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आर हो या पार हो

!! श्रीं !!
(आधार छंद -हरिगीतिका ,
2212 2212 2212 2212
समांत आर, पदांत -हो !
०००००००००००
आर हो या पार हो
०००००००००००
कुछ कीजिये हल्का सभी का तनिक सा तो भार हो ।
कम हो घुटन मुख पर हँसी उर में भरा मृदु प्यार हो ।।१

धीमे चले चलता रहे तो लक्ष्य आ जाता निकट ।
जो जिंदगी से जूझता डरता न चाहे हार हो ।।२

मौसम बड़ा बेदर्द है कुछ लोग ठिठुरें रात में ।
उस पर हमारा साथ उनके शुष्क क्यों व्यवहार हो ।।३

ऐसी चली बिगड़ी हवा सबके उड़ाये होश हैं ।
बाजार ही जब बंद हो कैसे कहो व्यापार हो ।।४

है कौन बैठा घात में लूटे हमारा बाग ये ।
उसको सबक ऐसा मिले शर आर हो या पार हो ।।५

शासन सुशासन वह लगे कल्याण जन-जन का करे ।
सुंदर हमारा देश है सुंदर यहाँ सरकार हो ।।६

तू दो कदम अपने बढ़ा मैं‌ भी‌ बढाऊँ दो कदम ।
मिट जाय सारा फासला महका हुआ संसार हो ।।७

महेश जैन ‘ज्योति”,
मथुरा !
***
०५/०१/२०२२

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"जीवन जैसे ज्योति जले " के भाव को मन में बसाये एक बंजारा सा हूँ जो सत्य की खोज में चला जा रहा है अपने लक्ष्य की ओर , गीत…

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