प्रतिज्ञा लेनी पड़ी । हाँ मगर उसके बाद उनके घोर अन्याय ने उन्हें चैन से मरने भी न दिया । मरते दम तक आत्म ग्लानि की आग में जलते रहे ।मगर इसका क्या फायदा ! तीर तो कमान से निकल गया ,वो कहाँ से वापिस आ सकता था। जो एक बार उस महान आत्मा के जीवन के साथ घटित होना था ,वो तो हो गया। शांतनु को पहले ही सोच विचार का कदम उठाना चाहिए था। अपनी उम्र का लिहाज नहीं किया ,और न ही एक जवान बेटे के बाप होने की थोड़ी सी शर्म आई । और उनके इस चारित्रिक पाटन का खामियाजा स्वयं के साथ भीष्म और बाद में सम्पूर्ण आर्य व्रत को भुगतना पड़ा ।

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