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छोटका मालिक आ खबास

छोटका मालिक आ खवास।
सारा गांव-जवांर जनै कि छोटका मालिक खवास के जनमल हैय। लेकिन छोटका मालिक अइ बात से अंजान रहै। आखिर अंजान केना न होयत।केकरा में इ हिम्मत होयत,इ बात छोटका मालिक के बताबे के। लेकिन एगो अप्रत्याशित घटना से पता चल गेल कि हम खवास से जनमल छी।हमर सुच्चा बाप खवास हैय।
घटना इ भेल कि खवास छोटका मालिक के चाय पीये लेल लबैत रहे कि टेबुल पर धरे के बेर हाथ से कप छूट गेल आ चाय गिर के छोटका मालिक के नयका सूट पर गिर गेल। छोटका मालिक आग बबूला हो के बिगड़ लन-साला।खबासी करते करते बुढा गेल, लेकिन अब तक अकिल न भेल हैय। पैर से जूता निकाल के मारे ला हाथ उठैलन।खबास बोले लागल, मालिक मालिक….! इ शोर के छोटका मालिक के माय सुनते, दौड़ल आयल आ हाथ पकड़ के जोर से बोललैन- इ कि कैला बौआ।इ तोहर बाप छथून।इनकरे तू जनमल छा।इ माय,तू कि बोले छी।हां बौआ हम सही कही छिओ। हां बौआ,इ बात तोहर बाबू जी भी जनैत रहलथून ह। तोरा जनम होय से तीन महीना पहिले हमरा सब के छोड़ के दुनिया से चल गेलथून।तोहर बाबू जी के खवास जरूर रहथून, लेकिन तोहर जन्मदाता बाप छथून।चल जा इनका से गोर ध के माफी मांगा। छोटका मालिक आंख में आसू ले के ,गोर ध के बोललन, हमरा माफ क द बाबू जी। छोटका मालिक,हुनकर माय आ खबास बाबू, तीनों आदमी आपस में खुशी से लिपट गेलन।
स्वरचित@सर्वाधिकार रचनाकाराधीन ।
-आचार्य रामानंद मंडल सामाजिक चिंतक सीतामढ़ी।

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मैथिली और हिन्दी कविता कहानी लेखन

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