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” सकारात्मक समालोचना “

डॉ लक्ष्मण झा “परिमल ”

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हम सब एहि रंगमंचक कलाकार भेलहुँ ,……मुदा प्रतिबंधरहित कलाकार ! किनको नायक नहि बनाओल गेल छनि..किनको नायिका क रूप सं सजाओल नहि गेल छनि..कियो सहायक नहि छथि ..नहि निर्देशक ..नहि संचालक आ नहि विदूषक ! हमरालोकनि स्वतंत्र छी !

अप्पन -अप्पन स्क्रिप्ट अपने लिखलहूँ ..पात्रक चयन अपने केलहुं ..आ अप्पन अभिनय कें लोकक समक्ष रखलहूँ ! कियो साहित्य चर्चा पर लागल छथि ..कियो गोटे दार्शनिक गप्प क प्रदर्शन करताह ..किनको संगीत सं प्रेम छैनि ..चिकित्सक चिकित्साक लेख लिखताह इत्यादि -इत्यादि !

किछु एहि रंगमंच मे श्रेष्ठ छथि..कियो समतुल्य हेताह आ नवयुवकबृंदक अपार जनसमूह त पहिने सं एहिमे अग्रसर छथि ! आब हमरालोकनिक इच्क्षा इएह रहित अछि जे सब गोटे हमर अभिनय कें देखैत आ तकर सकारात्मक समालोचना आ प्रशंसा करैथ ! कखनो -कखनो दिशानिर्देशकक सेहो आवश्यक अछि !मुदा समालोचना मे मधुरता आ अपनत्व हेबाक चाहि !

एहि छोट सन यन्त्र मे असंख्य मित्रक समावेश अछि ! हम पुर्णतः हुनकर सानिध्य मे व्यक्तिगत रूपेण नहि रहि सकलहूँ ! हुनकर भाव -भंगिमा क दर्शन नहि भ सकल ! हुनकर संक्षिप्त टिप्पणी आ समालोचना क भावार्थ संभवतः नहियो बुझि सकैत छी ..कखनो – कखनो हुनक समालोचना मर्मभेदी बाण बनि जाइत छैक ! ..

आब निर्णय केलहुं जे “डिजिटल मित्र” कें विस्तारपूर्वक समालोचना आ टिप्पणी करक चाहि आ जनिका हम व्यक्तिगत रूपेण जनित छियनि ,…हुनका कोनो भ्रान्ति नहि भ सकैत छनि !

..आ नहि त सब सं उत्तम फेसबुकक परमाणु शस्त्र …
“लाइक”…
“लव” ..
“हाहा” …
“सैड”…
“एंग्री” क प्रयोग सं कहियो पराजय क मुंह नहि देखय पडत ! आ एहिना मित्रता सदा अक्षुण बनल रहत !

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डॉ लक्ष्मण झा”परिमल”
साउंड हेल्थ क्लिनिक
डॉक्टर’स लेन
दुमका
झारखण्ड
भारत

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