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खाय-खाय केॅ नाँचै छै

देखोँ कुकर भुको‌ँ रहलोँ छै
जे साथ लेलॊ छै चील कौआ के
सरकारी रोटी पर पलोँ रहलोँ छै
अपने धरती केरौ फाट मे बाँटै छै
आनह धागर संगे चलों छै
साच बात बुझी हां मे हां
सब कुछू झाँपै रहलऽ छै
चिड़िया-चुनमुन जयसै
खाय-खाय केॅ नाँचै छै

कटलोॅ-छटलोॅ केॅ संस्कृति भाषा के
गर्दन केरौ सिधे कट्टा से काटौँ छै
तय्यो सभ्भे केरौ निक लागै छै
महाकवि कहिकै नै थाकै छै
कत्तेॅ टाँगा फैलाय लेलकोँ जानहो
मुत त देखहो तोंय पर रहलऽ छै
खाय-खाय केॅ नाँचै छै

मौलिक एवं स्वरचित
© श्रीहर्ष आचार्य

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Author
विधा नन्द सिंह उपाख्य : श्रीहर्ष आचार्य शिक्षा : एम.एस-सी., एम.बी.ए. जन्म तिथि-1996 मैथिली, हिन्दी,संस्कृत ,खोरठा,अंग्रेजी,अवधी,बंगाली ब्रजभाषा,भोजपुरी,मगही में गजल, दोहा, गीत,कविता ,उपन्यास लेखन सम्मान/पुरस्कार : सरस्वती साहित्य सम्मान, ब्रजभाषा गौरव…

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