Read/Present your poetry in Sahityapedia Poetry Open Mic on 30 January 2022.

Register Now
· Reading time: 1 minute

कहै छी।

कहै छी
बर्ष त बीत गेलै।
परंच हम बीत गेली हैय।

वोहिना जेना
फलां त मर गेलै।
समसान घाट से आबै हैय।

सोचू न
बर्ष फेर आ गेलै।
परंच बीतल समयनै आबैय हैय।

सोचूं न
फलां त मर गेलैय।
अब हमर बारी आबैय हैय।

सोचूं न
घमंड में हम जियै।
उम्र बीतल जा रहल हैय।

सोचूं न
सभ के पड़त जायै।
राजा रंक बाभन सोलकन कैंय।

सोचूं न
सभ के पड़त जायै।
रामा ज्ञानी अज्ञानी प्राणी कैंय।

स्वरचित © सर्वाधिकार रचनाकाराधीन

रचनाकार-आचार्य रामानंद मंडल सामाजिक चिंतक सीतामढ़ी।

25 Views
Like
Author
57 Posts · 4.7k Views
मैथिली और हिन्दी कविता कहानी लेखन

Enjoy all the features of Sahityapedia on the latest Android app.

Install App
You may also like:
Loading...