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” घरक जोगी जोगडा “

डॉ लक्ष्मण झा” परिमल ”
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राति भरि विचारि केँ ,
एकटा कविता बनैलहुँ ।
नीक जकाँ मंथन करि ,
छंद मे ओकरा गढ़लहुँ ।।
मन भेल सब सँ पहिने ,
अपन कनियाँ केँ सुनाबी।
अपन रचनाक कौशल ,
कनि हुनका बताबि ।।
भोर मे लागल छलि ,
भानसक इन्तिजाम मे ।
हमहुँ अपन लागल रहि ,
कविताक ध्यान मे ।।
कहलियनि “देखु हम कविता ,
आहाँ केँ सुना रहल छी ।
आहाँ हमर रचनाक ,
पहिल श्रोता बनि रहल छी ।।”
हुनक स्वीकृति भेट गेल ,
कहलनि कनि खखकसि
कय हमरा सुना दिए ,
ह्रदय हमर जुड़ा दिए ।।
हम इ कहलियनि ,
ताली सँ प्रशंसा करब ।
नीक लागत त ,
वाह-वाह करब ।।
आवध गति सँ हम कविता
पाठ करय लगलहुँ ,
अपन कविता केँ कवि सम्मलेन ,
जकाँ सुनबय लगलहुँ ।।
हमरा पढ़य मे आंनद ,
आबि रहल छल ।
अपन कवित्वक प्रतिभा ,
छलक रहल छल ।।
किछु क्षणों उपरांत ,
हमर कविता समाप्त भेल ।
हम मौन भेलहुँ
परंतु कोनो ओहि दिश सँ
प्रतिक्रिया जखन नहि भेटल
त पुछलीयनि-‘केहन लागल ?
ओ तमसा कें कहली-‘धूर ! जो ..
आहाँक कविता हमर ‘साग ‘जरा देलक !!
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डॉ लक्ष्मण झा” परिमल ”
दुमका

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