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आपके विचार से मैं सहमत हूं कि वर्तमान में अच्छे नाटक लेखन एवं नाटक कर्मियों का अभाव है इसके अलावा नाटक विधा को शौकिया तौर पर विकसित करने की अपेक्षा व्यवसाय रूप में विकसित किया जा कर उसे सफल जीविका उपार्जन का साधन बनाना आवश्यक है। वर्तमान में शौकिया तौर पर नाटकों की प्रस्तुति में धनाभाव चलते अपेक्षित सफलता नहीं मिल पाती है। इस प्रकार नाटक कर्मियों को उचित प्रोत्साहन के अभाव में नाट्य मंच से जुड़े रहने का प्रयोजन नहीं रहता। दूसरी बात मुझको यह खटकती है कि कुछ लब्ध प्रतिष्ठित नाटककार एक केवल एक वर्ग विशेष के लिए नाटकों की प्रस्तुति बड़े शहरों में करते हैं जो सामान्य नाटक प्रेमी श्रोताओं के पहुंच से बाहर होते हैं क्योंकि उनके मंचन के टिकटों के दाम काफी ऊंचे होते हैं जो साधारण श्रोता वहन नहीं कर सकता। यह एक कटु सत्य है।
नाटकों का दूसरा पक्ष यह है इसे फिल्म टीवी में प्रवेश करने की सफलता की सीढ़ी मान लिया गया है क्योंकि अधिकांश नाट्य अभिनेताओं ने अपनी अभिनय क्षमता से फिल्म और टीवी में एक सफल स्थान बना लिया है। इसलिए अच्छे अभिनेता अवसर मिलने पर फिल्म और टीवी की ओर अग्रसर हो जाते हैं और अच्छे अभिनेताओं का अभाव रंगमंच को भुगतना पड़ता है। शासन द्वारा भी रंग कर्मियों एवं कलाकारों के प्रोत्साहन एवं रंगमंच विकास के लिए सहायता प्रदान करना आवश्यक है जिससे अधिक से अधिक प्रतिभाओं को इस दिशा में प्रोत्साहन मिले।

धन्यवाद !

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