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पिआस

“पिआस”
कायिक सागर मांझ
चुभकल भ’जायत अहाँके
बरु..
से उमेद कम्मे

जानि सकब
की होइत छैक
सिनेह सुधा-रस
व्यर्थ थिक ई बात

नोनछड़ैन पानि
की मेटा सकलैक अछि पिआस
अहुं ताले करैत छी..
ता
गोटी लाले करै छी
सरिपहुं जं
अहाँ बुझने रहितियैक उचित-विहित
ई तिक्ख…
बिख नै होइत जिनगीक निमित्त

सतयुग सं कलियुग धरि ठाढ़े
निहारैत रहलहुं हम बाट..
हम एहि घाट
मुदा…
अहाँ बुते नै लागल पार
कैल मंझधार
कायिक सागर सं
अवधेश।।

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