Read/Present your poetry in Sahityapedia Poetry Open Mic on 30 January 2022.

Register Now
· Reading time: 1 minute

“कँपकँपी “

डॉ लक्ष्मण झा”परिमल ”
=============
कँपकँपा गेलहुं
इ जाड सं
बसात बुझु
जान लेत !
गत्र-गत्र तोडि देत
केना आब हम
उठब ?
कान ,नाक
मुंह शिथिलता
रूप लेलक,
सिरकक तर
दुबकि आब
सुतल छी !
इ जाड त बुझु
कोनो नवका
कानून बनि
प्रहार क देने अछि !
घूर,जारैन,आगि ,
मटिया तेल
मौलिक वस्तु
लुटि लेने अछि !!
अपने हीटरक
ताप आ स्टीम
बाथ लेत छथि
हमरा ला देहो मे
अंगा नहिदेत छथि !!

==============
डॉ लक्ष्मण झा”परिमल ”
साउंड हेल्थ क्लिनिक
एस ० पी ० कॉलेज रोड
दुमका
झारखण्ड
भारत

17 Views
Like
Author

Enjoy all the features of Sahityapedia on the latest Android app.

Install App
You may also like:
Loading...