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:: सांग / स्वांग का स्वरूप, परम्परा एवं उसकी देंन @ संकलनकर्ता – संदीप कौशिक, लोहारी जाटू, भिवानी – +91- 8818000892 ::

:: सांग/स्वांग का स्वरूप, परम्परा एवं उसकी देंन @ संकलनकर्ता – संदीप कौशिक, लोहारी जाटू, भिवानी – +91- 8818000892 ::

सांग / स्वांग परम्परा:
उत्सव के आधार पर भारतीय समाज में अनेक सांस्कृतिक व धार्मिक लोक कलाएँ प्रचलित हैं। साँग भी उन्ही कलाओ में से हरियाणवी व उतरप्रदेश भाषा की एक प्रसिद्द लोक कला है जो हरियाणा व उतरप्रदेश ही नहीं इनके समीपवर्ती क्षेत्रों में भी लोकप्रियता के साथ प्रचलित है। सांग एक रचना, संगीत और न्रत्य का अनूठा कला संगम है। जिस तरह श्रावण मास की समीर और फाल्गुनी मौसम की महक जनमानस में तरंगे पैदा करती है, ठीक उसी तरह सांग का संगीत भी मन और आत्मा को आन्दंदित करके एक शमा बाँध देता है। इस विधा में सांग और रागिनी कला की अभिव्यक्ति होने के साथ साथ जनसमुदाय का एक मनोरंजक साधन भी है। समाज के किसी भी वर्ग में चाहे धनी हो या कंगाल , उच्च हो या पिछड़ा, नौजवान या बुजुर्ग, नारी या पुरुष, साधू फ़क़ीर सभी वर्ग तो सांग मंच को मानवदर्शक मानकर समानाभुती का रसपान करते है। सांग केवल मनोरंजन का साधन ही नहीं अपितु सांगीतकार मनोरंजन के साथ साथ श्रोताओं को परोपकार, सहिष्णुता, त्याग, भाईचारे का पाठ भी पढ़ाते है। इसलिए सांग एक लोक व्यवहार व संस्कार निर्माण की विधा है।
मूल रुप से “सांग” शब्द का शाब्दिक अर्थ होता है “स्वाँग भरना”। यह एक लोकनाट्य के रूप में बहुत ही पारम्परिक विधा है जिसमे लोकनाट्यकारो के मंचन द्वारा प्रचलित धार्मिक, सामाजिक, पौराणिक अथवा समान्य सी लोककथा को माध्यम बनाकर लोककवियों ने बेहद खूबसूरत अंदाज में उपदेशक, नैतिक, मनोरंजक एवं जीवन मूल्यों की अनमोल शिक्षा प्रस्तुत की है। एक प्रकार से साँग काव्य एवं गद्य का मिलाजुला रूप होता है। वैसे तो सांग विधा की लोकनाट्य परम्परा सम्पूर्ण भारत में काफी प्रचलन में है, जिस प्रकार हरियाणा में सांग एवं रागिनी का प्रचलन है। ठीक वैसे ही उतरप्रदेश में नोटंकी, राजस्थान में तमाशा तुर्री कलगा, बिहार में बिरहा, ब्रज में भगत, मालवे में मांच, पंजाब में ख्याल, गुजरात में भवाई, पश्चिमी उ.प. व हरियाणा में सांग के रूप में प्रचलन मिलता है। अतः सांग एवं रागनी भारत में पुरातन काल से ही चले आ रहा है।
कला की दृष्टि से इसे तीन प्रकार से समझा जा सकता है, अभिनय कौशल, नृत्य कौशल, संगीत कौशल। जिसमे ‘सांग संगीत’ के पात्रों का चयन उनके गायन की क्षमता के आधार पर किया जाता है और प्रत्येक पात्र को गायन काल की शिक्षा दी जाती है।
सांग/स्वांग का स्वरूप एवं विधा :
स्वांग परम्परागत तरीके से नाटक की भांति मंच पर आयोजित किया जाता है तथा संवाद योजना के अंतर्गत भी स्त्री पात्रों की भूमिका पुरुषों ही द्वारा निभाई जाती है। वस्तुतः गीत संगीत, वाद्य यंत्रों की सप्तरंगी धुन, नृत्य एवं अभिनय की त्रिवेणी का नाम ही “साँग” होता है और इस मंचन में प्रमुख साँगी नायक के रूप में अपनी भूमिका अदा करता है तथा अन्यतम मुख्य कलाकार को नायिका की भूमिका निभानी पड़ती है। अब इन दोनों मुख्य अभिनेताओं के बाद तीसरे नंबर का प्रमुख कलाकार एक हास्यस्पद रुप में नकली (विदूषक की भूमिका में) होता है जो अपने अभिनय में हाजिरजवाबी एवं चुहलबाजियों से दर्शकों को हँसाता हुआ अपनी कला द्वारा खूब वाहवाही लुटता है। वास्तविकता के रूप में देखा जाए तो इस विधा में नकली उस साँग मंडली की जान होता है जिसके बिना सांग मंचन बिल्कुल अधुरा सा माना जाता है। इस अनूठी विधा की मंचित कथा में कलाकारों द्वारा बोले जाने वाले संवाद लिखित रूप में भी नहीं होते तथा सभी संवाद कलाकार की अभिनय कुशलता से तत्काल ही बनाऐ जाते हैं। इनके तीनो मुख्य कलाकारों के बाद अन्यतम भूमिकाओं को करने के लिए कलाकारों की संख्या मुख्यतः सात आठ होती है। सांग विधा में लोककथा के मंचन के समय साँग मंडली में सारंगी, हारमोनियम, ढ़ोल, तबला, शहनाई, खड़ताल जैसे सभी वाद्य यंत्रों की सुरीली धुने श्रोताओं को आकर्षित करती है। इन वाद्यान्त्रो के प्रयोग हेतु सांग मण्डली में विशेष एवं कुशल वादकों को रखा जाता है। इस विधा का उल्लेख एक रचना में कवि शिरोमणि प. मांगेराम ने भी कुछ इस प्रकार किया है।

हरियाणे की कहाणी सुणल्यो, दो सौ साल की,
कई किस्म की हवा चालगी, ये नई चाल की।। टेक ।।

एक ढोलकिया एक सारंगिया, खड़े रहै थे,
एक जनाना एक मर्दाना, दो अड़े रहैं थे,
पन्द्रह सोलहा कुंगर, जुड़कै खड़े रहैं थे,
गली और गितवाड्यां के म्हैं, बड़े रहैं थे,
सब तै पहलम या चतुराई, किसनलाल की।।1।।

एक सौ सत्तर साल बाद, फेर दीपचंद होग्या,
साजिन्दे तो बणा दिये, घोड़े का नाच बंद होग्या,
निच्चै काला दामण ऊपर, लाल कन्द होग्या,
चमोले को भूल गये, न्यू न्यारा छन्द होग्या,
तीन काफिए गाये, या बणी रंगत हाल की।।2।।

हरदेवा दुलीचंद चतरू, भरतू एक बाजे नाई,
घाघरी तो उसनै भी पहरी, और आंगी छुटवाई,
तीन काफिए छोड़के, या कहरी रागनी गाई,
उनतै पाछै लखमीचन्द नै, फेर डोली बरसाई ।
बातां ऊपर कलम तोड़ग्या, जो आजकाल की।।3।।

मांगेराम पाणची आला, मन मैं करै विचार,
घाघरी के मारे मरग्ये, ये मूर्ख मूढ़ गंवार,
शीश पै दुपट्टा जम्फर, पाया मैं सलवार,
इब तै आगै देख लियो, के चौथा चलै त्यौहार,
जब छोरा पाहरै घाघरी, किसी बात कमाल की।।4।।

इस विधा में सांग मंचन का नजारा भी अद्भुत होता है सभी कलाकार मंच पर वृताकार की भांति बैठते हैं, जिनके बाह्य तरफ मुख्य अभिनेता उनके चारो तरफ घूमते हुए अपना अपना अभिनय करते हैं। सांग मंचन आज भी परम्परागत रूप में लकड़ी के तख्तों पर किया जाता है तथा मंच के चारों तरफ श्रोतागणों एक जमावड़ा होता है। सांग मंचन या आयोजनो के मुख्य कारण प्राचीनकाल से मनोरंजन के तौर पर सार्वजनिक कार्यों व हर्षोल्लास के लिए ही होते रहे है क्योंकि साँग मंचनो के माध्यम से दानरूप में आर्थिक स्थिति को बहुत ज्यादा मजबूती मिलती थी। उस प्राप्त धन राशि से एक निर्धारित भाग सांगीत बेड़े के भागीदारो को उनके मेहनताने के रूप मे बाँट दिया जाता था और शेष के रूप में एकत्रित धन सामाजिक कार्यों के प्रयोग हेतु रह जाता। सांग मंचन के रूप में आज भी देहातो में यह परंपरा ज्यों की त्यों बनी हुई है जिससे सामाजिक निर्माण हेतु परम्परागत तौर पर धन इकठ्ठा करके गौशाला, धर्मशाला, मंदिर, बाग़ बगीचों का निर्माण किया जाता है। इस अत्याधुनिक दौर में भी यह सामाजिकता की एक अद्भुत मिशाल है जिससे हमारे देहाती समाज को वर्तमान में भी सामूहिक निर्माण कार्यों के लिए सरकारी खजाने पर निगाहे नही फैलानी पड़ती।

सांग परम्परा की देंन :
सांग प्रचलन के विषय में लोककवि रामकिशन व्यास का कहना था की यह विधा 12 वीं शताब्दी में 1206 ई. के आसपास शुरू हो गयी थी और हरियाणा प्रदेश में नारनौल के एक ब्राहमण बिहारी लाल ने शुरू की थी जो एक गुजराती ब्राहमण थे। लेकिन मुगलों के समय में सांग मंचन पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगा दिया था क्यूंकि सांगो के माध्यम से अपनी संस्कृति व देशभक्ति का ज्ञान कराया जाता था। प. बिहारी लाल के बाद उनके शिष्य चेतन ने सांग शुरू किये थे। 17 वी शताब्दी में सांगो का दौर पुनः आरम्भ हुआ जिसको आरम्भ करने वाले बाबू बालमुकुन्द गुप्त थे। उसके पश्चात् फिर बालमुकुन्द के शिष्य प. किशनलाल भाट हुए जिन्होंने इस विधा को अत्यंत महत्वता दी।

बहुत पुराणी कहाणी, सुणियो हरियाणे की,
घग्गर यमना बीच की, धरती हरी समाणे की।। टेक ।।

रचना कर ऋग्वेद की, महिमा यहां पर गाई थी,
…………………………………………………………………
…………………………………………………………………
…………………………………………………………………
शिव शादी से रीत चली, म्हारी नाचणे गाणे की।।

नारनौल का गुजराती, ब्राह्मण बिहारीलाल था,
सांग शुरू करया, सन 1206 का साल था,
नाचै गावै चेतन चेला, करै कमाल था,
……………………………………………………………..
वो कुतुबुद्दीन ऐबक सोचै था, सांग कराणे की।।

1709 म्य बालमुकुंद नै, फेर सांग छेड़या,
उसके चेले गिरधर नै भी, बांध लिया बेड़ा,
शिवकुमार शिष्य बणया, यमुनानगर के पास खेड़ा,
और चेला बण किशनलाल भाट नै, लाया था गेड़ा,
गामा म्य चौपाल मिलै थी, जगाह ठिकाणे की,

दो सौ वर्ष के बाद म्य, सांगी दीपचंद आग्या,
तख़्त बिछा साजिन्दे बिठा, आसमाने तणवाग्या,
देश चमोले तीन बोल के, इसे काफिये गाग्या,
…………………………………………………………
सरकार करै थी पूछ, दीपचंद सांगी स्याणे की।।

हरदेव चतरू भरथू बाजे, भगत कुहाग्ये थे,
कमीज घागरी पहरै थे, आंगी छुट्वाग्ये थे,
देश चमोले इकैहरी टेक की, रागनी गाग्ये थे,
दोहरी टेक की रागनी, लख्मीचंद चलाग्ये थे,
तीन सान्गीयों ने कर दी, तबदीली बाणे की।।

मांगे व्यास धनपत नै, गढ़ पै सलाह मिलाई थी,
घाघरी छोड़ चुन्नी जम्फर, सिलवार पहनाई थी,
पांच नचाये चारो तरफ, दे आवाज सुनाई थी,
………………………………………………………..
धनपत सिंह नै बाण थी, ऊँगली आँख चलाणे की।।

हिस्टरी टीचर दयाल सिंह, लाहौर म्य खास था,
वेद शास्त्र से लिया, हिन्द का इतिहास था,
हाल सांग का दादा गुरु, शिवदत के पास था,
सोला करोड़ करया चंदा, नारनौन्दिया व्यास था,
गुरु माईराम जैसी कविताई, ना किते पाणे की।।

18वीं तथा 19वीं शताब्दी में यह कला हरियाणवी भाषीय क्षेत्रों में लोकरंजन का एकमात्र माध्यम बन चुकी थी परंतु इसके सर्वाधिक लोकप्रिय एवं विद्वान कवि 20वीं सदी में हुऐ। साँग की इस परंपरा का पुर्णतः प्रभाव 18 वीं शताब्दी में श्री किशनलाल भाट के द्वारा माना जाता है। प. किसनलाल भाट के समय से सांग मंचनो के अवसर मुख्यतः विवाह, त्यौहार, मेले, कुश्ती दंगल और पूजन आदि ही होते थे, जिनका मूल उद्देश्य मनोरंजन के साथ साथ सामाजिक धन इकठ्ठा भी करना था।

इनके बाद उन्नीसवी सदी में श्री बंसीलाल सांगी ने एक कुशल शुरुआत की। श्री बंसीलाल के सांग मंचन का क्षेत्र अम्बाला व जगाधरी था। उनके बाद सांगी अलिबक्श का आगमन हुआ जिसके मंचन क्षेत्र धारूहेड़ा, रेवाड़ी, मेवात व भरतपुर आदि थे। इनके प्रसिद सांगों में पदमावत, कृष्णलीला, निहालदे, चंद्रावल और गुलाबकली थे। उनके बाद श्री बालकराम सांग मंचन में उतरे जिन्होंने कुरुक्षेत्र में ब्रह्मसरोवर की परिधि में भगत पूर्णमल, गोपीचंद और शीलादे जैसे चर्चित सांगो की रचना की। इस संघर्षी दौर में फिर मेरठ के पंडित नेतराम का भी आगमन हुआ। फिर 20वी सदी में सांग कला के सूत्रधार रहे लोककवि छज्जूराम के शिष्य खांडा सेहरी (सोनीपत ) निवासी प. दीपचंद का वर्णन मिलता है जिसमें अंग्रेजी शासन ने भी उनके सांगो को सैनिक भर्ती में इस्तेमाल किया। जो उनकी साक्ष्य रूपी कुछ पंक्तियाँ इस प्रकार है।

भर्ती होले रे, थारे बाहर खड़े रंगरूट,
आड़ै मिलै पाट्या पुराणा, उड़ै मिलै फुल बूट।।

सांगी दीपचंद के प्रसिद्द सांग के रूप में सरणदे, सोरठ, राजा भोज, हरिश्चंद्र, नल दमयंती, उतानपात, गोपीचंद, ज्यानी चोर है।
इनके बाद फिर मो॰ अहमद बख्श, श्री स्वरूपचंद, श्री हरदेवा स्वामी (गोरड), सोहन कुंडलवाला, सरुपचंद (दिसोर खेडी ), मानसिंह (सैदपुर ), निहाल (नाँगल), सूरजभान (भिवानी), हुकमचंद (किसमिनाना ), धनसिंह (पुठी ), अमर सिंह और चितरु लोहार। इन्होने अपने सांगो में छंदों का भी प्रयोग किया जिनमे भजन, रागनी, दोहे, चौपाई, सवैया, चमोले, शेर और ग़ज़ल आदि। ये सभी 19वीं शताब्दी तक इस सांग विधा रूपी यज्ञ में अपनी आहुतियाँ डालते रहे। इनके बाद फिर 20 वीं शदी के प्रारम्भ में श्री बाजे भगत जो गोरड निवासी श्री हरदेवा के शिष्य थे, एक सुप्रसिद्ध साँगी हुए हैं जिन्होने साँग कला को न केवल नैतिक एवं सामाजिक ऊंचाईयों के संबंध मे ही समृद्ध किया, बल्कि इसमें काव्यात्मक शुद्धता को भी महत्त्वपूर्ण स्थान दिया। फिर इन्ही के समकालीन सर्वकालीन सर्वश्रेष्ठ सुर्यकवि प. लख्मीचंद ने इस सांग विधा के ऐसे आयाम स्थापित किये जिससे इस कला में सदा सदा के लिए अमरत्व की आहुति डाल दी। इनके समकालीन व बाद में इस परंपरा को आगे बढ़ाने वालों में प. हरिकेश पटवारी, पं. मांगेराम, प. सुल्तान, प. माईचन्द, प. रतिराम, श्री धनपत सिंह, श्री चंद्रलाल भाट (बादी), श्री खेमचंद, जनकवी फौजी मेहरसिंह, श्री रामकिशन व्यास, महाशय दयाचंद, आजाद कवि मुंशीराम जांडली, प. जयनारायण, मास्टर नेकीराम, प. तुलेराम, प. जगन्नाथ व प. राजेराम संगीताचार्य आदि के नाम सर्वविख्यात हैं।

दीपचंद, हरदेवा, बाजे, उनका भी घर गाम देख्या,
फेर चल्या जा सिरसा जांटी, धोरै जमना धाम देख्या,
लख्मीचंद नै नौटंकी, मीराबाई का बणाया सांग,
मांगेराम नै शिवजी गौरा, ब्याही का बणाया सांग,
राजेराम नै भाई, गंगेमाई का बणाया सांग,
पास किया सरकार नै, कविता निराली, कैसी चक्र मै डाली,
खूब रची करतार नै, या दुनिया मतवाली, कैसी चक्र मै डाली ।।टेक।।
(काव्य विविधा : प. राजेराम संगीताचार्य)

वर्तमान समय में अनेकों साँग मंडलियाँ हैं जो इन्हीं सांगियों की परंपरा को टेलीविज़न और सिनेमा के युग में जीवित रखने के लिए संघर्षरत हैं।

निष्कर्ष :
‘सांग-संगीत’ हरियाणा व उतरप्रदेश के समृद्ध लोक रंगमंच का अंश है। भारतीय रंगमंच में इस शैली का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है तथा भारतीय नाट्यकार आधुनिक रंगमंच के लिए इसका प्रयोग कर रहे हैं।
हरियाणा व उतरप्रदेश लोकनाट्य की एक सशक्त एवं दीर्घ स्वस्थ परम्परा रही है। उतरप्रदेश व हरियाणावासी सांगों के माध्यम से मनोरंजन, ज्ञान, जीवन के संचित अनुभव समुच्चय का ज्ञान प्राप्त करते है। विशेषतः ग्रामीण भूखण्डों में रागनियों से झंकृत इस नाट्यशैली का अपना ही वर्चस्व है।

सांग विधा के ज्ञात-अज्ञात सांग सर्जक एवं सांगी :
हरियाणा में सांगीतकारों की एक लम्बी परम्परा रही है। यह इतनी विस्तृत प्रणाली है कि यदि इसका समुचित रूप से वर्णन किया जाए तो कई ग्रन्थों की रचना हो सकती है। अधिकतर ऐसे लोक-कवि एवं सांगी हुए है, जिनका साहित्य अब उपलब्ध नहीं है। हरियाणवी लोक-कवियों में कुछ ऐसे भी जन-कवि हुए है जिन्होंने सांगों को स्वयं मंचन नहीं किया लेकिन उन्होंने सांगों की रचना की है।

सांग मंचकों एवं लोक कवियों के व्यक्तित्व एवं कृतित्व का उल्लेख करना समीचीन/उचित जान पड़ता है। अब यहाँ कुछ इतिहासकारों, अध्ययेताओं, बुजुर्गों, रुचिकरों जैसे शंकरलाल यादव, साधुराम शारदा, राजाराम शास्त्री, देवीशंकर प्रभाकर, कृष्णचन्द्र शर्मा (आई.ऐ.एस. ऑफिसर) राजेंद्र स्वरूप वत्स, डॉ. पूर्णचंद शर्मा, लक्ष्मीनारायण वत्स, डॉ. बाबूलाल, डॉ लालचंद गुप्त, डॉ. रामपत यादव, रोशन वर्मा आदि के संशोधित अध्यनों, सहायक पुस्तकों व सोशल मीडिया स्त्रोतों की सहायता से सांग विधा के अंतर्गत कुछ लोककवियों व सांगीयों की अनुमानित तौर पर मुख्य जानकारी के रूप में कालक्रमानुसार प्रकाश डालने की कौशिश कर रहा हूँ, जो निम्न में इस प्रकार है।

अ.क्र. लोककवि का नाम जन्म (ई.) मृत्यु (ई.) टिप्पणी

1 ब्राहमण बिहारीलाल 1200 1200 ई. के आसपास
2 चेतन शर्मा 1200 बिहारीलाल जी के शिष्य
3 प. बालमुकुन्द 1700 1700 ई. के आसपास
4 श्री गिरधर 1700 बालमुकुन्द जी के शिष्य
5 शिवकुमार 1700 गिरधर जी के शिष्य
6 प. किशनलाल भाट 1700 बालमुकुन्द जी के शिष्य
7 हजरत सादुल्ला 1750 आकहेड़ा, नुह, मेवात
8 बंसीलाल 1802
9 अम्बाराय 1819
10 सेढूसिंह
11 लक्ष्मणदास मऊ खास
12 शीशगोपाल
13 स्वामी शंकरदास 1824 1912 जिठौली, मेरठ
14 शम्भुदास 1833
15 प.रतिराम 1839
16 पंडित बस्तीराम 1841 1958
17 आशुकवि प. रविस्वरूप 1843 1942 निन्दाना, रोहतक
18 चितरु सांगी 1843 1927 गढ़ी सांपला
19 पंडित नेतराम 1850 1850 ई. के दशक मे
20 रामलाल खटीक 1850 1850 ई. के दशक मे
21 अहमद बख्श 1850 1895 1850 ई. के आसपास
22 योगेश्वर बालकराम 1850 1920 करनाल निवासी
23 अलीबख्श 1854 1899 मुण्डावर, अलवर
24 आशुकवि गुणी सुखीराम 1857 1905 स्याणा, महेंद्रगढ़
25 सरदारी बेगम (मर्दाना भेष) 1860 कलायत, कैथल (प्रथम महिला सांगी थी)
26 हरिदास उदासी

बाबू बालमुकुन्द गुप्त 1861

1865

1907 लाडवा

गुडियाणी, रेवाड़ी
27 आशुकवि प. महोर सिंह 1869 साल्हावास
28 सूरजभान वर्मा 1869 1922 भिवानी
29 जमुआ मीर 1869 1922 सुनारिया, रोहतक
30 ताऊ सांगी 1878 1878 ई. अनुमानित
31 पंडित बख्तावर 1879 1949 बीजणा, चरखी दादरी
32 जसवंत सिंह वर्मा 1881 1957 टोहावनी
33 हरदेवा स्वामी 1881 1926 गोरड, सोनीपत
34 पंडित दीपचंद 1883 1942 खांडा सेहरी सोनीपत
35 कविरत्न पंडित माईराम 1884 1964 अलेवा, जींद
36 श्री मानसिंह सैदपुर
37 ब्राहमण मानसिंह 1885 1955 बसौधी
38 बाल ब्रह्मचारी श्री निहालचन्द 1887 1995 नांगल, ठाकराण
39 संगीताचार्य श्री रामसहाय जैतडवास
40 मास्टर मूलचंद 1889 1958 जैतडवास
41 पंडित शादीराम 1889 1973 सीवन, कैथल
42 पंडित सरुपचंद 1890 1931 दिसौर खेड़ी, झज्जर
43 प. भोलाराम 1894 अलीपुर खालसा, करनाल
44 झंडू मीर 1895 देहरा (बाद में पाकिस्तान स्थानांतरण)
45 बाजे भगत 1898 1936 सिसाना, रोहतक
46 पंडित हरिकेश पटवारी 1898 1954 धनौरी, जींद
47 सोहन कुंडलवाला कुंडल
48 पंडित नत्थुराम 1902 1990
49 पंडित लख्मीचंद 1903 1945 सिरसा जांटी, सोनीपत
50 प. साधुराम 1904 1989 पबनावा, कैथल
51 श्रीराम शर्मा 1907 1966 बली ब्राह्मणान, भैन्सरू कला, रोहतक
52 मोजीराम स्वामी 1908 सिसाना, रोहतक
53 देवीसिंह 1912 नौरंगाबाद
54 राय धनपत सिंह 1912 1979 निन्दाना, रोहतक
55 पंडित केशोराम पात्थरआली, भिवानी
56 पंडित कुंदनलाल पात्थरआली, भिवानी
57 पंडित नन्दलाल 1913 1963 पात्थरआली, भिवानी
58 पंडित बेगराज पात्थरआली, भिवानी
59 पंडित नन्दलाल मुनिमपुर
60 श्री नन्दलाल ढोकिया गाँव
61 महाशय दयाचंद मायना 1915 1993 रोहतक
62 आजाद कवि चौ. मुंशीराम 1915 1950 जांडली, फतेहाबाद
63 पंडित जगदीशचन्द्र वत्स 1916 1997 ऐन्चरा, कुराना, करनाल
64 पंडित जयनारायण कुराड़
65 श्री दयाचंद गोपाल 1916
66 पंडित रामानंद आजाद 1917
67 सुल्तान शास्त्री 1919
68 सांग सम्राट मास्टर नेकीराम 1915 1996 जैतडवास
69 पंडित भगवत स्वरूप 1915 खरखौदा, सोनीपत
70 खेमचंद स्वामी (खिम्मा) 1923 गोरड (श्री हरदेवा सुपुत्र)
71 चंद्रलाल भाट (चन्द्र बादी) 1917 2004 दतनगर
72 श्री कृष्णचन्द्र नादान 1922 2000 सिसाना, रोहतक
73 ज्ञानीराम शास्त्री 1923 अलेवा, जींद
74 बंदा मीर 1924 1988 महम, रोहतक
75 प. रघुवीर 1925 चरखी दादरी
76 पंडित रामकिशन ब्यास 1925 2003 नारनौंद, हांसी
77 मास्टर दयाचंद आजाद 1925 1945 सिंघाना निवासी
78 जोगी सेवाराम 1930 बखेता, रोहतक
79 पंडित सुबेराम 1930 आटा, पानीपत
80 पंडित तेजराम 1931 खैरमैंण
81 सांगी देईचंद 1931 1981 सांखोल, झज्जर
82 भारत भूषण सांघीवाल 1932 2018 सांघी, रोहतक
83 बनवारी लाल ठेल 1932 1983
84 पंडित कामसिंह 1932 रामनगर, जींद
85 श्री झम्मनलाल 1935
86 पंडित आशाराम 1936 क्वारी, हिसार
87 महाशय सरूपलाल 1937 2013
88 पंडित जगन्नाथ 1939 समचाना
89 पंडित तुलेराम 1939 2008 सिरसा जाटी
90 हरदेवा सिंह मकडौली, रोहतक
91 प. किशनचंद शर्मा 1941 खुंगाई, झज्जर
92 पंडित लख्मीचंद 1945 भम्भेवा निवासी
93 अद्भुत सांगी जीयालाल 1946 2004 बुआणा, जींद
94 श्री झम्मन लाल 1948
95 पंडित राजेराम संगीताचार्य 1950 लोहारी जाटू, भिवानी
96 हरिपाल गौड़ 1954 रमंडा
97 मास्टर राजेन्द्र 1957 2003 जैतडवास
98 प. रामप्रकाश 1957 भैन्सरू कला, सोनीपत
99 चौ. रामशरण रोड़ 1963 2011 अलीपुर खालसा, करनाल
100 श्री चन्दगी सांगी भगाणा
101 ठहरो श्याम धरौदी
102 काच्चा श्याम शोरों
103 प. हुकमचंद (हुकमी खुंडा) मनाणा
104 श्री हुकमचंद किसमिनाना
105 धनसिंह पुठी
106 प. गुलाबचंद उमरावत, भिवानी
107 पंडित देवीराम पहरावर निवासी
108 शुभकरण मांडी
109 प. मोलकराम उचाना
110 मलखान सिंह दुपैड़ी, करनाल
111 कस्तर सांगी
112 सुखदेव गौड़ गोठडा, रेवाड़ी
113 हिशमसिंह राजपूत कोयर, करनाल (एकमात्र राजपूत सांगी थे)
114 कस्तूरी बाई बेरी
115 श्री नत्थूलाल उतरप्रदेश
116 श्री मांगेलाल उतरप्रदेश
117 श्री मंगलचंद उतरप्रदेश
118 प. मानसिंह जांवली, उतरप्रदेश
119 श्री दिन्ना उतरप्रदेश
120 श्री रामसिंह खेकड़ा, उतरप्रदेश
121 प. बलवंत (बुल्ली) उतरप्रदेश
122 प. रघुनाथ 1922 1977 उतरप्रदेश
123 गुरु शरणदास उतरप्रदेश
124 ज्ञान अडिमल उतरप्रदेश
125 श्री जयकरण उतरप्रदेश
126 श्री जनार्दन उतरप्रदेश
127 श्री हरवीर टिल्ला टिल्ला, मेरठ, उतरप्रदेश
128 श्री बुन्दुमीर उतरप्रदेश
129 श्री रघुबीर सूप, बागपत, उतरप्रदेश
130 श्री लक्ष्मीचंद सूप, बागपत, उतरप्रदेश
131 प. रामरत्न टिल्ला, मेरठ, उतरप्रदेश
132 प. गौरीशंकर उतरप्रदेश
133 श्री पीरु पीर मिलक, मेरठ, उतरप्रदेश
134 श्री लड्डन सिंह 2020 खेड़ी नावल, मु.न. उतरप्रदेश
135 बलजीत जोगी (पाधा) उतरप्रदेश
प्रबुद्ध कवि, सांगी एवं
गंधर्व कवि पं. लख्मीचंद प्रणाली
136 पंडित मांगेराम 1905 1967 पाँणछी
137 पंडित रतीराम हीरापुर (श्री लख्मीचंद के मामा के लड़के)
138 पंडित माईचन्द 1916 1990 बबैल, पानीपत
139 पंडित सुल्तान 1918 1969 रोहद, झज्जर
140 जनकवि फौजी मेहरसिंह 1918 1945 बरोणा, सोनीपत
141 पंडित रामचंद्र खटकड़
142 पंडित चंदनलाल बजाणा
143 पंडित रामस्वरूप सिटावली, सोनीपत
144 पंडित ब्रह्मा शाहपुर बड़ौली
145 श्री धारासिंह बड़ौत
146 श्री धर्मे जोगी डीकाणा
147 श्री जहूरमीर बाकनेर
148 श्री सरूप बहादुरगढ़
149 श्री तुंगल बहदुगढ़
150 श्री हरबंश पथरपुर – यू.पी.
151 श्री लखी धनौरा – यू.पी.
152 श्री मित्रसेन लुहारी – यू.पी.
153 श्री चन्दगीराम 1926 अटेरणा
154 श्री मुंशीराम मिरासी खेवड़ा (बाद मे पाकिस्तान स्थानांतरित)
155 श्री गुलाब रसूल पिपली खेड़ा (बाद मे पाकिस्तान स्थानांतरित)
156 श्री हैदर नया बांस (बाद मे पाकिस्तान स्थानांतरित)

अल्पज्ञात लोककवि, सांगीतकार एवं भजनी:
1 पंडित मुसद्दीलाल शिष्य श्री पं. महोरसिंह (श्री के सी शर्मा के पिताश्री, लोहारी जाटू, भिवानी), 2 पं चिरन्जी लाल शर्मा मिताथल, 3 श्री रामफल गौड़ धनौरी, 4 लहणासिंह अत्री, 5 पृथ्वी सिंह सांगी बडाला, 6 महान सांगी लहरी माली आला, 7 उर्दू भाषीय कवि प्रताप शर्मा बोहर, 8 कवि व गायक साधूराम व्यास मानहेरू, 9 पण्डित रामदत्त कवि बोहर, 10 कवि प. हवासिंह बोहर, 11 लोककवि व गायक दयाचंद हरेवली दिल्ली (पंडित मानसिंह के शिष्य), 12 पंडित रतिराम, 13 आशुकवि पंडित चिम्मन लाल जी सुपुत्र पंडित महोर सिंह जी, 14 पंडित बद्री प्रसाद सुपुत्र पंडित महोर सिंह साल्हावास, 15 पंडित मंशाराम सुपुत्र पंडित चिम्मनलाल, 16 आशुकवि पंडित मुनीराम शिष्य पंडित महोर सिंह खरकड़ा राजस्थान, 17 आशुकवि पंडित दुलीचंद सुपुत्र पंडित मुनीराम, 18 पंडित वसुदेव जी सुपुत्र पंडित मुनीराम, 19 आशुकवि श्री संजय पाठक शिष्य पंडित महोर सिंह, 20 पंडित वृद्धिचंद जी कवि व गायक नारनौल शिष्य पंडित महोरसिंह, 21 श्री गणेशा, 22 श्री लेखराम, 23 पंडित बख्तावर, 24 श्री गनपत राम, 25 श्री बनवारी लाल सैनी-बवानी खेड़ा, 26 श्री लालचंद बजीणा, 27 श्री मामचंद बजीणा, 28 श्री श्योनारायण, 29 श्री ताराचंद, 30 श्री भोतराम, 31 पंडित देविदत, 32 पंडित देवीराम, 33 श्री चितरु (छत्रसिंह-शिष्य प. मांगेराम)-गाँव आटा, 34 भीष्म स्वामी, 35 दादा बस्तीराम, 36 श्री रामजीलाल,37 रामकुमार खालोटीया, 38 कवि ब्रहमानंद, 39 श्री दतुराम, 40 कवि शम्भुदास दादरी, 41 श्री मुखराम, 42 श्री रिसाल, 43 श्री मोलडचन्द, 44 श्री हरनाम, 45 श्री नत्थुराम गौड़, 46 श्री पदमैया, 47 श्री शिवकरण, 48 श्री धोकलराम, 49 श्री रामसहाय लाम्बी, 50 श्री आशाराम गादली, 51 श्री जगदीशचंद्र डैरोली, 52 श्री ताराचंद, 53 श्री कालूराम, 54 वैज्ञानिक कवि हेमचन्द्र, 55 श्री हीरालाल, 56 जमुनादत जी, 57 श्री रिछपाल आलमपुर, 58 श्री मुखराम, 59 श्री बद्रीप्रसाद, 60 श्री रिछपाल वैद्य, 61 श्री मानसिंह मानेहरू, 62 पंडित हरिराम बहू झौल्ररी, 63 श्री चंदूलाल मिर्जापुर, 64 श्री मुंशीराम मानहेरु, 65 श्री अमरसिंह, 66 श्री प्रेमसुख, 67 श्री चन्द्र भाठ तालु, 68 श्री रांझा सांगी, 69 आशुकवि पंडित बालमुकुंद, 70 जाखोद गुणी सुखीराम अखाड़ा, 71 आशुकवि सीताराम, 72 विराट नगर कोटपुतली राजस्थान, 73 हरिनाम शर्मा भजनी सेहलंग, 74 उदमी राम जाँगिड सेहलंग, 75 पण्डित रामेहर सिंह सांगी गद्दी खेङी, 76 श्री कल्लूराम गांव टांकडी, 77 श्री हरिराम गौड नालपुर, 78 श्री रामजीलाल गांव कादमा, 79 श्री लख्मीचंद पाथरआली, 80 गायक पं हुक्मीचंद लालावास, 81 श्री घनश्याम पाथरआली, 82 श्री आसकरण पिपली, 83 श्री बेगराज बिंजावास, 84 श्री रामप्रताप खरकडी, 85 हुक्मीचन्द, 86 पंडित गंगाराम भाट पुण्डरी (कैथल), 87 सुल्तान सिंह फरमाणा, 88 उदेराम फरमाणा, 89 श्री चन्द्र बीबीपुर, 90 प. मेवाराम (करहंस) 91 श्री मांगेराम मोर ‘निर्भय, 92 जयसिंह राणा कलायत (कैथल) 93 पंडित भरथू सांगी भैन्सरू (सोनीपत), 94 पंडित जियाचंद ब्राह्मणवास, 95 पंडित बलवंतसिंह, 96 महाशय छज्जूलाल सिलाणा, 97 पंडित रामेश्वर दत बधनारा (करनाल), 98 वेदप्रकाश गौड़-साल्हावास, 99 श्री केशोराम व 100 श्री गणेशा और 101 श्री लेखराम तीन गुरू भाई थे (स्वामी शंकरदास जी के शिष्य)।

नोट :- उपरोक्तानुसार प्रस्तुत सूचि में यथासंभव सतर्कता बरती गयी है, तथापि इसमें त्रुटी की संभावना है, अगर इस सन्दर्भ में आपके पास कुछ जानकारी है तो कृपया हमारे साथ साँझा करे ताकि निकट भविष्य में इन त्रुटियों को यथासंभव दूर किया जा सके।

:: सांग विधा : उतरप्रदेश ::
हरियाणा की तरह उतरप्रदेश का लोक साहित्य भी बड़ा ही समृद्ध है। उतरप्रदेश व हरियाणा के लोकगीत, लोक कथाएं, लोकनाट्य, लोक कहावतें और पहेलियां जनजीवन की विशेषताओं पर अच्छा प्रकाश डालती हैं। हरियाणवी की तरह उतरप्रदेश जनता की वीरता, दृढ़ता, देशभक्ति, धर्मपरायणता, सात्विकता आदि गुणों से लोक साहित्य भरा पड़ा है। उतरप्रदेश के पास श्री नत्थूलाल व प. मानसिंह जैसे लोककवि व सांगी है जिन्होनें उतरप्रदेश में इस सांग विधा को प्रचलित करने के लिए अपनी प्रतिभा का सदुपयोग किया है और अपने भजनों से असंख्य व्यक्तियों को प्रेरणा दी है। महाकवि स्वामी शंकरदास की जन्म और कर्मभूमि भी उतरप्रदेश व हरियाणा ही रही है, जिन्होंने ‘ब्रह्मज्ञान प्रकाश’ जैसी कृति द्वारा अनपढ़ जनता को वेदांत के गूढ़ रहस्यों से परिचित कराया। फिर आगे चलकर स्वामी शंकरदास की प्रणाली उतरप्रदेश ही नहीं हरियाणा में भी सर्वव्यापी व सर्वविख्यात रही जो आज तक अपनी जड़े ज्यों की त्यों चवे में गड़ाई हुई है। स्वामी शंकरदास तो अक्सर बाघोत मेले (हरियाणा) में आते रहते थे जहाँ उनका अन्य कवियों से शास्त्रार्थ होता था। उतरप्रदेश की पावन धरा पर इस श्रृंखला में शामिल कविताई के ज्ञाता सेढूसिंह, लक्ष्मणदास, शीशगोपाल, मांगेलाल, जमुआमीर, मंगलचन्द आदि सुप्रसिद्ध कवि हुये।

उतरप्रदेश मे वैसे तो केवल पश्चिमी उ.प. मे ही सांग होते है और पश्चिमी क्षेत्र मे भी मेरठ मंडल ही ज्यादा शौक़ीन रहा। उतरप्रदेश मे जो कवि व सांगी हुए है उनकी जड़ हापुड़ से पाई जाती है क्यूंकि हरियाणा के सुप्रसिद्ध लोककवि राय धनपत सिंह व चन्द्र भाट (बादी) भी पश्चिमी उतरप्रदेश की प्रणाली से ही सम्बन्ध रखते थे। राय धनपत व श्री चंद्रलाल दोनों ने अपनी अपनी पंक्तियों मे भी ये प्रमाण दर्शाया है।

सेढूं के चेले लक्ष्मण थे, लक्ष्मण के शीशगोपाल हुए,
शीशगोपाल के शंकरदास, शंकर के मांगेलाल हुए,
मांगे के चेले जमुआ थे, फिर धनपत सिंह पर ख्याल हुए,
तूं धनपत सिंह नै मानी री, मेरी सुनिए मात भवानी,
(लोककवि राय धनपत सिंह: हरियाणा)

कविताई के ज्ञाता सेढूं, लक्ष्मण और गोपाल गए,
स्वामी शंकरदास दादा, गुरु नत्थूलाल गए,
गुरु छंद की लड़ी बंद, मंगलचंद कर कमाल गए,
(लोककवि श्री चंद्रलाल भाट: हरियाणा)

श्री चंद्रलाल जी के जन्म पश्चात् इनके माता पिता इस गाँव को छोड़कर दत्तनगर, उतरप्रदेश चले गये। इस प्रकार चंद्रलाल भाट दत्तनगर, जिला मेरठ के निवासी बन गये। उनके द्वारा अपनी जन्मभूमि को छोड़कर दत्तनगर जाने का उल्लेख निम्न दोहे में मिलता है।

जन्म भूमि रियासत जींद में, दत्तनगर किया है वास,
गोधडिया विप्र गाँव चन्द्र का, चरखी में समझ निकास।।

सांगीतकार चंद्रलाल भाट का जन्म 1923 ई. में जींद रियासत के चरखी दादरी क़स्बे के गोधडिया ब्राहमण परिवार में हुआ था। चंद्रलाल के पिता का नाम सोहनलाल था जो एक भजनोंपदशक थे। उन्होंने अपने गाँव के बारे में एक छंद में स्पष्ट करते हुए कहा है कि

चरखी बराबर छत नहीं, सांगवाण जहाँ जाट,
उसी चरखी में गोधडिया ब्राहमण, वही से चन्द्र भाट।।

उतरप्रदेश राज्य में सांग विधा प्रचलन के विषय पर प्रसिद्ध सांगी प. मानसिंह के परम शिष्य व कवि शिरोमणि प. रघुनाथ के गुरु भाई श्री ब्रह्मसिंह चिपियाणा, जावली निवासी का कहना था कि उतरप्रदेश में तो ये विधा लगभग हरियाणा के सुर्यकवि प. लख्मीचंद के समय 19 वीं शताब्दी के आसपास ही प्रभावित हुई। ये विधा प्रसिद्ध कवि व सांगी प. नत्थूलाल जांवली निवासी ने शुरू की थी जिनके 107 अखाड़े हुआ करते थे जो शंकरदास जी के शिष्य थे और इनके शिष्य प. मानसिंह ने इस विधा को सबसे ज्यादा प्रभावित किया। फिर प. मानसिंह के बाद उनके ही पुत्र हीरालाल व शिष्य प. रघुनाथ ने सांगीत बेड़ा संभाला। सन 1947 में आजादी के पश्चात् सांगों का दौर शिखर चढ़ गया और इस विधा को शिखर चढाने वाले प. रघुनाथ थे जिन्होंने सदा सदा के लिए इस सांग विधा में अमृत की ऐसी घुटियाँ पिलाई जिसकी अमृतपान रूपी रस तृष्णा को कभी नही मिटाया जा सकता। उसके पश्चात् इनके शिष्यों तथा कुछ समय बाद पौत्र शिष्यों द्वारा सांग मंचित किये गये। इस प्रकार फिर प. रघुनाथ व उनकी प्राणाली के शिष्यों ने इस सांग विधा के ऐसे आयाम स्थापित किये जिनमे सदा सदा के लिए अमरत्व की आहुति डाल दी।

उतरप्रदेश सांगीतकारों का व्यक्तित्व एवं कृतत्व :
हरियाणा की तरह उतरप्रदेश में भी संगीतकारों की एक लम्बी परम्परा रही है। यह इतनी विस्तृत प्रणाली है कि यदि इसका समुचित रूप से वर्णन किया जाए तो कई ग्रन्थों की रचना हो सकती है। अधिकतर ऐसे लोककवि एवं सांगी हुए है, जिनका साहित्य अब उपलब्ध नहीं है।

उ.प. सांग विधा के लोकनाट्यकारों की मुख्य सूचि :
उतरप्रदेश भूमि के कुछ प्रख्यात व उपलब्ध प्रतिष्ठ लोककवि व सांगीतकार इस प्रकार है, सेढूसिंह, लक्ष्मणदास, शीशगोपाल, शंकरदास, प. नत्थूलाल जांवली (इनके 107 अखाड़े थे जो शंकरदास जी के शिष्य थे), मांगेलाल, जमुआमीर, मगलचंद, प. मानसिंह जांवली, श्री दिन्ना, श्री रामसिंह, प. बलवंत (बुल्ली), गुरु शरणदास, ज्ञान अडिमल, श्री जयकरण, श्री जनार्दन, श्री हरवीर टील्ला, श्री बुन्दुमीर, श्री रघुबीर सुपिया, श्री लक्ष्मीचंद, प. रामरत्न, प. गौरीशंकर, श्री पीरु पीर, श्री लड्डन सिंह, बलजीत जोगी (पाधा), प. रघुनाथ और इनके शिष्यों में प. बद्रीप्रसाद (खुर्रमपुर), चौ. घासीराम (सलेमाबाद), रावली कला से जयप्रकाश त्यागी (पहलवान), रघुनाथ त्यागी, ईश्वरदत त्यागी, सुरेन्द्र शर्मा, दिल्ली से जयचंद ठाकुर, श्री जयचंद (दुहाई), ठा. मंगलसिंह, ठा. निहालसिंह, श्री दयाकिशन, श्री हरिराम (करावल नगर, दिल्ली), राजकुमार त्यागी (मोरटा), टिड्डे खलीपा (इन्द्रप्रस्थ, दिल्ली), प. रघुनाथ के मामा रामदत शर्मा (पौसंगीपुर, दिल्ली), दयानंद त्यागी (फिरोजपुर), राजकुमार त्यागी (फिरोजपुर), श्री जयसिंह (फिरोजपुर), कालेराम शर्मा (उपलारसी), राजेन्द्र त्यागी (मंडोला), रामकिशन त्यागी (मंडोला), सतीश त्यागी (मंडोला), श्री सत्यप्रकाश (प्रकाश) फिरोजपुर, रामभूल सिंह (अलीपुर नियर), कृपाल सिंह (किला परीक्षितगढ़, एंची नियर), भुल्लेराम सिंह (किला परीक्षितगढ़), हेमराज सिंह (किला परीक्षितगढ़), ब्रजपाल सिंह (चमरावल), मास्टर रामकुमार शर्मा (महन्वा), रमेश त्यागी (फिरोजपुर) आदिA अब मै यहाँ इन कुछ लोककवियों की मुख्य जानकारी पर प्रकाश डालने की कौशिश कर रहा हूँ जिसमे प. रघुनाथ ने भी अपनी पंक्तियों मे उतरप्रदेश लोक साहित्यकारो का कितना सटीक चित्रण किया है।

सेढूसिंह गोपाल लछमन गिर, अमर नाम विख्यात हैं,
शंकर नत्थूलाल मानसिंह, सेवा में रघुनाथ है,
हरे भरे फल पात हैं, न्यूं प्रणाली की बेल है।।

लोकनाट्यो / सान्गीतों का वर्गीकरण ::
प्रत्येक सांग अपने आप में कुछ विशिष्टा रखता है और सांग बहुतायत में उपलब्ध है। ऐसी स्थिति में सांगों का वर्गीकरण करना अनिवार्य लगता है। इस अध्ययेता से पूर्व भी अन्य अध्ययेताओं ने अपने अपने हिसाब से विभिन्न लोककवियों के सांगों का वर्गीकरण किया है। वर्गीकरण का आधार ढूंढने की कठिनाई सभी के सामने रही है और हमारे सामने भी, क्योंकि सांगों की कथावस्तु बहुआयामी है, इसलिए उनकी अपवर्जी श्रेणी (उच्च से निम्न वर्ग अन्तराल) बनाना कठिन था। फिर भी यहां उसका प्रयास किया गया है। मुझे डॉ. पूर्णचन्द शर्मा के पं. लखमीचंद सांगों के वर्गीकरण के संबंध में उनकी इस टिप्पणी से बल मिला है कि “ऐसी परिस्थिति में प्रतिपाद्य (साबित करना) की मूल प्रवृतियों (रुझान) के आधार पर ही सांगों को वर्गीकृत करने का प्रयास किया जा सकता है” और सांगों की मूल प्रवृतियों के आधार पर ही उन्हें वर्गीकृत करने का प्रयास किया है।

कथावस्तु की मूल प्रवृति के आधार पर :
सांगीतों के वर्गीकरण के कई आधार विद्वानों व अध्ययेताओं ने किए, जैसे श्रृंगार एवं प्रेम प्रधान, धर्म एवं नीति प्रधान, ऐतिहासिक, सामाजिक, धार्मिक, काल्पनिक, प्रेममूलक, ऐतिहासिक, सामाजिक लोकधर्मी, लोक परम्परा पर आधारित, लोककथाओं पर आधारित, मूल काल्पनिक आदि पक्षों पर वर्गीकृत किया। कथावस्तु की मूल प्रवृति के आधार पर सांगों का वर्गीकरण मैंने भूतपूर्व आई.ऐ.एस. ऑफिसर व कला परिषद के अध्यक्ष स्व. के.सी. शर्मा (सांग विधा से सम्बंधित सन 1982 में सर्वप्रथम पुस्तक ‘कविसूर्य प. लख्मीचंद’ प्रकाशित करने व सन 1972 में प. लख्मीचंद पर पीएचडी करने का गौरव प्राप्त है) के अनुज डा. शिवचरन के मार्गदर्शन में निम्नलिखित ढंग से किया है।

ikSjkf.kd@,sfrgkfld
/kkfeZd@vk/;kfRed jk”Vªh; o lkekftd psruk lkekftd@leL;kewyd श्रृंगार एवं प्रेम प्रधान
शकुंतला दुष्यंत मीराबाई वीर हकीकत राय सेठ ताराचंद नौटंकी
राजा भोज सरणदे कृष्ण सुदामा भगत सिंह रूप बसंत चापसिंह सोमवती
सरवर नीर ध्रुव भगत महात्मा बुद्ध पृथ्वीसिंह किरणमई ज्यानी चोर
राजा हरिचन्द्र भूप पुरंजन सुभाष चन्द बोस जयमल फता पद्मावत
चिर पर्व गोपीचंद भरथरी बल्लबगढ़ नाहर नौरत्न शाही लकडहारा
विराट पर्व नरसी भगत महर्षि दयानंद सरस्वती रूपकला जादूखोरी खाण्डेराव परी
नल दमयंती धर्मजीत महात्मा गांधी नजमा अजीतसिंह बाला
सत्यवान सावित्री प्रह्लाद भगत महाराणा प्रताप कमली शरणदे नाई की
शिवजी का ब्याह भगत पूर्णमल छत्रपति शिवाजी रामरत्न का ब्याह हिरामल जमाल
रुक्मणि का ब्याह शिरड़ी सत साई शहीद उधमसिंह बादल शशिकला सुखबीर
कृष्ण जन्म श्रवण कुमार झाँसी की राणी सूरज चंदा प्रीतकौर चंद्रपाल
अंजना पवन राजा मोरध्वज भारत की जीत चम्पा चमेली लीलो चमन
चंद्रहास चमन ऋषि सुकन्या सहकारिता की खोज फुलझड़ी रणबीर चान्दकौर
सीताहरण महात्मा बुद्ध बदलती दुनिया कान्ता देवी चंद्रपाल सुमित्रा
गौहरण ध्रुव भक्त रामू भगत नौ बहार प्रेमपाल चंद्रपाल
धर्मजीत सती विपोला जयमल फता शाही सुहागन का दुहाग पिंगला भरथरी
कृष्ण भात रामायण वृतांत त्रिया चरित्र मालदेव का आरता हीर राँझा
शांति पर्व बादल सिंह सैनबाला कम्मो कैलाश
गीता उपदेश अमरसिंह राठौड़ समरसिंह राजपूत धर्मपाल शांताकुमारी
भीष्म पर्व पिंगला भरथरी पृथ्वीराज संयोगिता
द्रौण पर्व वीर विक्रमाजीत रूपवती चुडावत
जयद्रथ वध देवयानी शर्मिष्ठा परीक्षित नवल्दे
नहुष भूप नौरत्न सुल्तान निहालदे
द्रौपदी स्वयम्वर प्रेमलता
चित्र विचित्र लैला मजनू
द्रौपदी चीरहरण हंसबाला राजबाला
वन पर्व हूर मेनका
लवकुश काण्ड
कीचक वध
भीम का ब्याह
देवयानी शर्मिष्ठा

:: सांग विधा के सांगीत मंच की तर्ज एवं उसकी प्रमुख किस्में ::

‘तर्ज’ एक अरबी शब्द है जिससे अभिप्राय है कि काम आदि करने की बँधी हुई शैली अर्थात बनावट या रचना प्रणाली के विचार से किसी वस्तु के बनने या बनाने का भाव या ढंग। आकार प्रकार, किस्म, तरह या किसी वस्तु को स्वरूप देने का विशिष्ट ढंग। यह अरबी के शब्द कालिब और क्लब से बना है जिसका अर्थ होता है, ढालना अथवा मोड़ना।

तर्ज = बनावट, रीति/शैली, स्वरूप/किस्म/प्रकार।

तर्ज को सरल शब्दों में ये कहे कि एक ही तरह की अथवा एक ही मूल से उत्पन्न वस्तुओं, जीवों आदि का ऐसा वर्ग जो उसे दूसरी वस्तुओं या जीवों से अलग करता हो।

इस विषय के सम्बन्ध में प. रघुनाथ ने फ़िल्मी तर्जों, अन्य सांग सर्जकों की तर्जों व स्वयं की निजी तर्जों सहित अपने काव्य को 200 के आसपास भिन्न भिन्न तर्जों द्वारा विविधतम आकार दिया जिसमें कुछ इक्के-दुक्के ही कवि इस 200 तर्जों की श्रृंखला में शामिल हो पाये। उनके काव्य से संग्रिहित मुख्य तर्जे निम्नलिखित में कुछ इस प्रकार है।

प्रमुख तर्जे :-

(1)
*तर्ज: दोचश्मी*
*काली अन्धेरया तै झुकरी, बरसे मूसलधार,*
*कैसे देवकी अब उतरूं, मैं जमना के पार।। टेक ।।*

याणा कुंवर कन्हैया है, न्यू मौसम ठीक नहीं सै,
बाट विकट कंकर पत्थर, गोकल नजदीक नहीं सै,
मेरी बात में फीक नहीं सै, करले तू ही विचार,
तेरे कहने से मैं, सब कुछ करने को तैयार।।1।।

(2)
*तर्ज: दादरा*
*आज हम भिक्षा अनमोल री,*
*माता उठकै किवाड़ जल्दी खोल दे।। टेक ।।*

मन में भारी हुई उमंग, जीत लिया कैरों से जंग,
रंग आनन्द के छाये, झका झोल री,
राजा हो के तू, आशीर्वाद बोल दे।।1।।

(3)
*तर्ज: दादरा तीन ताल*
*विमल यश गालो, रघुनन्दन का।। टेक ।।*

जिसने भी गाया, आनन्द पाया,
हिरदे का सब, भरम मिटाया,
सर का भूत भगाया,
काट दिया जाल, पाप बन्धन का।।1।।

(4)
*तर्ज: ठेका तीन ताल*
*जिन्दा हूँ इस तरह से, गमे जिन्दगी नहीं*
*जलता हुआ चिराग हूँ, पर रोशनी नहीं।। टेक ।।*

ये चांद ये हवा ये फिज़ा, सब है मातमां,
जो इनमें तू नहीं तो, कोई दिलकशी नहीं।।1।।

(5)
*तर्ज: दादरा बरेली का तीन ताल*
*शिव चौदस में बरती, सावण बरसै था,*
*बुढिय़ा लगी थी, पूजा पाठ में।। टेक ।।*

चालै परवा पवन रसीली, झूम रही नारी छैल छबीली,
हो रही गिल्ली, धरती इंद्र बरसै था,
पाणी-पाणी चमकै था घर-घाट में।।1।।

(6)
*तर्ज: हिन्डोल तीन ताल*
*रूप मेरा देखे सै दूणा हो।। टेक।।*

रण का भार रहै क्षत्री पै, आत्मनिष्ठ गीता गायत्री पै,
जैसे पथरी पै, उस्तरा टेके सै दूणा हो।। 1।।

(7)
*तर्ज: ख्याल तीन ताल*
*बोल बोल अपशब्द निकम्मे, वृथा जिगर जलावै सै,*
*मेरी करी कराई भगती में, वो विघ्न गेरना चाहवै सै।। टेक ।।*

पतिव्रता अबला नारी का, सत धर्म लुटने वाला है,
इन्द्रासण पै बैठा है, अब नहुष उठने वाला है,
पूरा घड़ा पाप का भर लिया, समय फूटने वाला है,
पृथ्वी गर्क होण वाली है, आसमान टूटने वाला है,
व्यभिचारी बेईमान भूलकै, फूंक सै पहाड़ उड़ावै सै।।1।।

(8)
*तर्ज: सांगीत ताल कहरवा*
*श्री शंकर जी को, अर्जुन ने शीश झुकाया,*
*अपने मन का हाल भाव से, ब्यौरेवार बताया।। टेक ।।*

आप तो घट घट की जाणे, महादेव मैं क्या कहूँ,
जयद्रथ रहेगा जिन्दा तो, मैं ना फिर जिन्दा रहूँ,
ममता और लालच में जाणें, और कितने कष्ट सहूँ,
मेरे दुख को पशुपति, आप हो देखने वाले,
हृदय के घाव को स्वामी, प्रेम से सेकने वाले,
धर्म और अधर्म का ध्यान, सत्य पै टेकने वाले,
भगत जाल में घिरा हुवा, जी माया ने भरमाया।।1।।

(9)
*तर्ज: खड़ी ताल*
*हो गया घोर अन्धेरा, जी भरत खण्ड में।। टेक ।।*

पूर्णमल मरने का, जनता के रंज भतेरा,
स्यालकोट के बाग सूख गये, ऊजड़ हो गया डेरा।।1।।

(10)
*तर्ज: चौकलिया*
*एक हन्डी दो पेट, एक में खीर एक में दलिया,*
*देख लई श्रवण ने एक दिन, बहू बणी हुई छलिया।। टेक।।*

आप बड़े बलवान पिया, थारी नारी हारी पाषण है,
उसके बिल में बडऩे वाली, काले मुंह की सांपण है,
सीख चमेली की खोगी, लङ्का री नाक लुचापण है,
गुरु मानसिंह न्यूं कहगे, रघुनाथ में घणा सुधापण है,
लहदारी स्थापण है, न्यूं भजन बणा चौकलिया,
सेवा करने वाले होते, जग में जीव सुफलिया।।4।।

(11)
*तर्ज: ख्याल*
*तेरे कहे से आ नहीं सकता, राजा पागलपन में,*
*मरने का दिन दुखिया पापी, आता बड़े विघन में।। टेक ।।*

पृथवी और पाताल कांपते, कोई भी बोल नहीं सकता,
मेरी आज्ञा बिन नभमण्डल में, सूरज डोल नहीं सकता,
तलवार मेरे कब्जे में है, कोई बल को तोल नहीं सकता,
शरीर मेरा बज्जर का है, हथियार भी छोल नहीं सकता,
मेरी इच्छा से तीनों मौसम, चलती चाल पवन में।।1।।

(12)
*तर्ज: शामिल ख्याल*
अभि०- रण में लडऩे की आज्ञा जल्दी, उत्तरा मेरी नार करो,
उत्तरा- मेरी दसों इन्द्री काबू में, मेरी चिंता मत भरतार करो।। टेक ।।

अभि०- ग्यारहवां मन और बारहवीं बुद्धि, तत्वज्ञान से शुद्ध करो,
उत्तरा- थारी शान मेरी सुरती में, पिया यश पाणे को युद्ध करो,
अभि० धर्म के विरुद्ध काम दुनिया में, कोई करै मत खुद करो,
उत्तरा- सुरती के स्वामी मन में, मंगल करदो या बुध करो,
अभि०- मंगल रहे सदा सुरती में, सत्य सुभद की कार करो,
उत्तरा- वचन आपका मान लिया, साजन पूरा इतवार करो।।1।।

(13)
*तर्ज: ख्याल छोटा*
*पार लगादे नैया मैया, जन को तेरा भरोसा है,*
*तुम्हीं करो कल्याण जन्म दे, तुमने ही पाला पोसा है।। टेक ।।*

त्रिगुण माया माह दीख रही है, लक्ष्मी-विष्णु के संग में,
ब्रह्माणी सरस्वती वेद की विद्या, ब्रह्मा के अंग में,
दुर्गे पार्वती के ढंग में, शिवजी तेरा नासा है।।1।।

(14)
*तर्ज: ख्याल लावनी*
*इसी धनुष का चाप चढ़ाकै, ठीक निशाना मारूंगा,*
*फिरती मीन की आंख बींधकै, तलै तेल में तारूंगा।। टेक ।।*

जो ना उतरी मीन मेरे पै, फेर ना श्यान दिखाऊंगा,
इस फिरते यन्त्र में अपना, मारकै बाण दिखाऊंगा,
विद्या बाण लक्ष वेदी का, पूरा ज्ञान दिखाऊंगा,
राजा द्रुपद का निर्भय, बणकै मेहमान दिखाऊंगा,
दानी कर्ण बाण विद्या मैं, ऊंचा नाम उभारूंगा।।1।।

(15)
*तर्ज: ख्याल मिलवा*
*अर्जुन- प्यार पुत्र का मान के बोलूं, अब अभिमन्यु घर को चल,*
*अभि.- पुत्र कोई ना किसी का जग में, आज पुत्र और पिता है कल।। टेक ।।*

अर्जुन भूल गया अभिमन्यु बेटा लाड चाव से पाला था,
अभि.- कर्म करे के भोग मिले, तू कौण पालने वाला था,
अर्जुन जो चाहा सो हुवा तेरा कभी कहा हुवा ना टाला था,
अभि.- समय-समय की बात जन्म का नाता नैम निराला था,
अर्जुन घी और दूध पिलाये थे और गिरी छुवारे मेवा फल,
अभि.- अपनी-अपनी जगह चले गये, आग आकाश पवन पृथ्वी जल।।1।।

(16)
*तर्ज: ख्याल दोचश्मी*
*हीर- रांझे फाटक खोलदे, मनै जाडा लागै सै,*
*रांझा- रांझा पाली सोया, जा तू अक्खन जागै सै।। टेक ।।*

हीर- राजी होके पाली, पीले दूध मलाई है,
रांझा- जहर गेर के लाई, तू मारण आई है,
हीर- बिना खता के पाली, देरया मनै बुराई है,
रांझा- मैं जाणूं तनै हीरे, छल की भरी लुगाई है,
हीर- कुछ ना खता बताई है, मनै सहम दुहागै सै,
रांझा- दो खसमों की बीर, दिल ले भागै सै।।1।।

(17)
*तर्ज: ख्याल सादा*
*सत्यधर्म दया दान तपस्या, शूरवीर का काम,*
*राजी होके आरा ठाले, कर दुनिया में नाम।। टेक ।।*

तेरे धर्म की आज पीरक्षा, बहुत घणी तकड़ी सै,
खुल के खेल खिलाड़ी, काया माया में जकड़ी सै,
तेरा सत तोडऩ खात्तर, जिद्द सन्तों ने पकड़ी सै,
मन सै खाती बनजा, बेटा बणा खड़ा लकड़ी सै,
काया कर्म की मकरी सै, एक हाड मांस का चाम।।1।।

(18)
*तर्ज: ख्याल बड़ा*
*चम्पकलाल एक बाबू था, उसकी नार चमेली,*
*माता जीवै थी चम्पक की, कथा बड़ी अलबेली।। टेक ।।*

चम्पक की माता ठाकुर की, पूजा रोज करै थी,
बेटे बहू नास्तिक थे, न्यू मन में घणी डरै थी,
चंचल सुभा चमेली का, वो फैशन नये भरै थी,
बस बेटे के आगे बुढिय़ा, नौकर बणी फिरै थी,
हुक्म चलावै बहू, काम सब बुढिय़ा करै अकेली।।1।।

(19)
*तर्ज: ठेठ हरियाणवी*
*पांडों की नार, गावें मिलके मंगलाचार,*
*अर्जुन कुंवार, आज लडऩे चला।। टेक ।।*

रण का बाजा बजा, भय वीरों ने मन में तजा,
सजा आरते का थाल, रखा दीया चौमुक्खा बाल,
हरे हरे दूब के नाल, रोली मेंहदी में मिला।।1।।

(20)
*तर्ज: हरियाणवी देशी*
*मेरे कृष्ण की मेरे सामने, और बुराई मतना करिये,*
*प्रण तोडक़ै अभी मारदूं, घणी अंघाई मतना करिये।। टेक ।।*

अब मनै माला मन में जपणी, एक दिन श्यान सभी की खपणी,
अपणे मुख से मूर्ख अपणी, आप बड़ाई मतना करिये,
अपने सिर पै बिना बात की, खड़ी तवाई मतना करिये।।1।।

(21)
तर्ज: गुजरू हरियाणा
इन्द्रप्रस्थ में नित्य नेम से, कथा कराऊं था,
ऋषि महात्मा विप्रों को, दे दान जिमाऊं था।। टेक ।।

जमना जी नहाकर हर का, ध्यान धरा करते थे,
सत्संग भजन कीर्तन मिलके, नित्य करा करते थे,
चोर उचक्के ठग डाक वहां, घणे डरा करते थे,
साधू ब्राह्मण गऊ हो निर्भय, छिके फिरा करते थे।।
मेवा चावल मिष्ठान दूध की, खीर बनाऊं था।।1।।

(22)
तर्ज: गुजरू मिलवा (हरियाणवी)*
*अर्जुन द्रोपदी क्यूं खड़ी हो गई, पीठ फेर कै,*
*द्रोपदी हिजड़े क्यूं बोल्लै, मेरा आगा घेर कै।। टेक ।।*

अर्जुन म्हारा तेरा पीछे आगे का, भेद खुलग्या,
द्रोपदी राणी सुनती होगी, क्यूं बेशर्मी पै तुलग्या,
अर्जुन म्हारे तेरे कर्मो का भाव, स्वयम्बर में बुलग्या,
द्रोपदी पिछली बात कहै मतना, घाव दबा हुआ छुलग्या,
अर्जुन गांठा रुल गया चमक लागगी, गेहूंओं के ढेर कै,
द्रोपदी दाना दाना करा इकठ्ठा, पैर सकेर कै।।1।।

(23)
*तर्ज: गुजरू (उतरप्रदेश)*
*मिलके बोले देव धुनी, नभ गूंज उठा किलकारों से,*
*सब ब्रजमण्डल कांप उठा, जब कंस के अत्याचारों से।। टेक ।।*

द्वापर युग मथुरा नगरी में, उग्रसैन के कंस हुआ,
उसके कुकर्म से ब्रज में, धर्म का नाम विध्वंस हुआ,
उग्रसैन थे भगत कंस कोई, राक्षस रूपी अंश हुआ,
गुप्त पाप करने से लौकिक, लुप्त भयानक वंश हुआ,
ऋषि महात्मा बाला गऊ, छुप छुप मारे तलवारों से।।1।।

(24)
*तर्ज: भजन रूपी*
*जमना पार ऋषि दुर्वासा, मन में लगी मिलन की आशा*
*सखी रल मिलकै चलो साथ में,*
*हे! सोरण थाल खीर का ठालो हाथ में।। टेक ।।*

पवन अहारी दुर्वासा को, कृष्ण जी बतावें कृष्ण जी बतावें,
अचम्भे की बात आज हम, अजमानी चाहवें हम अजमानी चाहवें,
तिर जावें बिना नाव के, रंग आनन्द भरे चाव के,
भारी खुशी हुई म्हारे गात में।।1।।

(25)
*तर्ज: भजन रूपी अन्यतम*
*चित्त राम चरण में लग, ये जाने वाला जग।। हरे ।।*

किसको फिरे ढूंढता जग में, रहा रात दिन भग,
जीव आत्मा तेरे तन में ज्यूं गूंठी में नग।।1।।

(26)
*तर्ज: भजन रूपी अन्यतम*

*दु:ख दूर हुए दर्शन से, मनमीत प्रीत प्रसन्न से।। टेक ।।*

सत्य चित्त आनन्द है, सुख चैन,
जीव की इच्छा है, दिन रैन,
पुलकित नैन, सलिल बरसन से।।1।।

(27)
*तर्ज: भजन रूपी अन्यतम*
*पछतावें मन, मत वृथा डोलिये,*
*जय शिव जय शिव, जय शिव, ॐ मुँह से बोलिए।। टेक ।।*

शिवजी के गले में, देरा शेषनाग घेरा,
गोरा, गंगा, गैल बैल, नादिया लेरा,
मिट जागा अन्धेरा, मन की आंख खोलिये,
राग द्वेष के दाग, पाप मैल धोलिये।।1।।

(28)
*तर्ज: मस्तानी*
*क्रोध में आंख फेर के, बोला हाथ से बाण गेर के*
*मेरा हृदय सच्चा साफ है, मैं जाण गया पापी,*
*तेरे मन में पाप है।। टेक ।।*

गुरु पै दोष धरै, तेरी बुद्धी पागलपन में,
शेर सदा गरजै, ना कभी डरै बन में,
म्हारा रण में मेल बतांवे, गुरु शिष्य का खेल बतावे,
तेरा कहना घणा खिलाफ है।।1।।

(29)
*तर्ज: मस्तानी मिलवां*
*मेरी प्यारी घर पै रहिये, मेरे पिया कुछ मत कहिये,*
*मैं चालूंगी तेरे साथ में,*
*तेरा महावारी मनिआर्डर, आजा महल में।। टेक ।।*

मेरी गैल प्यारी, मेरे कन्धे पर रैफल रहे री,
मनै सिंहनी जान लिये, वो शेर सिपाही केहरी,
तू मेरी बात मान ले, मेरा अपना गात जान ले,
सदा रहूंगी आपकी टहल में,
तू मन मन के गोले सुण सुण, मरजा दहल में।।1।।

(30)
*तर्ज: सांगीत*
*वो जब सै देखा गात बात दो, साथ करा चाहूँ मैं।। टेक ।।*

छाती नै उभार बाहर, सार दो खिलावण लगी,
तिरछी नजर कटार मार, धार सी चलावण लगी,
होली कैसा त्यौहार नार, तार से मिलावण लगी,
बिजली सी चमकै तन में, दिन में घन पाटण लगी,
कर कै गेरा लोट-पोट, होंठ से फेर चाटण लगी,
हंस बोली बतलाई आई, दरद दवाई काटण लगी,
दई डार नैन की चोट घोट, गल जोट फिरा चाहूँ मैं।।1।।

(31)
*तर्ज: सांगीत चलत*
*बन्दे सोच समझ कै देख,*
*यू माया काया गैल ना चलै।। टेक ।।*

मनुष्य जन्म पाया जैसे, नदी नाव संयोग,
काम क्रोध अहंकार, काया में अनेकों रोग,
गुरु की शरण में जाके, मिटते हैं सारे सोग,
चतराई चलै ना कोई, उन्नति या उद्योग,
पैदा सो नापैद जग में, अमर नहीं कोई लोग,
करमों के अनुसार जीव, भोगता समय पै भोग,
लिखे करम के लेख, होणी कभी टाली ना टलै।।1।।

*दोहा*
सुन कासिद की बात को सभी रहे चुपचाप।
शोक मोह के चक्कर में चित्त चंचल प्रताप।।

(32)
*तर्ज: कली सांगीत*
*प्रतापसिंह ने खोल लिया परवाणा,*
*बांचन लाग्या हाथ कांप गये, रोवण लगा महाराणा।। टेक ।।*

पहले तो नमस्ते ओ३म् राम राम लिखी पाई,
दूसरे खुश राखे सबको माता श्री गंगे माई,
तीसरे पिता जी समय शादी की नजदीक आई,
आप तो जाणो हो मेरे सिर पै जो कुछ पड़ी तवाई,
मेरे बस की बात नहीं आप करियो मन की चाही,
और क्या लिखूं मैं ज्यादा मिलती नहीं रोशनाई,
मुश्किल तै कागज पाया, मेरा हो लिया निर्वाणा।।1।।

(33)
*तर्ज: बहर-ऐ-तवील*
*ताना मारा था हंसके, मेरी छाती में चसके,*
*तू नागन सी डसके, बिल में बड़ी हो।। टेक ।।*

वो कड़वी थी बोली, लगी छाती में गोली,
तारा दाम और चोली, तू नंगी खड़ी हो।।1।।

(34)
*तर्ज: बहर-ऐ-तवील अन्यतम*
*बचन जो लिये हैं इसी वास्ते, करना पड़ेगा ये ही काम हो,*
*मना करदो हम चले जायेंगे, हम साधू हैं रमते राम हो।। टेक ।।*

ज्ञान घट में भरो, ध्यान मन में धरो,
आप क्षत्री हो, मरने से मतना डरो,
दान राजा जी हंस के, सुत का करो,
तेरा दुनिया में, सबसे बड़ा नाम हो।।1।।

(35)
*तर्ज: बहर-ऐ-तवील (हरियाणवी)*
*नाव जल में पड़ी, माया सन्मुख लड़ी, चार आंखे लड़ी, राजा चकरा गया,*
बात कैसे कहूं, केसे चुपका रहूं, तेज तन का कहूं, आग लगते ही नया।। टेक ।।*

भोली भाली शकल, दीखे सोना भी नकल, कुछ ना रही अकल, जी जाल फया,
जो ये राणी बणे, तो सुहाणी बणे, खुशी प्राणी बणे, रंग होजा नया।।1।।

(36)
*तर्ज: बहर-ऐ-तवील (हरियाणवी अन्यतम)*
*तू रहती महल में, दासी टहल में,*
*म्हारी गैल में, तेरा गुजारा नहीं है।। टेक ।।*

होजा दुख सहना, सुनले ये कहना,
म्हारा कुटिया में रहना, चुबारा नहीं है।।1।।

(37)
*तर्ज: नाटकीय*
महलों में ये रंग हो रहा, और अब रंग सुनो दरबार का,
बाजी जुवे की लो लगा, कहना धर्म औतार का,
आवो राजा एक बाजी, लगायेंगे दिल बहलायेंगे,
एक दो चाल जुवे की बनायेंगे।।

(38)
*तर्ज: नाटक वार्ता*
द्रोपदी कहा पति जी ब्याह का कोई इन्तजाम है, आपके पास कोई छदाम है,
ब्याह में लुटाये जाते दाम है, आपके पास राम का नाम है,
अर्जुन क्यों नहीं! सब बात की बहार है, राजा कंवलनैन राज देने तक तैयार हैं,
फिर क्या देर दार है, द्रोपदी बता तेरा कैसा विचार है,
द्रोपदी शर्म करो शर्म, जिसका अन्न खाया, मोज में समय बिताया,
डाका डालना उसी के घर चाहया, कायरता का लालच हृदय में समाया,

(39)
*तर्ज: लोकगीत*
*आइयो री लुगाइयों, म्हारे गाईयो गीत,*
*बेटा आया म्हारा, कैरों ने जीत।। टेक ।।*

गंगाजल का लोटा और, कंचन का लेके थाल,
आरता सजालो दिया, चौमुखा धरो बाल,
मेंहदी रोली हल्दी चावल, हरी दूब के नाल,
गिरी छुवारे लाल कलावे, पान मिठाई माल,
खंवे और उठावें म्हारे, कुल की है रीत।।1।।

(40)
*तर्ज: लोकगीत अन्यतम*
*न्हाले री लाडो बटना मल के,*
*तेरी चाची बुआ, बाहण गावें गीत।। टेक ।।*

तडक़े बरात तेरे, पिया जी की आवेगी,
हे बनड़ी बनके, दर्शन उनके पावेगी,
चला री लाडो पांया नै संभलके, हो बेटी की जात,
पराई बेटे वाले को जीत।।1।।

(41)
*तर्ज: शामिल/उपरातली/मिलवा*
*राणी- मान चाहे मत मान पियाजी, मेरा तो ठीक विचार रहै,*
*राजा- मनसा पाप करे तू राणी, बुद्धि पै भूत सवार है।। टेक ।।*

राणी- भूत आपके घर में साजन, नैम धर्म सब भंग हुआ,
राजा- तेरी बात सुणके राणी, मेरा बोलता तंग हुआ,
राणी- रंग ढंग बदरंग हुआ, थारी माता को इश्क का ओजार है,
राजा- ऐसी बात सोचना प्यारी, ख्याल कतई बेकार है।।1।।

*तर्ज: शामिल/उपरातली/मिलवा (चौकलिया)*
(42)
*सत्यवान बियाबान में, सावित्री तनै कष्ट उठाणा होगा,*
*सावित्री पतिव्रता नै पति प्रेम से, दु:ख बटाना होगा।। टेक ।।*

सत्यवान: मेरे दुख नै सावित्री, तू किस तरियां बांटैगी,
सावित्री: जो कुछ आज्ञा आप करो, ना सावित्री नाटैगी,
सत्यवान: नाजुक हाथ मुलायम तेरे, तू कैसे लकड़ी काटैगी,
सावित्री: चल कटी कटाई आली, सूकी अलग अलग छांटैगी,
सत्यवान: भारी बांध भरोटा लक्कड़ सिर पै ठाणा होगा,
सावित्री: मजदूरी का काम किसी का, नहीं उल्हाणा होगा।।1।।

(43)
*तर्ज: राधेश्याम / दौड़ / वार्ता / सरडा*
गुलाबसिंह के सर सेहरा, बड़े जोर का काम किया,
कंचन कवच और कड़ा कटारा, घोड़ा एक इनाम दिया,
बंटी मिठाई घर-घर में, और ज्ञान ध्यान की बात हुई,
सो सो के टैम सभी सोगे, और घोर अन्धेरी रात हुई,
परवा पवन चले बादल में, ठिमक ठिमक बरसात हुई,
राजबाला के मन में कुछ, काम रूप की चाहत हुई,
देखके श्यान पति की एकदम, आंखों में आंसू बहन लगी,
पेट की पन्हा जवान सती, न्यूं हाथ जोड़के कहन लगी।।

नोट:- व्याकरण आचार्य श्री सत्यवान शर्मा साल्हावासिया के अनुसार उपरोक्त इन दोनों छंद कलाओ (राधेश्याम/दौड़) के माहिर शम्भुदास, प. रतिराम, प. महोरसिंह, प. गुणी सुखीराम, प. नंदलाल आदि थे, लेकिन जहाँ तक सर्वप्रथम इस छंद के गायन का प्रमाण मिलता है वो शम्भुदास जी का ही मिला और इस छंद की गायनता से सबसे ज्यादा प्रभावित प. नंदलाल जी- पाथरआळी ने किया था। जिस प्रकार घड़वे बैंजु के साज की शुरुआत तो हमारे बुजुर्गो ने खेतो में गाते बजाते की लेकिन सबसे ज्यादा प्रभावित प. जगन्नाथ ने किया था। ठीक उसी प्रकार नंदलाल जी ने इस दौड़ या राधेश्याम कला को मुख्यतः प्रभावित किया। शम्भुदास जी की जकड़ी या दौड़ रूपी कुछ पंक्तिया निम्नलिखित है –

पंडित बेग बुलाय, लग्न लिखो शुभ घड़ियाँ ।।टेक।।

दोषरहित शोधो शुद्ध साहा,
दौ दिश सब बिध रहे उछाहा,
जोशी कहत सुनो महारानी,
साहा शुद्ध सदा सुख दानी,
इतनी चूक शूक जी आड़े,
यूँ कह गये ज्योतिषी ठाड़े,
बोले सुनत कंवर अभिमानी,
रुक्मराज मंत्री से बानी,
सुर सत भाट पठाय जत्न करो तड़भड़ियां।।
– (शम्भुदास जी)

साहित्य और संगीत दोनों को साथ साथ प्रचलित शंभुदास ने किया। पं रतिराम और शंभुदास दोनों गुरुभाई थे। पं रतिराम ने भी जंगम और जकडी को शंभुदास के साथ खूब गाया। ये संगीत की शैली हैं जिन्हें द्रुत लय में गाया जाता है। बाद में अल्प शिक्षित लोक गायकों ने इसे दौड नाम दे दिया जो एक ग्राम्य शब्द था जिसे देसी लोग बोलते थे। कालान्तर में यह शब्द प्रचलित हो गया। इसी दौड को त्रिभंगी छंद के रूप में सर्वप्रथम बांधकर गाना शुरु किया फिर दादा महोर सिंह ने।

(44)
*तर्ज: चलती (दौड़ / राधेश्याम / वार्ता / सरडा)*
नहीं समझ में आती, सुन-सुन पाटै छाती,
आज भरे दरबार बीच, अपना अपमान कराती।। टेक ।।

एक दिन था माता नै, कोख में सुवाई तू,
नौ महीने तक कष्ट झेल, फेर लड़की जाई तू,
लाड चाव प्रेम करकै, गोदी में खिलाई तू,
गर्म सर्द पानी करा, साबुन सै नहलाई तू,
आज कड़वी बात कहै, री मुझे नहीं भाई तू,
मानी नहीं बात तनै, बहुत सी समझाई तू,
क्यों पत्थर को चाहती, आज पति बनाती,
इसकी गैल कहै, आज मैं ब्याह रचाती ।।1।।

मेरा कहना मानजा तो, सही वर तलाश करूं,
राजपाट शक्ति देख, फेर लड़का पास करूं,
जोड़ी का भरतार देख, तनै ना उदास करूं,
मेरी बात मान छोरी, तेरे सै अरदास करूं,
बराती रंगदार और, कृष्ण कैसा रास करूं,
लाड चाव करकै राखे, ऐसी तेरी सास करूं,
सजकै चले बराती, रेडियो भी गाती,
नई नई फिल्मों की, रंगत चलै सुनाती।।2।।

डस ले काली नागिन, मेरी आन तोड़ रही,
शत्रु जो मेरा उससे, अपनी प्रीति जोड़ रही,
मानै नहीं कहन मेरा, अपनी किस्मत फोड़ रही,
मेरी बेटी होकै आज, मेरे सै मुँह मोड़ रही,
रजपूती दंगल के म्हा, कर इतनी मरोड़ रही,
पत्थर की तस्वीर देख, जिसके साथ दौड़ रही,
आज नहीं मन को भाती, पिता को नीचा दिखाती,
ये पत्थर की तस्वीर, साथ में जिसके जाती।।3।।

कुल मर्यादा मेरी, करकै आज भंग चली,
क्षत्री घर की लड़की, बनकै पाप की पतंग चली,
दरवाजे पै पहरेदार, जिसके छोरी संग चली,
मुँह ना दिखावें राजा, करकै ऐसा ढंग चली,
हृदय में कटारी मार, करकै ऐसा जंग चली,
पत्थर की तस्वीर को, तू बनाकै नै किंग चली,
रघुनाथ धर्म का नाती, क्यूं नहीं बुलाती,
आपस की फूट जा लूट, रहे ना कोई हिमाती।।4।।

(45)
*तर्ज: मल्हार*
*रात अंधेरी जी जलै, मौत भी टलै,*
*पर बैरन जोट ना टलै।। टेक ।।*

पांव भी ना फैलें, मेरी पतली रिजाई,
जोट पै चला गया, मेरी ननदी का भाई।।
जाडा पड़े कसाई, काया ओला सी गलै।।1।।

(46)
*तर्ज: राग मल्हार*
*घोड़े का देखा असवार, संयोगिता नै फूल बखेरे, शर्मा गई।। टेक ।।*

साजन जो पास आये, रंग में रघुनाथ छाये,
गाये राग मल्हार, संयोगिता नै राग के सपेरे, शर्मा गई।।4।।

(47)
*तर्ज: दोहा (छंद रूपी)*
बड़ी खुशी हुई गात में, हो गई जै जै कार,
दान धर्म कर राव जी, और खुश हुये सरदार।।

(48)
*तर्ज: काफिया (छंद रूपी)*
न्यूं तो मै भी जाणु हूँ, ईश्वर काज सारता देख्या,
चाहे क्षत्री का शरीर कटज्या, ना वचन हारता देख्या,
पिता पुत्र अपने को कभी,नहीं मारता देख्या,

(49)
*तर्ज: सवैया (छंद रूपी)*
पूजा करी बड़े भाव से, प्रसाद चरणामृत पिया,
आपकी कृपा हुई उपकार, दुखिया का किया,
ऐसे समय पर आन कर, मुझे सहारा पूरा दिया,
नैन पुलकित हो गये, और उमड़ कर आया हिया।।

(50)
*तर्ज: चौबोला/चमोला (छंद रूपी)*
दोहा- जाता बालम देख के, आई पिछली याद,
पूरा मेरा पर्ण हो, तेरह साल के बाद।।
सवैया- उत्तरा कंवारी बात सुन, द्रोपदी ने रिष भरके कही,
जाता गुरु लडऩ तेरा, कुछ कसर बाकी ना रही,
खेली नहीं गुडिय़ा कभी, बालक अवस्था खो लई,
दुर्योधन का तू सेला मंगा, गुडिय़ा बनाऊँगी नई।।

(51)
*तर्ज: गजल (छंद रूपी)*
*फुरकत में जो खामोश हुवे, पलकों से इशारा करते हैं,*
*इश्क में जिसने पुर दिया, गम खाकर गुजारा करते हैं।। टेक ।।*

ऐश अशरत चाहने वाले, हैं नाज जिन्हें ऐमालों पर,
तदबीर इरादा फेल करे, तकदीर से हारा करते हैं।।1।।

(52)
*तर्ज: चौपाई (छंद रूपी)*
उबरे अन्त ना होय निभाऊं, काल नैम जिमि रावण राह।।

(53)
*तर्ज: अन्यतम छंद*
इतना दुख था सीता जी को, कवि कोई नहीं लिख सकता है।
जो मुँह से रोज महेश कहैं, तो वाक्य ना ताकत रखता है।।
उस वन में बाल्मीकि जी, चौमासे मैं तपते थे।
योग समाधि लगाकै माला, हरी के नाम की जपते थे।।
आठ महीने गंगाजी पर, कुटी बनाके रहते थे।
चार मास श्री हरनन्दी के पास, बालैनी मैं कहते थे।।
उसी समय कुटिया के बाहर, आकर पवन पान करते थे।
जो रोती फिरती थी, वो आवाज ध्यान में धरते थे।।

(54)
*तर्ज: कव्वाली*
जहां राजा भी अन्याई हो, और प्रजा भी दुखदाई हो,
जहां भाई का दुश्मन भाई हो, उस राज में रहना ठीक नहीं।।
जहां मां बेटे को खाती हो, और झूठे पलम लगाती हो,
और राजा भी उसका साथी हो, उस राज में रहना ठीक नहीं।।
जहां धर्म की नहीं रवा हो, साबूत भी बिना गवाह हो,
और पाप इश्क की चली हवा हो, उस राज में रहना ठीक नहीं।।
जहाँ दया धर्म का साथ नहीं, और विद्या की करामात नहीं,
रघुनाथ वहाँ गोरखनाथ नहीं, उस राज में रहना ठीक नहीं।।

(55)
*तर्ज: शायरी*
शुक्र किया राव ने मन में, शौक था फकीर का।
आज मैं बूझूंगा उनसे, हाल कुछ तकदीर का।।
भोजन का कर प्रबन्ध सब, भण्डारा हलुवा खीर का।
कर दिया प्रश्र तुरंत, दिल की लगी तहरीर का।।

(56)
*तर्ज: कीर्तन रूपी*
*उठ जल्दी जाग, सहम सोता*
*मन धोले दाग, लगा गोता।। टेक ।।*

चलो सत्संग में, सत की कहानी सुनैं,
बात पूर्ण धर्म की, पुराणी सुनै,
ऋषि मुनियों से, अमृत की वाणी सुनै,
ताल भैरो तराणा, तराणी सुनै,
सुनै ग्यान वैराग भला होता।।1।।

(57)
*तर्ज: पद*
*सुरपति इन्द्र महाराज का डिगा मन, अहिल्या नारी पै।। टेक ।।*

अहिल्या के रूप की, सब देवों ने बड़ाई करी,
गठीला शरीर नारी, जवानी मस्ती में भरी,
नैन हैं कटाक्ष बाण, बोली है कोयल सै खरी,
तीन लोक में दूसरी ना, और कोई ऐसी बीर,
गर्दन है सुराहीदार, आता जाता दीखै नीर,
नाजनी नमकीन सुभा, सादी भोली गम्भीर,
हो! आशिक दिल आवाज का, लगै झलक स्यान प्यारी पै।।1।।

(58)
*तर्ज: शब्द*
*चली चली रे चली रे एक नीत बदी में,*
*ना करी कार भली रे।। टेक ।।*

वहम का भयानक भूत, बहता रहा बैल हुया,
अहंकारी अंकुश पक्का, हाँकने को गैल हुया,
पाप का पुजारी पेट, पालने को फैल हुया,
मामता मरोड़ माया मन में, मन का ख्याल हुया,
सैलानी सपाटा पक्का मैं, इरादा सैल हुया,
स्यान का सिंगार करके, सुथरा बांका छैल हुया,
गली गली रे गली रे, घूमा गदा गदी में,
गल में जंजीर घली रे।।1।।

(59)
तर्ज: वाणी
गुरु की शिक्षा दीक्षा तैं, शरीर का साज सजे है,
त्रिकुट नगरी शून्य महल में, अनहद साज बजे है।। टेक ।।

या ब्रज में रास करने वाले, रूकमण राधेश्याम दिखा,
या श्रीशुकदेव भजन करते, सैर गंगाजी का धाम दिखा,
नल नील राम की सेना में, करते शिल्पकारी का काम दिखा,
नीच बादशाह मुसलमान का, फोटू ठावे मतना।।1।।

(60)
*तर्ज: मंगलाचार*
*गावें सखी झूम आज, म्हारे ललना हुआ।। टेक ।।*

नन्हा सा बच्चा, है अलबेली जच्चा,
मौसम सुहाना हुआ, है कैसा अच्छा,
पायल बाजें झूम झूम, आज म्हारे ललना हुआ।।1।।

*दोहा*
राम नाम लड़वा, गोपाल नाम घी।
हर के नाम मिश्री, तू घोल-घोल पी।।
(61)
*तर्ज: कहरवा*
*लूटो-लूटो नसीबों वाले, ये राम नाम लुट रहा जी।। टेक ।।*

राम नाम की लूट है, लूटी जा सो लूट,
फिर पीछे पछतायेगा, जब प्राण जायेंगे छूट,
ढूंढ़ो ढूढ़ो नसीबों वालों, के देव धाम छुट रहा जी।।1।।

(62)
*तर्ज: रंगत ठेस*
*ख्याल हुवा सुणकै, बात स्वयम्बर में,*
*क्रोध में काया कांप उठी।। टेक ।।*

लागी चोट जिगर सेही का, यहां आणा बेहा बेही का,
ढंग पारथ की देही का बेहाल हुवा,
अब योद्धा अव्वल नम्बर में, यहां हम सबकी लाज लुटी।।1।।

(63)
*तर्ज: झूलना मंडावर*

*सुनके फेर माली की बात, एकदम भरग्या खुशी में गात,*
*लेकर मंत्री को साथ, चला था महलों में खबर ये पहुंचाने।। टेक ।।*

सब नगरी हो लई तैयार, सन्त से मिलन चला सरदार,
शहर के सभी चले थे नर नार, बच्चे वृद्ध पुरुष और नारी।।1।।

(64)
*तर्ज: कड़ा*
धीरज धर्म शान्ति करके, दिल नै करले ढेट,
सतगुरु की माया ने, थारा दिया कष्ट सभी का मेट,
पूर्णमल की शक्ल का सुथरा, तेरे माता हो जागा बेटा।।

(65)
*तर्ज: सोहनी*
*तेरे कष्ट मिट जांगे, अभी गेरूं दवाई आंख मे ।। टेक ।।*

जब ख्याल आया मात का, करा ध्यान गोरखनाथ का,
जस राख के इस हाथ का, यूं फेरी सलाई आंख में।।

(66)
*तर्ज: सर्राफा*
भरा नैन में नीर, मोरध्वज राजा का एकदम कांपन लगा शरीर।
पड़ा गश खाके, मैं बहुत घणा पछताया छल में आके।
फेर कालजा भींच, न्यूं बोला दो साधू आये दरबार के बीच।
शेर हैं संग में, तेज रूप हैं अजब निराला ढंग में।
आज मुझे बहकाय, शेर जिमाने के वचन लिये तीन भरवाये।
करा ना धड़ का, शेर के खावण खातर मांगे लडक़ा।
धीरध्वज का मांस, मांग रहे दो साथ होलिया मेरे धर्म का नाश।
अटक गया रोड़ा, ये संत नहीं छलिया हैं सत् के तोड़ा।।
चतुर हुए मतहीन, शेर जिमाने को रानी मैंने वचन भरे हैं तीन।

(67)
*तर्ज: देहाती*
*तेरे हाथ में बात, आबरू डाटिये रानी,*
*भर लिये वचन भूल में, तू बेशक नाटिये रानी।। टेक ।।*

बेटे के देणे हो, होजा जग में अन्धेरा,
जिसके लागे वो ही जाणे, और नै के बेरा,
मेरा तेरा बेटा, आज बांटिये राणी।।1।।

(68)
*तर्ज: मोहनी*
*उस दिन भेट में ना गये, जिस दिन चढ़े थे बरात में।। टेक ।।*

तू तेग लेके ना तणा, और चाव रंग था में घणा।
और शौक में बनड़ा बणा बटणा मला था गात में।।2।।

(69)
*तर्ज: आड़ी*
*चली ढाल ढाल सावित्री, धर्मराज की गैल,*
*अपने ध्यान में लगी।। टेक ।।*

ये संसार रूप बड़ा सुन्दर, माया नाच रही मन अन्दर,
पड़ी बीच समन्दर जल कतरी, करती आसमान की सैल,
झाल तूफान में लगी।।1।।

(70)
*तर्ज: टेस की*
*कवि गन्धर्व गावेंगे तेरी करनी, लोक गीत होली*
*धर्मराज गया हार सती, सावित्री तेरी जीत होली।। टेक ।।*

विषय वासना सब तजने से, जग में पूरा कर्म मिलै,
सब में आत्मा एक समझले, उसके धोरै धर्म मिलै,
भगती से भगवान मिलाया, भाव का भारी भरम मिलै,
शिरोमणि सतियों में ऊंची, सावित्री तेरी शर्म मिलै,
सत्यवान के साथ जिन्दगी, पूरी प्यार प्रीत होली।।1।।

(71)
*तर्ज: विहाग*
*आरी मेरी जान बचाले मेरी माँ,*
*लाल तेरा खा लिया काले नाग नै।। टेक ।।*

पाणी कैसा बुलबुला था, एक फटके में फूट लिया,
बोला कोना जाता, मेरा साँस अधम में टूट लिया,
काले फण वाले ने मेरा, पाँ लेटे का चूंट लिया,
अब तो मेरी आँखा में, अन्धेरी गई छा,
दिया फूँक जहर की आग नै।।1।।

(72)
*तर्ज: डैरू (तराना)*
*कर्म घटादे कर्म बढ़ादे, राम सभी के प्यारे,*
*एक बाप के दो बेटे, और कर्म बणा दिये न्यारे।। टेक ।।*

एक बेल और फूल हैं कितने, कर्म अलहैदा लेरे,
ऋषि मुनि और कविजनों ने, दिये मिशाल भतेरे,
कितने ही फूल चढ़े सर ऊपर, बणे बने के सेहरे,
कितने ही फूल उठा किस्मत नै, ल्या अर्थी पै गेरे,
दाने देव मनुष्य गण चातर, कर्म के आगे हारे।।1।।

(73)
*तर्ज: खड़ी जावली वाली*
*शीश गेरा गर्दन में, चला चूड़ावत सरदार।। टेक ।।*

वस्त्र लाल लहूँ में हो गये, रोया धो धो धार,
आँसू पूँछ जोश मैं भरकै, घोड़े पै हुआ सवार।।1।।

(74)
*तर्ज: कवि की निजी*
*जवान बीर की गैल, क्यूं कर रहे तंगी*
*तर तर तर तर बोलन वाली, बोल गई घनी*
*तेरे हो रहा नशा जवानी का, तू बावली बनी*
*इश्क में होरी सै अन्धी, बात क्यूं सोचली गंदी।। टेक ।।*

लहू तू मेरे तन का चाटन वाली, रंग पाप का छांटन वाली,
बेटे का सर काटन वाली, तेग सी तनी,
अच्छा बुरा देखने वाला, एक सी घनी,
उसने मत भूले बन्दी, बात क्यूं सोचली गंदी।।1।।

(75)
*तर्ज: कवि की निजी*
*दिल के बैन, सुण नहीं चैन, मेरे फूटे नैन देख लेगी,*
*अब सभा में आनन्द रंग बरसे।। टेक ।।*

इतनी खोटी बात कही, सुन धरती भी डोल गई,
चित्त में चक्कू चुभो दिया, और चलने जी को छोल गई,
मैं जाणूं या मामा जाणे, तरंग में त्रिया बोल गई,
इज्जत और आबरू सारी, बिना तोल बेमोल लई,
बिना भाव, बिक लिया राव, मेरे दिल का घाव, सेक लेगी,
बीमार पड़ा पल पल तरसै।।1।।

(76)
*तर्ज: कवि की निजी*
राम राम करकै, जोश में भरकै, धीरज धरकै,
चल पड़ा, दया धर्म वालों का, हृदया हल पड़ा।। टेक ।।

कोरा बोली मेरे लाल को, क्यूं मारो बिना खोट,
मजहब की अदावत नै, दिया धर्म का गला घोट,
बोला भी ना जाता मेरे सै, सूख लिये प्यासी के होट,
चाटे ना सहकै, रोवे रह रह कै, बहकै आंखों सै जल पड़ा।।1।।

(77)
*तर्ज: अज्ञात रागनी तर्ज*
*कौन खड़ी रै, तले नै लखावै सै*
रंग बेतोल हंस के बोल घूंघट खोल, घणी क्यूं शरमावे सै।।टेक।।

उठे प्रेम की हूक, गया काया की सुध बुद्ध भूल,
फूलझड़ी रै आग सी उछठावे सै,
जणै पूर्णमासी की रात, कोय ना चांदणे की चाहत,
तेरा गोरा गोरा गात, गोरी चन्दा नै घटावे सै।।1।।

(78)
*तर्ज: अन्यतम अज्ञात रागनी तर्ज *
*ऐ रै रै तेरै ताली ।। टेक ।।*

ना भरूं दूध में घूँट, झूठ नै लूट लिया पाली,
जा टूट रही सै तुण, लिया जिक्र ब्याह का सुण,
बण आशिक खाई गाली,
लूट लिया निर्भागण आज, तू हीर नाग काली।।1।।

सांग विधा के सांगीतकारों का व्यक्तित्व एवं कृतित्व:-

1 सुर्यकवि पं0 लख्मीचन्द :-

हरियाणवी भाषा के प्रसिद्ध कवि व सांग कला की अमर विभूति पंडित लख्मीचंद हरियाणा लोक संस्कृति का अभिन्न अंग है। सांग कला को अनेक महान शख्सियतों ने अपने ज्ञानए कौशल, हुनर और परिश्रम से सींचकर अत्यन्त समृद्ध एवं गौरवशाली बनाया। ऐसी महान शख्सियतों में से एक थेए सूर्यकवि पंडित लख्मीचन्द। उनका जन्म हरियाणा के सोनीपत जिले के गाँव जांटी कलां में पंडित उदमी राम के घर 15 जुलाई, 1903 को हुआ.

लख्मीचंद बसै थे जाटी जमना के कंठारै,
नरेले तै तीन कोस सड़के आजम के सहारै, (प.मांगेराम-सांग नौरत्न)

उनके दो भाई व तीन बहनें थीं। वे अपने पिता की दूसरी संतान थे। परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक न होने के कारण बालक लख्मीचंद पाठशाला न जा सके तथा आजीवन अशिक्षित रहे। सात-आठ वर्ष की बाल्यावस्था में इन्हें पशु चराने का काम सौंपा गया। गायन की ओर इनका रूझान बचपन से था। जब कभी आसपास के गांव में भजन, रागनी अथवा सांग-मंचन का कोई कार्यक्रम होता, वे वहां अवश्य जाते थे। भले ही वे गरीबी एवं शिक्षा संसाधनों के अभावों के बीच स्कूल नहीं जा सके, लेकिन ज्ञान के मामले में वे पढ़े-लिखे लोगों को भी मात देते थे। उन्होंने अपने एक सांग ‘ताराचन्द’ में अपनी अनपढ़ता का स्पष्ट उल्लेख करते हुए कहा है-

लख्मीचंद नहीं पढ़रया सै, गुरु की दया तै दिल बढ़रया सै,
तेरै बनड़े कैसा रंग चढ़रया सै, रूप म्हारे मन भाग्या,
सच्चे मोतियाँ का जुड़ा हाथ कड़े तै लाग्या।
भली करी थी पनमेशर नै, तूं राजी-ख़ुशी घर आग्या।।

सात आठ वर्ष की उम्र मे ही उन्होंने अपनी मधुर व सुरीली आवाज से लोगो का मन मोह लिया और ग्रामीण उनसे हर रोज भजन व गीत सुनांने की पेशकश करने लगे। फिर कुछ ही समय मे लोग उनकी गायन प्रतिभा व सुरीली आवाज के कायल हो गए। अब उनकी रूचि सांग सिखने की हो गई थी। उसके बाद दस-बारह वर्ष की अल्पायु में ही बालक लख्मीचंद ने बसौदी निवासी श्री मानसिंह जो कि अंधे थे, उनके भजन कार्यक्रम से प्रभावित होकर उनको ही अपना गुरू मान लिया। सांग की कला सीखने के लिए लख्मीचन्द कुण्डल निवासी सोहन लाल के बेड़े में शामिल हो गए। अडिग लगन व मेहनत के बल पर पाँच साल में ही उन्होंने सांग की बारीकियाँ सीख लीं। उनके अभिनय एवं नाच का जादू लोगों के सिर चढक़र बोलने लगा। उनके अंग अंग का मटकना, मनोहारी अदाएं, हाथों की मुद्राएं, कमर की लचक और गजब की फूर्ती का जादू हर किसी को मदहोश कर डालता था। जब वे नारी पात्र अभिनीत करते थे तो देखने वाले बस देखते रह जाते थे। इसी बीच फिर एक दिन सोहनलाल सांगी ने लख्मीचन्द के गुरु पंडित मानसिंह सूरदास के बारे में कुछ असभ्य बात मंच पे कहदी तो लख्मीचन्द गुरु भक्ति के कारण इस कटु वचन को सह न सके और उन्होंने सोहन लाल का बेड़ा छोडऩे का ऐलान कर दिया। इससे बाद कुछ संकीर्ण मानसिकता के लोगों ने धोखे से लख्मीचन्द के खाने में पारा मिला दिया, जिससे लखमीचन्द का स्वास्थ्य खराब हो गया। उनकी आवाज को भी भारी क्षति पहुंची। लेकिनए सतत साधना के जरिए लख्मीचन्द ने कुछ समय बाद पुनः अपनी आवाज मे सुधार किया और उसके बाद उन्होंने स्वयं अपना बेड़ा तैयार करने का मन बना लिया। फिर पंडित लख्मीचंद ने अपने गुरु भाई जैलाल उर्फ़ जैली नदीपुर माजरावाले के साथ मिलकर मात्र 18-19 वर्ष की उम्र में ही अलग बेड़ा बनाया और सांग मंचित करने शुरू कर दिए। अपनी बहुमुखी प्रतिभा और बुलन्द हौंसलों के बल पर उन्होंने एक वर्ष के अन्दर ही लोगों के बीच पुनः अपनी पकड़ बना ली। फिर उनकी लोकप्रियता को देखते हुए बड़े-बड़े धुरन्धर कलाकार उनके बेड़े मे शामिल होने लगे। सांग के दौरान साज-आवाज-अंदाज आदि किसी भी मामले मे किसी भी तरह की लापरवाही लख्मीचंद को पसंद नहीं थी। उन्होंने अपने बेड़े मे एक से एक बढ़कर कलाकार रखे और सांग कला को नई ऐतिहासिक बुलन्दियों पर पहुंचाया। अब यहाँ ऐतिहासिक सांग ‘नल-दमयंती’ के अन्दर से उनकी एक बहुचर्चित सहज रचना इस प्रकार पेश है कि-

छोड चलो हर भली करैंगे, कती ना डरणा चाहिए,
एक साड़ी मै गात उघाड़ा, इब के करणा चाहिए ।। टेक ।।

गात उघाड़ा कंगलेपण मै, न्यूं कित जाया जागा,
नग्न शरीर मनुष्य की स्याहमी, नही लिखाया जागा,
या रंगमहलां के रहणे आळी, ना दुख ठाया जागा,
इसके रहते मेरे तै ना, खाया-कमाया जागा,
किसे नै आच्छी-भुंडी तकदी तो, जी तैं भी मरणा चाहिए ।।

फूक दई कलयुग नै बुद्धि, न्यूं आत्मा काली होगी,
कदे राज करूं था आज पुष्कर के, हाथं मै ताली होगी,
सोलह वर्ष तक मां-बापां नै, आप सम्भाली होगी,
इब तै पतिभर्ता आपणे धर्म की, आप रूखाली होगी,
खता मेरी पर राणी नै भी, क्यों दुख भरणा चाहिए ।।

एक मन तै कहै छोड़ बहू नै, एक था नाटण खातर,
कलयुग जोर जमावै भूप पै, न्यारे पाटण खातर,
बुद्धि भ्रष्ट करी राजा नल की, न्यूं दिल डांटण खातर,
एक तेगा भी धरणा चाहिए, साड़ी काटण खातर,
फेर न्यूं सोची थी कलयुग नै, एक तेगा धरणा चाहिए ।।

राणी साझैं पड़कै सोगी, राजा रात्यूं जाग्या,
उसी कुटी मै इधर-उधर, टहल कै देखण लाग्या,
राजा नल नै खबर पटी ना, भूल मै धौखा खाग्या,
फिर कलयुग तेगा बणकै, भूप नै धरा कूण मै पाग्या,
लख्मीचन्द दिल डाटण खातिर, सतगुर का शरणा चाहिए ।।

पं0 लख्मीचन्द ने हरियाणवी सांग को नया मोड़ दिया। उनकी प्रतिभा से प्रभावित होकर श्री रामनारायण अग्रवाल ने ‘सांगीतः एक लोक-नाट्य परम्परा’ नामक ग्रंथ में स्पष्ट किया है- ‘‘इन सब सांगियों में लख्मीचंद सर्वाधिक प्रतिभावान थे। रागनी के वर्तमान रूप के जन्मदाता वास्तव में लख्मीचंद है। कबीर की भांति लोक भाषा में वेदान्त तथा यौवन और प्रेम के मार्मिक चित्रण में लख्मीचंद बेजोड थे। इन जैसा लोक जीवन का चितेरा सांगी हरियाणे में दूसरा नहीं हुआ। पं0 लख्मीचंद के बारे में उनके शिष्य पं0 मांगेराम ने ‘खाण्डेराव परी’ नामक सांग में इस प्रकार कहा-

लख्मीचंद केसा दुनियां म्हं, कोई गावणियां ना था।
बीस साल तक सांग करया, वो मुंह बावणियां ना था।
वो सत का सांग करया करता, शर्मावणिया ना था।
साची बात कहणे तै, कदै घबरावणियां ना था।

इस प्रकार हरियाणवी सांग को तपाकर कुन्दन बनाने वाले सूर्यकवि पंडित लख्मीचन्द एक लंबी बीमारी के उपरान्त 17 जुलाई, 1945(17 अक्तूबर, 1945) की सुबह इस नश्वर संसार को छोडक़र परमपिता परमात्मा के चरणों में जा विराजे और वे अपनी अथाह एवं अनमोल विरासत छोडक़र चले गए। महान् सांगीतकार पं0 लख्मीचंद को सामाजिक, सांस्कृतिक एवं धार्मिक पक्षों का व्यावहारिक ज्ञान था। उनके सांगीतों में सामाजिक रिश्तों का चित्रण सांस्कृतिक मूल्यों व आदर्शाें के अनुरूप ही हुआ है। ‘सत्यवान सावित्री’ नामक सांगीत में माता-पिता अपनी पुत्री सावित्री के जवान होने पर उसके विवाह की चिन्ता करते है। राजा अश्वपति जवान पुत्री को अविवाहित देखकर चिन्तित है-

अपनी जवान पुत्री नै देख, सोचण लाग्या जतन अनेक,
मिटते कोन्या लेख करम के, न्यूं ऊँच नीच का ध्यान किया,

सावित्री की माता भी चिन्ताग्रस्त होकर क्या कहती है-

सावित्री का भी कुछ ध्यान सै, सुण साजन मेरे होरी ब्याहवण जोग।

बात कहूं सूं बणके टेढी, मनै तै एक जणी थी बेटी,
जिनकै बेटी घरां जवान सै, न्यू कहते बड़े बड़ेरे, उनकै माणस मरे जितना सोग।

उनकी इस विरासत को सहेजने व आगे बढ़ाने के लिए उनके सुपुत्र पंडित तुलेराम कौशिक ने उल्लेखनीय भूमिका निभाई। इसके बाद तीसरी पीढ़ी में उनके पौत्र पंडित विष्णुदत्त कौशिक भी अपने दादा की परंपरा का हरियाणा, राजस्थान व उत्तर प्रदेश के दूर-दराज के गाँवों तक प्रचार प्रसार कर रहें हैं तथा अपनी विरासत के संरक्षण एवं संवर्धन में अति प्रशंसनीय भूमिका अदा कर रहे हैं। वे अपने दादा द्वारा बनाए गए ‘ताराचंद’ के तीन भाग, शाही लकड़हारा के दो भाग, पूर्णमल, सरदार चापसिंह, नौटंकी, मीराबाई, राजा नल, सत्यवान-सावित्री, महाभारत का किस्सा, कीचक वध, द्रोपदी चीरहरण, पद्मावत, आदि दर्जन भर साँगों का सैंकड़ो बार मंचन कर चुके हैं और आज भी लोगों की भारी भीड़ उन्हें सुनने के लिए दौड़ी चली आती है। हरियाणवी लोक संस्कृति की महान शख्सियत सूर्यकवि पंडित लख्मीचन्द को कोटि-कोटि नमन है।

पंडित लखमीचन्द के शिष्यों की बहुत लंबी सूची है, जिन्होंने सांग कला को समर्पित भाव से आगे बढ़ाया। उनके शिष्य पंडित मांगेराम (पाणछी) ने अपनी बहुमुखी प्रतिभा के बल पर सांग को एक नया आयाम दिया और अपने गुरु पंडित लख्मीचन्द के बाद दूसरे स्थान पर सांग कला में अपना नाम दर्ज करवाया। उनके शिष्यों ने अपने गुरु पंडित लख्मीचंद का नाम खूब रोशन किया जिनकी सूची इस प्रकार है, जो रागनी, भजन गाने या बनाने में निपुण थे।

क्र. शिष्य के नाम निवास स्थान
1 पंडित रामचन्द्र खटकड़
2 पंडित रतीराम हीरापुर (श्री लख्मीचंद के मामा के लड़के)
3 पंडित माईचन्द बबैल
4 पंडित सुल्तान रोहद
5 पंडित चंदनलाल बजाणा
6 पंडित मांगेराम पाँणछी
7 फौजी मेहरसिंह बरोणा
8 पंडित रामस्वरूप स्टावली
9 पंडित ब्रह्मा शाहपुर बड़ौली
10 श्री धारासिंह बड़ौत
11 श्री धर्मे जोगी डीकाणा
12 श्री जहूरमीर बाकनेर
13 श्री सरूप बहादुरगढ़
14 श्री तुंगल बहदुगढ़
15 श्री हरबंश पथरपुर-उ.प.
16 श्री लखी धनौरा-उ.प.
17 श्री मित्रसेन लुहारी-उ.प.
18 श्री चन्दगीराम अटेरणा
19 श्री मुंशीराम मिरासी खेवड़ा (बाद मे पाकिस्तान स्थानांतरित)
20 श्री गुलाब रसूल पिपली खेड़ा (बाद मे पाकिस्तान स्थानांतरित)
21 श्री हैदर नया बांस (बाद मे पाकिस्तान स्थानांतरित)

’ पं लख्मीचन्द के सगे भाई दीपा एवं शिष्य व सगे मामा के लड़के पं रतिराम सांगी एक ही घर में सुराणा-उ.प. में सगी बहनों से विवाहित थे।
’ सुपुत्र स्व. पं तुलेराम सांगी ने काफी दिनो तक बेड़ा संभाले रखा था।
’ सुपौत्र पं विष्णुदत्त अपने दादा लख्मीचन्द द्वारा बने सांग आज तक भी कर रहे है।

’पं० लख्मीचन्द – संक्षिप्त जानकारी’

जन्म तिथि 15.07.1903
स्वर्गवास 17.10.1945
निवास स्थान जांटीकलां . जिला सोनीपत
सतगुरु का नाम पं मानसिंह सूरदास (गांव बसौदी)
पिता एवं माता पं० उमीदराम एवं रीमती शिबिया
भाईयो का नाम कंगण एवं दीपा
बहनों का नाम छोटो देवी (नांगल में विवाहित)
रत्नो देवी (भूररी में विवाहित)
धन्ता देवी (जेठड़ी में विवाहित)
पत्नी का नाम भरपाई देवी
ससुर का नाम श्री बसतीराम (गांव हसलापुरए गुरूग्राम)
साला का नाम श्रीचन्द
सुपुत्र श्री तुलेराम कौशिक सांगी
सुपौत्र श्री विष्णुदत्त शर्मा सांगी

पं0 लखमीचंद ने लगभग 40 सांगों की रचना की जोकि लगभग निम्नलिखित हैः-

नौटंकी मीराबाई रघुबीर धर्मकौर अंजना देवी
चन्द्रकिरण ऊंखा अनिरूद्ध हीर-रांझा निहालदे नर सुल्तान
राजा भोज सरणदे ध्रुव भगत ज्यानी चोर बीजा सोरठ
चापसिंह सोमवती रूप बसन्त हूर मेनका हीरामल जमाल
शाही लकडहारा सती विपुला सत्यवान-सावित्री शकुन्तला-दुष्यन्त
भगत पूर्णमल गोपीचंद राजा हरिश्चन्द्र छोरे बागडी
सेठ ताराचंद धर्मपाल-शांताकुमारी चीर पर्व ताकूतोड बाल्टीफोड
विराट-पर्व कृष्ण सुदामा नल-दमयन्ती जैमलफत्ता
पदमावत चन्द्रहास भूप पुरंजन

2 बाजे भगत:-
बाजे भगत का जन्म 1899 ई. में सावन बदी त्रयोदशी को जिला सोनीपत के दहिया खाप के गांव सिसाणा में हुआ। ‘‘कहै बाजे भगत ससाणे आला, लाभ रहो चाहे हाणी’’ इनके पिता का नाम श्री बदलूराम तथा माता का नाम श्रीमती बदामो देवी था। बाजे भगत तीखे नयन-नक्श, सांवला कृष्ण रंग, गठीला बदन, घुंडीदार मूंछे और 6 फुट का कद, एक आकर्षक व्यक्तित्व के धनी थे। उन्होंने शैशवावस्था में ही शिक्षा परित्याग कर लोकनाट्य रूपी रामलीला में अभिनय करना प्रारम्भ कर दिया। सांगीत की दुनिया में उन्होंने सुप्रसिद्ध सांगी गोरड़ निवासी श्री हरदेवा को अपना गुरू बनाया। ‘‘बाजे भगत के सतगुरू थे गोरड़ के स्वामी हरदेवा’’।2 श्री हरदेवा को गुरू धारण करके उनकी सांग मण्डली में दस वर्ष तक रहे तथा बाद में अपनी अलग सांग-मण्डली बनाकर लगभग 12 वर्ष तक सांगो का मंचन किया।

उस युग में समाज में जातिप्रथा, रूढ़िवाद व अन्य सामाजिक बुराईयां अपनी चरम सीमा पर थी। ऐसे वक्त में समाज में इन रूढियों के खिलाफ टक्कर लेना कोई आसान काम नहीं था। भारतीय समाज की बहु-विवाह (एक से ज्यादा विवाह करना) नामक सामाजिक कुरीति पर तीक्ष्ण प्रहार करते हुए लोक कवि बाजेभगत समाज को किस प्रकार एक उपदेश देते हैं:-

भाइयो जिसतै टूटै नाड़, बोझ इसा ठाईयो ना,
इज्जत आले का नाश करादे, रांड के लाड लडाईयो ना,
सूली से दुःख मोटा हो सै, नांटू सूं दूजा ब्याह कराईयों ना,
कोई सुणता हो तो, नारी दूसरी ल्याइयो ना,
या कित चन्द्रकिरण ब्याही, मेरे कर्मा की करड़ाई थी।

‘गोपीचन्द’ नामक सांगीत में लोककवि ने पुत्र से माँ अलग होने के बाद माता की मनःस्थिति का स्वाभाविक वर्णन किया है। गोपीचंद अपनी माता के आदेशानुसार गोरखनाथ के पास जाकर दीक्षा ग्रहण कर लेता है। फिर गोपीचंद की माता बाबा गोरखनाथ से अपने पुत्र को वापस लेने आती है और कहती है-

बेटे बिन माता के दिल म्य, हो सै घोर अन्धेरा,
मेरे गोपीचंद ने दिखा दिए, कित लाल ल्हको गेरा,

अपने बेटे गोपीचंद नै जोग दुवाणा ना चाहती,
अपनी आंख के तारे नै दूर हटाणा ना चाहती।

इस प्रकार हरियाणवी सांग की महत्वता बढाने वाले सरस्वती पुत्र श्री बाजे भगत एक अनसुलझी गुंथी के उपरान्त सन 1936 ई. मे वे नफरत के तूफान मे फंसकर इस निधि को छोडक़र परमपिता परमात्मा के चरणों में जाकर अपनी अनमोल विरासत छोडक़र चले गए।

बाजे भगत ने 22 के लगभग सांगीतों का लेखन एवं मंचन किया। उनके प्रमुख सांग इस प्रकार हैः-

शकुन्तला-दुष्यन्त कृष्ण-जन्म
गोपीचन्द नल-दमयन्ती
रघबीर-धर्मकौर महाभारत आदिपर्व
पदमावत सत्यवती देवी
चन्द्रकिरण सत्यवादी हरिश्चन्द्र
सरवर-नीर अजीत सिंह राजबाला
हीरामल-जमाल ज्यानी चोर
भगत पूर्णमल चन्द्रवती कृष्णदत
हीर-रांझा नौटंकी इत्यादि

वैसे तो अब बाजे भगत के पौत्र अशोक कुमार को ‘हीर रांझा’ एवं ‘नौटंकी’ सांगीतो की कुछ-कुछ रागनियां भी मिली है।

3 गंधर्व पंडित नन्दलाल-

गन्धर्व कवि पंडित नन्दलाल का जन्म पंडित केशवराम के घर गाँव पाथरआली, जिला भिवानी मे 29-10-1913 को हुआ था | इनके पिता जी केशवराम भी अपने समय मे उच्चकोटि के लोककवि व लोकगायक थे | नन्दलाल जी 5 भाई व 6 बहनों मे 10 वे नम्बर के थे | पांचो भाईयो मे श्री भगवाना राम जो कि जवान अवस्था मे स्वर्ग सिधार गए थे | दुसरे नम्बर पर श्री कुंदनलाल जी, तीसरे नम्बर पर श्री बनवारी लाल जी, चौथे नम्बर पर स्वयं श्री नन्दलाल जी तथा पांचवे नंबर श्री बेगराज जी थे | इनको बचपन से ही कविताई व गायकी का शौक था | इनके पिता श्री केशोराम श्री शंकरदास के शिष्य थे जिन्हें ब्रह्मज्ञानी भी कहते है | ये नन्दलाल जी तीनो सगे भाई कवि थे – नन्दलाल, बेगराज जी, कुंदनलाल जी | इस प्रकार केशोराम जी के शिष्य कुंदन लाल जी थे और कुंदन लाल जी शिष्य श्री नन्दलाल जी और नन्दलाल जी के शिष्य बेगराज जी थे | श्री नन्दलाल जी बचपन मे दिन मे तो गौ चराते थे और रात को बड़े भाई कुंदनलाल जी का जहां भी प्रोग्राम होता था, तो छुप-छुप के सुनने चले जाते थे | उसके बाद थोड़े बड़े होने पर ये हरिराम सांगी– गाँव बहु झोलरी– रोहतक वाले पास रहने लगे | जब इस बात का पता इनके बड़े भाई कुंदनलाल लगा तो उन्होंने इनको अपने पास बुला लिया और अपने साथ बेड़े मे रखने लग गये | उसके बाद नन्दलाल जी ने फिर 13 साल की उम्र मे अपना अलग बेड़ा बांध लिया | उन्होंने अपना पहला प्रोग्राम लगातार 15 दिन तक गाँव चिडावा-राजस्थान मे किया था क्यूंकि ये हमेशा तत्काल ही बनाते थे और तत्काल ही गाते थे | इनकी एक खास बात ये थी कि वो लोगो की फरमाईस पूछते थे कि आप सज्जन पुरुष कोनसे प्रकांड या किस कथा की बात सुनना चाहते हो क्यूंकि इन्होने महाभारत, रामायण, वेद-पुराण, शास्त्र आदि का गहन अध्यन किया हुआ था | ये माता सरस्वती से वरदानी थे, जोकि गौ चराते समय माता सरस्वती ने इनको साक्षात् दर्शन दिए थे | इसलिए इनकी जिह्वा पर माँ सरस्वती का वास था | इनको हरियाणवी लोक साहित्य मे अपने भजनों मे दौड़ (सरड़ा/संगीत) की एक अनोखी कला का सर्वप्रथम शुरुआत करने का श्रेय है, जिसके अन्दर उस प्रसंग का कड़ी से कड़ी सम्पूर्ण सार होता था | इनकी कविता जितनी जटिल थी, उतनी ही रसवती भी थी | इनको महाभारत के 18 के 18 पर्व कंठस्थ याद थे तथा जिनको कविता के रूप मे गाते रहते थे | आज तक हरियाणवी लोकसाहित्य काव्य मे 100 कौरवो और 106 किचको को नाम सिर्फ इन्होने ही अपनी कविताई मे प्रस्तुत किये है अन्यथा किसी भी कवि ने प्रस्तुत नहीं किये | इनकी कविता मे आधी मात्रा की भी त्रुटी नही मिल सकती तथा इनकी रचनओ मे अलंकार व छंद की हमेशा ही भरमार रहती थी, इसलिए नन्दलाल जी प्रत्येक रस के प्रधान कवि थे |

दोहा- श्रीकृष्ण जन्म-आत्ममन, नटवर नंद किशोर ।
सात द्वीप नो खण्ड की, प्रभु थारै हाथ मैं डोर ।।

कहूँ जन्म कथा भगवान की, सर्व संकट हरणे वाली ।। टेक ।।
घृत देवा शांति उपदेवा के बयान सुणो,
श्री देवा देव रक्षार्थी धर करके नै ध्यान सुणो,
सहदेवा और देवकी के नाम से कल्याण सुणो,
सात के अतिरिक्त एक दस पत्नी और परणी,
पोरवी, रोहिणी, भद्रा, गद्रा, ईला, कौशल्या यह बरणी,
केशनी, सुदेवी कन्या, रोचना देवजीती धरणी,
रोहिणी से सात जन्मे उनके तुम नाम सुणो,
गद्ध, सारण, धुर्व, कृत, विपुल, दुरवूद, बलराम, सुणो,
देवकी के अष्टम गर्भ प्रगटे शुभ धाम सुणो,
जो माया दया निधान की, वो कभी न मरने वाली ।1।

श्री शुकदेव मुनि देखो परीक्षित जी से कहैं हाल,
नर लीला करी हरि संग लिए ग्वाल बाल,
कंस को पछाड़ मारे जरासंध शिशुपाल,
प्रथम यदुवंशियों में राजा भजमान हुया,
उनके पुत्र पृथ्रिक उसके विदुरथ बलवान हुया,
उनके सूरसेन सर्व राजों में प्रधान हुया,
सूरसेन देश मथुरापुरी रजधानी थी,
सूरसेन भूपति के भूपति कै मरीषा पटराणी थी,
दस पुत्र पाँच कन्या सुशीला स्याणी थी,
ना कमी द्रव संतान की, सेना रिपु डरने वाली ।2 ।

जेष्ठ पुत्र वसुदेव सत्रह पटरानी ब्याही,
देवक सुता देवकी थी उन्ही से हुई सगाई,
बड़ी धूमधाम से सज के बारात आई,
आहुक नाम एक नृप वर्षिणी जो वंश सुणो,
उग्रसेन पवन रेखा बदल गया अंश सुणो,
द्रुमलिक राक्षस से पैदा हुया कंस सुणो,
वेद विधि सहित जब देवकी का ब्याह हुया,
बालक युवा वृद्ध पुरुष नारियों मैं चाव हुया,
ढप ढोल भेर बाजै पूरी मैं उत्साह हुया,
ना कवि कह सकै जान की, गिरा वर्णन करने वाली ।3 ।

चार सौ हाथी अठारह सौ रथ जब सजा दिये,
दस सहस्र हय वेग प्रभंजन के लजा दिये,
दो सौ दासी दास वै भी दुंदुभी बजा दिये,
बारात विदा करी सब चलने को तैयार हुए,
उग्रसेन पुत्र कंस रथ में सवार हुए,
गज वाजि रथ पैदल साथ मैं अपार हुए,
मथुरापुरी गमन सकल बारात हुई,
गुरु कुन्दनलाल कहते आश्चर्य की बात हुई,
सेवक नंदलाल ऊपर राजी दुर्गे मात हुई,
करो शुद्धि मेरी जबान की, गुण उर में भरने वाली ।4।

दोहा- सकल समूह जन सुन रहे, नभ वाणी कर गौर ।
अरे कंस कहाँ गह रह्या, कर रथ घोड़ां की डोर ।।

वैसे तो नन्दलाल जी ज्यादातर सांगीत मंचन व कथा कार्यक्रम दक्षिण हरियाणा व समीपवर्ती राजस्थान के क्षेत्रों मे ही किया करते थे, लेकिन समय समय पर आमंत्रण के तौर पर वे दूर-दराज के क्षेत्रों व अन्य राज्यों मे भी उनको अच्छी खासी ख्याति प्राप्त थी | इसीलिए एक समय का जिक्र है कि सन 1960 मे हरियाणा-पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री प्रताप सिंह कैरव ने एक बार चंडीगढ़ मे लोककवि सम्मलेन करवाया, जिसमे लगभग आस पास के क्षेत्रों से उस समय के महानतम 35 लोककवियों ने भाग लिया | उसके बाद फिर कवि सम्मेलान पूर्ण होने के बाद मुख्यमंत्री जी ने गंधर्व कवि नन्दलाल जी की निम्नलिखित रचना को सुनकर प्रथम पुरस्कार के रूप मे उस समय 1100/- रुपये की राशि प्रदान की तथा मुख्यमंत्री जी ने इस कवि सम्मलेन समारोह के सम्पूर्ण होने की सुचना व प्रथम पुरुस्कार विजेता पंडित नन्दलाल जी को सर्वोत्तम कलाकार के तौर पर उनकी प्रशंसा के रूप मे उन्होंने इसकी सुचना एक अखबार के माध्यम से की |

गुलिस्तान की छवि कहैं क्या ऐसा आलीशान बण्या,
सुरपति का आराम कहैं या मनसिज का अस्थान बण्या।। टेक ।।
दाड़िम, दाख, छुहारे न्यारे, पिस्ते और बादाम लगे,
मोगरा, केवड़ा, हिना, चमेली, खुशबूदार तमाम लगे,
अखरोट, श्रीफल, चिलगोजे, कदली, अंगूर मुलाम लगे,
नींबू, नारंगी, चंगी, अमरूद, सन्तरे, आम लगे,
जूही, बेला, पुष्प, गुलाब खिल्या, एक आत्म परम स्थान बण्या।।

मौलसरी, चंपा लजवंती, लहर-लहर लहराई थी,
केतकी, सूरजमुखी, गेंदे की, महक चमन मै छाई थी,
स्फटिक मणी दीवारों पै, संगमरमर की खाई थी,
गुलिस्तान की शोभा लख, बसंत ऋतु शरमाई थी,
बाग कहुं या स्वर्ग, इस चिंता मै कफगान बण्या।।

मलयागर चंदन के बिरवे, केसर की क्यारी देखी,
बाग बहोत से देखे थे, पर या शोभा न्यारी देखी,
जिधर नजर जा वहीं अटकज्या, सब वस्तु प्यारी देखी,
सितम करे कारीगर नै, अद्भुत होशियारी देखी,
अमृत सम जल स्वादिष्ट एक तला, चमन दरम्यान बण्या।।

झाड़, फानुस, गिलास लगे, विद्युत की बत्ती चसती थी,
नीलकंठ, कलकंठ, मधुर सुर, प्रिय वाणी दसती थी,
मुकुर बीच तस्वीर खींची, तिरछी चितवन मन हंसती थी,
अष्ट सिद्धी, नव निधि, जाणु तो गुलिस्तान मै बसती थी,
हीरे, मोती, लाल लगे, एक देखण योग्य मकान बण्या।।

शीशे की अलमारी भेद बिन, चाबी लगै ना ताळे मै,
कंघा, सीसा, शीशी इत्र की, पान दान धरे आळे मै,
चमकैं धरे गिलास काँच के, जैसे बर्फ हिमाळय मै,
एक जबरा पेड़ खड़्या था बड़ का, झूल घली थी डाळे मै,
परी अर्श से आती होगी, इस तरीयां का मिजान बण्या।।

चातक, चकवा, चकोर, बुलबुल, मैना, मोर, मराल रहैं,
सेढू, लक्ष्मण, शंकरदास के, परम गुरु गोपाल रहैं,
केशोराम सैल करते, खिदमत मैं कुंदनलाल रहैं,
कर नंदलाल प्रेम से सेवा, तुम पै गुरु दयाल रहैं,
मन मतंग को वश मै कर, ईश्वर का नाम ऐलान बण्या।।

उसके बावजूद इतना मानं-सम्मान व ख्याति पाने पर भी उनको कभी भी अहम भाव पैदा नहीं हुआ और इन्होने अपने जीवन मे कभी भी धन का लालच नही किया और सभी प्रोग्रामों के सारे के सारे पैसे हमेशा धार्मिक कार्यों व गरीबो मे ही बाँट देते थे |

इनको साधू-संतो से विशेष लगाव था, जिसके चलते इन्होने 38 साल की उम्र मे बाबा शंकरगिरी को अपना शब्दगुरु बनाया था | उसके 6 महीने बाद बाबा बैंडनाथ की आज्ञानुसार इन्होने सन्यासी रूप धारण कर लिया था तथा बाबा बैंडनाथ के पास अपने ही गाँव के पास खेतों मे बाबा बैंडनाथ के साथ कुटी बनाकर उनके साथ ही रहना शुरू कर दिया था तथा गृहस्थ आश्रम से सन्यास ले लिया था | क्यूंकि नन्दलाल जी के शिष्य पंडित गणेशी लाल जी, जो गाँव- नौलायचा-महेंद्रगढ़ के निवासी है, जो अभी भी 85 की उम्र मे हमारे साथ विद्यमान है और हमेशा नन्दलाल जी के साथ ही रहते थे, उनके अनुसार एक बार नन्दलाल जी बालेश्वर धाम पर गए हुए थे और वहां के प्रसिद्द संत श्री सुरतागिरी महाराज के आश्रम पहुंचे | जब नन्दलाल जी उस आश्रम के द्वार पर पहुंचे तो सुर्तागिरी महाराज ने बिना किसी परिचय के वहा उनको प्रवेश करते ही उनको उके नाम नन्दलाल से ही पुकार दिया क्यूंकि सुर्तागिरी जी एक त्रिकालदर्शी थे संत थे | उसके बाद नन्दलाल जी ने सुर्तागिरी महाराज से पूछा कि आप मेरे को कैसे जानते हो | फिर महाराज सुर्तागिरी ने नन्दलाल जी को अन्दर आकर पूर्व जन्म का सम्पूर्ण वृतांत सुनने को कहा | उसके बाद नन्दलाल जी ने पहले तो वहां एक दिन के लिए आराम किया तथा दुसरे दिन उस आश्रम मे दो ही भजन सुनाये थे तो फिर भजन सुनने के बाद महाराज सुरतागिरी महाराज ने नन्दलाल जी को ज्ञात कराया कि आप पिछले जन्म मे दरभंगा के राजा के राजगुरु थे | फिर सुर्तागिरी महाराज ने नंदलाल जी के बारे मे आगे बताते हुए कहा कि एक बार राजा को यज्ञ करवाना था तो फिर आपने उस यज्ञ का शुभ मुहूर्त बताया और फिर राजा ने आपसे यज्ञ प्रारंभ के समय पर पहुँचने की विनती की | फिर जब राजा ने मुहूर्त के अनुसार यज्ञ शुरू करवाते समय उस दिन उनके मन मे उतावलेपन के कारण विलम्बता का शंशय पैदा होने के कारण यज्ञ मुहूर्त मे समय रहते हुए ही यज्ञ को आपके आने से पहले ही शुरू करवा दिया | फिर आप जब वहां यज्ञ मुहूर्त के अनुसार समय पर पहुंचे तो राजा यज्ञ शुरू करवा चुके थे | फिर आपने अतिशीघ्रता से यज्ञ को शुरू होते देखा तो आपने अपना अपमान समझकर क्रोधवश आपकी सारी पोथी-पुस्तके उस हवन कुंड मे डालकर उसी समय वनवासी हो गए | इसी कारण फिर आपका पोथी-पुस्तक ज्ञान तो हवन कुण्ड मे जल गया था और आपके अन्दर जो पिछले जन्म का हर्दयज्ञान बचा था उसका बखान आप इस कलयुग के समय मे अपने गृहस्थ जीवन मे जन्म अवतरित होकर कर रहे | फिर उसके बाद सुर्तागिरी महाराज ने नन्दलाल जी से कहा कि आपका सन्यासी जीवन अभी शेष है और आपको पिछले जन्म की तरह आपको कुछ समय सन्यासी जीवन व्यतीत करना पड़ेगा | इस प्रकार फिर बालेश्वर धाम मे सुर्तागिरी महाराज द्वारा की गई भविष्यवाणी अनुसार नन्दलाल जी को 38 साल की उम्र मे सन्यास आश्रम जाना पड़ा | इस प्रकार गंधर्व लोककवि प. नन्दलाल रविवार के दिन 27-10-1963 को अपनी पवन कुटिया मे विजय दशमी के अवसर अपना चोला छोड़ पूर्वजन्म का कर्मयोग करके इस भवसागर से पार हो गये|

इन्होने कौरवो और पांड्वो के जन्म से लेकर मरणोपरांत तक सभी प्रसंगो पे कविताई की, जैसे- विराट पर्व, गौ हरण, द्रोपदी स्वयंवर, कीचक वध….
इन्होने सभी प्रमाणिक कथाओं के तौर पर नल दमयंती कथा , राजा हरिश्चंद्र कथा , पूर्णमल, जानी चोर, चन्द्रहास, बब्रुभान, लक्षकंवर का टीका, कृष्ण जन्म, रुकमनी मंगल, सम्पूर्ण रामायण, काला तुहड़ी ( इनको काल का रूप बताकर उनका पूरा चक्र समझा दिया), राजा अमरीष आदि |

4 कवि शिरोमणि पं0 मांगेराम :-

पं0 मांगेराम का जन्म जुलाई 1905 में गांव सिसाणाए जिला रोहतक में हुआ। इनके पिता का नाम श्री अमरसिंह और माता का नाम श्रीमती धर्मों देवी था। इनके पिता लगभग 80 बीघा जमीन के मालिक थे। इनके पांच लडके सर्वश्री मांगेराम, टीकाराम, हुक्मचंद, चन्द्रभान और रामचन्द्र वकील तथा एक लडकी गोधां थी। इनमें से पं0 मांगेराम ज्येष्ठ पुत्र थे। मांगेराम को इनके नाना उदमीराम ने गोद ले लिया था। इस प्रकार ये गांव सुसाणा में जन्म लेकर पांणची वासी बन गये। ऐसा वर्णन उनके अनेक छन्दों में मिलता है-

‘‘पाणची म्हं रहण लागग्या, मांगेराम सुसाणे का।

पं0 मांगेराम के नाना पं0 उदमीराम धार्मिक प्रवृति के व्यक्ति थे। उनकी रूचि भजनों में थी। नाना की इस रूचि का प्रभाव बालक मांगेराम पर भी पडा और उनका रूझान संगीत की ओर होता चला गया। सन् 1930 के आस-पास जब पं. मांगेराम की आयु लगभग 25 वर्ष थी। इन्होंने सांग मण्डली में सम्मिलित होने की इच्छा प्रकट की, परन्तु घरवालों ने इसकी इजाजत नहीं दी। कुछ समय पश्चात् घरवालों की मर्जी के खिलाफ पं0 मांगेराम सांग मण्डली में शामिल हो गये तथा उस समय के प्रसिद्ध सांगी पं0 लखमीचंद से प्रभावित होकर उनको विधिवत् गुरू मान लिया। सांग कला में निपुण होने के पश्चात् पं0 मांगेराम ने अपने गुरू से अलग होकर स्वतन्त्र सांगी बेडा स्थापित किया तथा अपने गीत-रागनी स्वयं बनाने लगे। पं0 मांगेराम के लगभग सभी सांगों को लोक जीवन में ख्याति मिली थी और अपनी रचनाओं मे गुरु के प्रति अटूट श्रद्धा दिखाकर गुरु भक्ति को चरमोत्कर्ष पर पहुँचाया तथा गुरु लख्मीचंद को पुनः अमरत्व प्रदान किया जो आज आज तक हमारी आत्माओं मे बसा हुआ है। इनके दो सांगो ‘धु्रव भगत’ और ‘कृष्ण जन्म’ को विशेषतः लोक प्रसिद्धि मिली और कुछ सांग उनके विलुप्ता की कगार पर पहुँच गये थे जो कभी अन्य लोक गायकों द्वारा कभी हमारे बीच गायन मे नहीं आये। उन्ही मे से है एक सांग है- जादू की रात और इस सांग की एक श्रृंगारिक रचना निम्नलिखित मे इस प्रकार प्रस्तुत है.

मिंचते आंख दिखाई दे सै, कमरा शीश्यां आला,
सुती पड़ी पलंग पै देखी, था माशूक निराला ।। टेक ।।

लाल किरोड़ी पड्या रेत मैंए जो तड़कै पाग्या होगा,
देख परी नै हूर परी कै भी, दहका सा लाग्या होगा,
सारी ऐ बात बताई होगी, जब कुणबा जाग्या होगा,
तूं कहरया सै मनै रात नै, कोए सुपना आग्या होगा,
यो सुपना कोन्या साची बणरी, मैं न्यूं खाकै पड्या तवाला।

एक पहर का कहरया सूं, तनै कुछ भी जाणी कोन्या,
आख्यां देखी बात कहूं सूं, या जगत कहाणी कोन्या,
इन्द्राणी सती अनुसूईया जिसी, इसी ब्रहमाणी कोन्या,
तेरे मैं मेरा मन फंसग्या, तनै चलण की ठाणी कोन्या,
किसै भागवान नै बुलबुल कैसा, बच्चा ध्यान लगाके पाल्या।

आज तै आगै जंचली, सब नकली भाई चारा,
बणी-बणी के सब कोए साथी, ना बिगड़ी मैं प्यारा,
बतलावण की श्रद्धा कोन्या, जी आख्यां मैं आरया,
गजब का गोला आण पड़्या, जब बजे रात के बारा,
एक माणस कै डाका पड़ग्या, यो सारा.ऐ.देश रुखाला।

थारे भाई पै विपता पड़री, मिलकै दर्द बांटल्यो,
गहरा जख्म नदी सी खुदरी, मिलकै गैल आंटल्यो,
खाकै जहर मरुंगा, उस बिन बेशक मनै नाटल्यो,
मांगेराम नै मीठा बोलकै, बेशक नाड़ काटल्यो,
बहुत आदमी करते देखे, मनै पूंजी राख दिवाला।

वैसे तो मांगेराम जी ने अपने गुरु लख्मीचंद के सांगो से प्रभावित होकर बहुत पहले ही कुछ फुटकड़ रचनाओं को बनाना और गुनगुनाना शुरू कर दिया था, जब वे अपनी मोटर-लोरी लेकर श्री लख्मीचंद जी के सांगो का रसपान करने के लिए जगह-जगह पहुच जाते थे लेकिन उन्होंने जब तक श्री लख्मीचंद को अपना गुरु धारण नहीं किया था, वे सिर्फ उनके सांगो को सुनकर अपने शुरूआती अध्यन मे थोडा बहुत कोई कोई फुटकड़ रचना बनाकर अपने मित्र मण्डली व बाद मे कभी कभी श्रोताओं व अपने मित्र मण्डली की फरमाईश पर अपने सांगो को प्रारंभ करने से पूर्व व अंत मे किसी धर्मशाला व अन्य थौड़.ठिकानों पर भी सुनाया करते थे। फिर इसी विषय को आगे बढ़ाते हुये पंडित मांगेराम जी के ही प्रिय शिष्य पंडित राजेराम जी ने मांगेराम जी की एक ऐसी ही बहुत ही कमसुनी फुटकड़ रचना पे प्रकाश डालते हुए निम्नलिखित मे बताया है, जो उनके गुरु पंडित लख्मीचंद के राजा हरिश्चंद्र के सांग से प्रभावित रचना है।

28 दिन का रहणा होगा, भंगी आले घर मैं,
बोझ तलै मेरी नाड़ टूटगी, आगी गर्ब कमर मैं ।। टेक ।।

ठाल्ली झगड़े झोणे होगे, धर्म के मरवे बोणे होगे,
सौ सौ घड़वे ढोणे होगे, बाल रहया न सिर मैं।।

रहणा सहणा खास छुटग्या, अवधपुरी का वास छुटग्या,
एक लड़का रोहताश छुटग्या, बालक सी उम्र मैं।।

गहरी विपता ठाणी पड़गी, दर-दर ठोकर खाणी पड़गी,
मदनावत राणी पड़गी, न्युये ठाल्ली सोच-फिक्र मैं।।

अवधपुरी का रहणा छुट्या, मांगेराम ड्राईवर लुट्या,
ठोकर लागी घड़वा फूटया, चढ़ग्या सूरज शिखर मैं।।

सन् 1962 में पं0 मांगेराम ने गन्धर्व सभा बनायी थी, जिसमें उस समय के पांच प्रसिद्ध सांगी, पं0 मांगेराम, पं0 सुल्तान सिंह, धनपत, रामकिशन ब्यास तथा चन्द्रलाल उर्फ चन्द्रलाल बादी सम्मिलित थे। गन्धर्व सभा ने कई स्थानों पर अपने गीत-संगीत के कार्यक्रम पेश किये थे। हरियाणा की संगीत प्रेमी जनता ने गन्धर्व सभा द्वारा प्रस्तुत कार्यक्रमों की मुक्त कण्ठ से सराहना की। इस प्रकार फिर अपने समय के सर्वश्रेष्ठ लोककवि एवं सांगी पं0 मांगेराम का 16 नवम्बर 1967 ई0 को स्नान के पावन अवसर पर गढ मुक्तेश्वर में गंगा तट पर स्वर्गवास हो गया।

भारतीय समाज में उस व्यक्ति को धार्मिक वृति का और चरित्रवान समझा जाता है जो परोपकारी हो, दानी हो, सत्य का हिमायती, विषय-वासनाओं से दूर तथा परस्त्री को माता के समान एवं पराये धन को मिट्टी के समान समझने वाला हो। लोक कवि नं0 मांगेराम ने पिंगला-भरथरी नामक सांग में लोकधर्म का चित्रण इस प्रकार किया है-

गैर बीर आज्या तै मैं, सिर नीचै नै करल्यूं सूं,
पराये धन नै मिट्टी समझूं, देख-देखकै डरल्यूं सूं,
मामूली सी टुक होज्या तै, मैं इतने मैं मरल्यूं सू,
इस दुनियां के काम देखकै, मैं घूंट सबर की भरल्यूं सूं,

लोक कवि पं0 मांगेराम जी ने भी 45 के लगभग सांगीतों की रचना की थी, जिनमें उपलब्ध सांग इस प्रकार हैः-

१ भगतसिंह १६ सैन बाला ३१ सती सुशीला
२ वीर हकीकत राय १७ जयमल फताह ३२ गोपीचंद भरथरी
३ स्मरसिंह राजपूत १८ माल देव का आरता ३३ सुल्तान निहालदे
४ अमरसिंह राठौड़ १९ शिवजी का ब्याह ३४ चंद्रहास
५ बादल सिंह २० रुकमन का ब्याह ३५ ध्रुव भक्त
६ प्रेमलता २१ नौरतन ३६ चापसिंह सोमवती
७ हीर रांझा २२ रूप बसंत ३७ पूरणमल
८ लैला मजनू २३ सरवर नीर ३८ अजितसिंह राजबाला
९ हिरामल जमाल २४ राजा मोर ध्वज ३९ त्रिया चरित्र
१० हूर मेनका २५ हंसबाला राजपाल ४० नल दमयंती
११ शकुन्तला दुष्यन्त २६ राजा चित्रमुकुट ५१ रामायण वृतांत
१२ सभा पर्व २७ कृष्ण जन्म ४२ सती विपोला
१३ पिंगला भरथरी २८ कृष्ण सुदामा ४३ राजा भोज शारणदे नाई
१४ वीर विक्रम जीत २९ नौटंकी पार्ट २ ४४ देवयानी
१५ जादू की रात ३० सुकन्या चमन ऋषि ४५ महात्मा बुद्ध

5 पंडित रघुनाथ:-

पंडित रघुनाथ सिंह का जन्म सन 1922 मे ग्राम फिरोजपुरए निकट खेकड़ा, जिला बागपत मे पंडित देशराज के घर मे हुआ। पंडित रघुनाथ जी चार भाई थे-जिनमे रघुनाथ जी, हरिभजन जी, सत्यप्रकाश जी, वेदप्रकाश जी, जिनमे पंडित रघुनाथ सबसे बड़े थे और अशिक्षित थे जबकि बाकि तीनो भाई शिक्षित के साथ साथ सरकारी नौकरी मे थे। पंडित रघुनाथ जी की शादी शांति देवी के साथ गाँव रेवला खानपुर-दिल्ली मे हुई जिससे उनके उनको दो लड़की कुसुमए, शीला और चार लड़के हरिओम, देवेन्द्र, सुदर्शन, संजय हुए। पंडित रघुनाथ जी को बचपन से ही कविता सुनने, गाने व करने का शौक था। एक बार पंडित जी के गाँव मे रामलीला करने वाले आ गए थे और फिर उन्ही के साथ चले गए। उसके बाद फिर काफी दिनों बाद वापिस घर आये तो पिता जी ने कहा कि अगर तुझे रागनी गाने और सुनने का शौक है तो गाँव जांवली वाले पंडित मानसिंह के पास चले जाओ क्यूंकि पंडित देशराज जी गाँव जांवली मे एक कोल्हू कंपनी मे बाबू का कार्य करते थे। फिर पिताजी के कहने पर पंडित रघुनाथ गाँव जांवली मे पंडित मानसिह के पास पहुँच गए। फिर गाँव जांवली मे पंडित मानसिंह के पास जाने के बाद अपनी पहली मुलाकात मे ही पंडित रघुनाथ जी ने अपना गुरु धारण कर लिए। उस समय अंगेजों का शासन था तो घर मे सबसे बड़े होने के कारण वे मिलिट्री मे भर्ती हो गए। फिर इसी दौरान द्वितीय विश्व युद्ध चालू हो गया तो अंग्रेजो ने भारत से सेना बुलावानी शुरू कर दी। फिर पंडित रघुनाथ जी ने मेजर से बोले कि अगर हम बाहर चले जायेंगे तो यहाँ पे कौन लड़ेगा। फिर मेजर हिन्दुस्तानी होने के कारण उसने उनको वहां से चुपचाप निकाल दिया। फिर वहा से आने पर अंग्रेज पुलिस ढूंढने लगी। फिर एक बार पंडित रघुनाथ अपने गुरु की सांग मण्डली मे काम कर रहे थे तो वहां पर अंगेज जवान पहुँच गए और फिर उस अंग्रेजी पुलिस को देखकर वे मंच से उतरकर वे सांग सुन रहे श्रोताओं के बीच आ बैठे। फिर कुछ समय बाद पुलिस वापिस चली गई। फिर एक दो साल तक ऐसे ही पुलिस खोजती रही और पंडित रघुनाथ उनसे बचते रहे। फिर कुछ समय पश्चात् देश आजाद हो गया। उसके बाद वे अपनी कविता रचने लगे और लोगो को जगह जगह जाकर सुनाने लगे। पंडित रघुनाथ जी उस समय सुर्यकवि पंडित लख्मीचंद जी से बहुत ज्यादा प्रभावित थे। इसलिए पंडित लख्मीचंद जी के जो देशी तर्ज थी उन पर रघुनाथ जी ने अपनी कविताई करनी शुरू कर दी। बाद मे कुछ अपनी तर्जे और फ़िल्मी तर्जों पर भी कविताई करनी शुरू करदी। उनकी कविताई को पश्चिमी उतरप्रदेश मे जहां तक रागनी सुनी जाती थी वहां तक उनकी कविताई को काफी सरहाया जाने लगा और उस क्षेत्र के कवियों ने उन्हें ‘तन.वितन, की उपाधि से नवाजा गया जिसका मतलब इनके बुद्धि की कोई सीमा नहीं है। इसी दौरान उतरप्रदेश की प्रणाली से जमुआमीर के शिष्य हरियाणा निवासी धनपत सिंह सांगी भी उन्ही के समकालीन थे। फिर पंडित रघुनाथ जी के गुरु पंडित मानसिंह जी ब्रजघाट या गढ़ गंगा के मेले पर धनपत सिंह सांगी को अक्सर बुलाया करते थे। जब कभी रघुनाथ जी और धनपत जी दोनों का आमना सामना होता रहता था तथा आपस मे दोनों बारी बारी श्रोताओं को अपनी कला प्रभावित करते रहते थे। फिर भाईयो के शिक्षित होने के कारण वे अपनी कविताई उनसे ही लिखवाते रहते थे और फिर धीरे धीरे भाईयो के सहयोग से वे अपनी कविताई हिन्दी स्वयं ही हस्तलिखित करने लगे और स्वयं ही वे अपनी रचनाओं को जवाहर बुक डिपो-मेरठ व भगवत बुक डिपो-बुलंदशहर प्रेस के द्वारा छपवाने लगे। उनकी कविताई से प्रभावित होकर लगभग दो दर्जन शिष्य ने उनको अपना गुरु धारण किया। उन शिष्यों मे से चौ. घासीराम-गाँव सलेमाबाद, ठाकुर मंगल सिंह, जयचंद, निहाल, दयाकिशन, हरिराम जो सभी शीलमपुर-दिल्ली से थे और जयप्रकाश त्यागी पहलवान, रघुनाथ त्यागी, ईश्वर त्यागी, सुरेन्द्र शर्मा जो सभी गाँव रावली कलां से थे, फिर सत्यप्रकाश उर्फ़ प्रकाश, राजकुमार त्यागी जो सभी इन्ही के गाँव फिरोजपुरवासी थे, रामकिशन त्यागी, रामनिवास त्यागी, सतीश त्यागी जो सभी गाँव मण्डौला से थे, फिर एक रघुनाथ जी के फुफेरे भाई बद्रीप्रसाद शर्मा-गाँव खुर्रमपुर और पंडित रामकुमार शर्मा-गाँव नह्नवा और ब्रजपाल बाल्मिकी- गाँव चमरावल निवासी आदि शिष्य हुए।

हे सच्चे भगवान, बचाले जान, ये कैसा थाणा,
जहां मरे हुए नै भी मारै ।। टेक ।।

आज राज मै बुझ रही ना, सच्चे माणस चोखे की,
चोर डांट रहे कोतवाल नै, खरी मिशल मौके की,
सै धोखे की बात, कांप रहा गात, ना ठौड़ ठिकाणा,
जब प्यारे सिर नै तारै ।।

लोभी और लालची मानस, करज्या काम घणे माड़े,
चोर चौधरी पंच उच्चके, रिश्वत से चाले पाड़े,
फिरै लुन्गाड़े भजे, उड़ा रहे मजे, कपट का बाणा,
संत खता बिन हारै ।।

बिना दया चंडाल कसाई, पेट मांस से भरते,
धोरै बैठके जड़ काटै है, नहीं पाप से डरते,
यहाँ बुड्डे भी करते ब्याह, बिगड़ गया राह, ठीक कर जाणा,
जहां विधवा सुरमा सारै ।।

रिश्वत का संसार जगत मै, स्वार्थ घणा बढ़ा है,
रघुनाथ बावला भोला, थोड़ा ही लिखा पढ़ा है,
जो चढ़ा है सो ही ढला, बुरा और भला, राग का गाणा,
सब सुनके आप विचारें ।।
(सांग:- धर्मपाल-शान्ताकुमारी)

पंडित रघुनाथ साधू-संतो की संगत मे बहुत लगाव रखते थे इसलिए साधू-संतो की संगत मे उनकी कविताई को खूब पसंद किया जाता था । उन्होंने महाभारत को अपनी रचनाओ के बहुत ही विस्तृत रूप मे लिखा और उनके जितना विस्तृत महाभारात शायद ही किसी कवि ने अपनी रचनाओं मे लिखा हो। उनके इस साक्ष्यार्थ के तौर पर एक रचना पर प्रकाश डाल रहे है.

देखले रूप दिखाऊंगा, पार्थ करले दिव्य द्रष्टि ।। टेक ।।

सात द्वीप नौ खंड, तीन लोक न्यारे-न्यारे देख,
जल पृथ्वी आकाश वायु, अग्नि के चमकारे देख,
सागर और पहाड़ सूरज, चाँद सितारे देख,
वन बीहड़ तलाब नदी, नाले और किनारे देख,
अनेको फूल फल सुआद, खट्टे मीठे खारे देख,
एक रूप मै रूप अपने, शत्रु मित्र प्यारे देख,
बात सारी समझाऊंगा, मन माया से रची सृष्टी ।।

दाने देव नाग गंधर्व, किन्नर कलाधारी देख,
पशु पक्षी शेर हाथी, मारते किलकारी देख,
भुत और पिशाच मांस, मारते शिकारी देख,
छोटे बाल ग्वाल बुड्ढ़े, जवान नर नारी देख,
अहंकारी शस्त्रधारी, लालची व्याभिचारी देख,
लख चौरासी योनी भोग, भोगते संसारी देख,
तेरा संकोच मिटाऊंगा, है आखिर धर्म आरिष्टि ।।

एक ही सूरत मै मूरत, छोटी और बड़ी देख,
कुरुक्षेत्र मै दोनु सेना, शस्त्र लेकै खड़ी देख,
भरी है जोश मै फ़ौज, पर्ण करके अड़ी देख,
बड़े बड़े महारथियों की, नाड़ कटी पड़ी देख,
अपने आप अर्जुन अपनी, यश पाने की घड़ी देख,
रणभूमि मै सेना लड़ती, हथियारों की झड़ी देख,
भ्रम सब दूर भगाऊँगा, लिए सत की जाण समष्टि ।।

अपने शत्रु अपणे आगै, जोश के म्हा अरे देख,
शूरवीर गरजै और, कायर मन मै डरे देख,
कौरवों के सारथी सारे, अहंकारी मरे देख,
योगिनी कालका काली, खाली खप्पर भरे देख,
कर्मों के आधीन आज, सारे काम करे देख,
मानसिंह गुरु के ज्ञान, लयदारी मे खरे देख,
सुर मै भरके गाऊंगा, रघुनाथ राग रंग की वृष्टि ।।
(सांगरू गीता उपदेश – कृष्ण-अर्जुन संवाद)

इस तरह इस महान कवि का पार्थिव शरीर सन 1977 मे होली के दिन पंचतत्व मे लींन हो गया।

उन्होंने लगभग 31 सांगो की रचना की जो निम्नलिखित प्रकार से है।

महाभारत भीष्म पर्व राजा हरिश्चंद्र
कृष्ण जन्म द्रोण पर्व सत्यवान सावित्री
भीम का ब्याह जयद्रथ वध राजा मोरध्वज
द्रोपदी स्वयम्वर परीक्षित नवल्दे अजित सिंह राजबाला
द्रोपदी चीरहरण चित्र विचित्र धर्मपाल शान्ताकुमारी
वन पर्व देवयानी शर्मिष्ठा वीर हकीकतराय
कीचक वध पूर्णमल नुनादे पृथ्वीराज संयोगिता
गौ हरण पूर्णमल सुंदरादे रूपवती चूड़ावत
कृष्ण भात नल दमयंती भाग.1 गौतम अहिल्या
गीता उपदेश नल दमयंती भाग.2
श्रवण कुमार लव.कुश काण्ड

6. विरले सांगी प. सुल्तान चौरासिया:-

गंधर्व कवि प. लख्मीचंद की आँखों का तारा व उनके सांगीत बेड़े में उम्रभर आहुति देने वाले सांग-सम्राट *पं. सुल्तान* का जन्म 1918 ई0 को गांव- रोहद, जिला- झज्जर (हरियाणा) के एक मध्यम वर्गीय ‘चौरासिया ब्राह्मण’ परिवार मे हुआ। इनके पिता का नाम पं. जोखिराम शर्मा व माता का नाम हंसकौर था और वे कस्तूरी देवी के साथ गाँव सरूरपुर कलां, बागपत-उ.प. मे वैवाहिक बंधन मे बंधे थे। पंडित सुल्तान शैक्षिक तौर पर बिल्कुल ही अनपढ़ थे, परन्तु गीत-संगीत की लालसा तो उनमे बचपन से ही थी क्यूंकि वे अन्य लोगो की तरह मित्र-दोस्तों के साथ चलते-फिरते भजनों-गीतों की पंक्तियों को गुन-गुनाते रहते थे। उसके बाद बाल्यकाल पूर्ण होते-होते, उन्हें कर्णरस एवं गीत श्रवण की ऐसी ललक लगी कि अपने गाँव से भी वे कोसों-मीलों दूर जाकर सांगी-भजनियों के काव्य सार को अपने अन्दर समाहित करते रहे। फिर किशोरावस्था के दिनों मे पंडित सुल्तान जी के जीवन मे एक नए सांगीत अध्याय के अंकुर फूटने लगे। फिर सौभाग्य से उन दिनो किशोरायु सुल्तान के गाँव रोहद मे प. लख्मीचंद के सांगो का कार्यक्रम शुरू था और एक दिन बालक सुल्तान शाम को प. लख्मीचंद का सांग सुनकर अगले दिन जब सुबह खेतों की ओर उसी सांग की रचनाओं को ऊँची आवाज मे गा रहे थे तो संयोगवश प. लख्मीचंद भी उसी तरफ सुबह सुबह घुमने निकले हुए थे। इसलिए जब प. लख्मीचंद ने बालक सुल्तान की मनमोहक आवाज सुनी तो आकर्षण के कारण बालक सुल्तान के पास ही पहुँच गए और प. लख्मीचंद जी ने दोबारा से बालक सुल्तान से वही भजन सुनाने को कहा, जो सुल्तान उस समय गा रहे थे। फिर सुल्तान ने जब वही भजन दोबारा प. लख्मीचंद वाली लयदारी में गाया तो उनकी लय और स्मरण शक्ति को देखकर प. लख्मीचंद अचंभित रह गए। फिर प. लख्मीचंद जी ने उस बालक से परिचय पूछने लगे। फिर बालक सुल्तान द्वारा अपना परिचय देने पर प. लख्मीचंद उसी समय सुल्तान के साथ उसके घर जाकर उनके पिता जोखिराम से मिले और कहाँ कि आज से आपका ये लड़का मेरे सांगीत बेड़े मे शामिल करने हेतु मुझको सौंपदो। फिर सुल्तान के पिता जोखिराम जी ने कहा कि ये लड़का मेरा क्या, आपका ही है, जब चाहे इसे अपने साथ ले जाओ। उसके बाद प. लख्मीचंद जी ने बालक सुल्तान को उसी दिन से अपने बेड़े मे शामिल कर लिया, क्यूंकि उस समय प. लख्मीचंद जी बालक सुल्तान के गाँव मे ही सांग कर रहे थे। फिर उसी दिन से प. लख्मीचंद जी ने बालक सुल्तान को अपना शिष्य बना लिया और अपने बेड़े मे शामिल कर उसको पारंगत कर दिया। फिर प. लख्मीचंद जी ने गुरु मन्त्र के रूप मे सुल्तान से कहा कि बेटा आज से अपने गाँव की बहन-बेटी को सम्मान देना और साधू-संतो व गौओ एवं गुरुओं के प्रति पूर्ण रूप से समर्पित रहना। उसके बाद प. सुल्तान ने गुरु मंत्र द्वारा पूरी निष्ठां एवं श्रद्धा से गुरु की सेवा करके गायन-कला मे प्रवीण होकर ही अपनी इस सतत साधना और संगीत की आत्मीय पिपासा को पूरा किया। इस प्रकार फिर गुरु लख्मीचंद के सत्संग से शिष्य सुल्तान अपनी संगीत, गायन, वादन और अभिनय कला मे बहुत जल्द ही पारंगत हो गए। इस प्रकार प. सुल्तान शुरू से आखीर तक हमेशा गुरु लख्मीचंद के संगीत-बेड़े में रहे और अपनी गायन-उर्जा से गुरु के सांगीत बेड़े को जीवनभर प्रकाशमय करते रहे।
वैसे तो पंडित सुल्तान भी बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। उनके घनिष्ठ प्रेमीयों एवं कला के कायल जन साधारण ने पंडित सुल्तान के संबंध मे कितना ही उचित कहा है कि जो पंडित सुल्तान को एक साधारण सांगी समझते है, वे अल्पबुद्धि जीव ही है। वे केवल एक सशक्त सांगी ही नहीं, अपितु एक सर्वश्रेष्ठ गुरुभक्त के साथ-साथ प्रभावी कवि भी थे। वे एक बहुत ही साधारण व्यक्तित्व के साथ-साथ एक अदभुत साहित्य एवं संगीत कला के, इस हरियाणवी लोक-साहित्य मे बहुत बड़े सहयोगी भी है, जो इस आधुनिक युग के सांगियों व कवियों के लिए एक बहुत बड़ी मिशाल है। पंडित सुल्तान गोरे रंग के साथ-साथ एक मध्यम कद-काठी के धनी थे और दूसरी तरफ इनकी वेशभूषा धोती-कुर्ता व साफा सुहावनी होने के साथ इनकी प्रतिभा को और भी प्रभावशली बनाती थी। इनका सादा जीवन व रहन-सहन ही बेशकीमती आभूषण था, जो इतने प्रतिभावान होते हुए भी साधुवाद की तरह जरा-सा भी अहम भाव नहीं था। उनका यह साधुवाद चरित्र उनके सांग मंचन मे हमेशा ही झलकता था। उन्होंने कभी सांगो का लेखन तो नहीं किया परन्तु गुरु प्रभाव के कारण बहुत सी फुटकड़ रचनाएँ जरुर की, जिनकी संख्या 50 से 100 के आसपास है। अब साक्ष्य के तौर पर उन्ही रचनाओं मे से प. सुल्तान की कुछ साहित्यिक झलक निम्न है –

*कहै सुल्तान मौज कर घर मै, मन-तन की ले काढ सेठाणी,*
*भाईयाँ की सू समझ रही सै, तेरी पर्वत जितनी आड़ सेठाणी,*
*तेरे हंस-हंस करल्यु लाड सेठाणी, मेरा सोया निमत फेर तै जाग्या,*
*तन म्य जोश रह्या नही,ये मिचगी आंख अंधेरा छाग्या,*
*चंद्रगुप्त बड्या कमरे म्य, जित बाबा जी का धुणा ऐ लाग्या,*
*पिया जी की शान देखके, जणू सूखे धाना म्य पाणी आग्या,*
-(सांग-सेठ ताराचंद)-

*बात कहूँगी वाहे शुरू आली, भक्ति पार होई ध्रुव आली,*
*कहै सुल्तान म्हारे गुरु आली तूं वाहे चाल राखिये रे बेटा,*
*मतन्या काल राखिये रे बेटा, सासू कहै ख्याल रखिये रे बेटा,*
*बेटा सुणता जा*
-(सांग-सेठ ताराचंद)-

*लख्मीचंद का दास मनै, सुल्तान ज्यान तै प्यारा सै,*
*झूली-गाई नहीं मनै दुःख, तेरी ओड़ का भारया सै,*
*जिसकी मारी फिरै भटकती, वो चाल बाग म्य आरया सै,*
-(सांग-पद्मावत)-

उसके बाद फिर उन्होंने प. लख्मीचंद के बेड़े मे रहकर बहुत से सामाजिक कार्य किये, जैसे -जोहड़ खुदवाने, धर्मशाला बनवाने, गौशाला बनवाने, स्कुल बनवाने आदि हेतु अनगिनित चंदा इकठ्ठा करके उनको सम्पूर्ण करवाके उम्रभर अपने संरक्षण मे रखना और प. लख्मीचंद जी ने अपने सांगो द्वारा उम्रभर जितना चंदा इकठ्ठा किया, उसमे सबसे बड़ा हाथ किसी का था तो वो था शिष्य सुल्तान का। इसके अलावा साधू-संतो की सेवा मे उम्रभर जुटे रहे, जैसे- अपने हाथों से उनके कपडे धोना, उनकी जटाओं को निर्मल करना और आश्रमों मे गौ माताओ के लिए परिश्रम करना।
फिर सन 1945 के बाद गुरु लख्मीचंद के पंचतत्व मे विलीन होने के समय से स्वयं के स्वर्ग सिधारने तक, उन्होंने उसी गुरु बेड़े के साथ सन् 1945 ई0 से 12 जुलाई, 1969 तक ताउम्र पंडित लख्मीचंद के सांगो का ही मंचन किया। प. सुल्तान ने अपने गुरु लख्मीचंद जी के जिन-जिन सांगो का उम्रभर ज्यादातर मंचन किया, वे निम्न मे इस प्रकार है- *पूर्णमल, पद्मावत, राजा नल, शाही लकड़हारा, मीरा बाई, सेठ ताराचंद, राजा हरिश्चंद्र, चापसिंह-सोमवती, फूलसिंह-नौटंकी आदि।*

7. राय धनपत सिंह :-

पं. मांगेराम के समकालीन तथा उनके पश्चात भी एक दशक से अधिक तक सांगों का मंचन करने वाले प्रतिष्ठित सांगीतकार श्री धनपत सिंह का जन्म सन् 1915 ई. में गांव निन्दाना जिला रोहतक में हुआ। इनके पिता का नाम श्री चन्दामीर तथा माता का नाम श्रीमती भूली देवी था। इन्होंने उर्दू में आठ कक्षाएं पास की थी। पन्द्रह वर्ष की आयु में गांव सुनारिया, रेाहतक निवासी जगुआमीर को अपना गुरू बनाया। गुरू जी से सांग कला सीखकर इन्होंने अपनी अलग सांग मण्डली बनाई। लगभग 19 वर्ष की आयु में इन्होंने पहला सांग गांव निन्दाना में किया था।

श्री धनपत सिंह के सांगों की हरियाणा के ग्रामीण अंचल में खूब धूम मची। बणदेवी, लीलो-चमन, हीर-रांझा, जानी चोर, और गोपीचंद आदि उनके महत्वपूर्ण सांग है जिन्हें हरियाणा प्रदेश में अच्छी ख्याति प्राप्त हुई। इनके अधिकतर सांगों में प्रेमाख्यानक होने के कारण श्रृंगार रस अधिक मुखर रहा है। इनके पास ‘श्याम’ नामक खूबसूरत नवयुवक नचार था, जिसके समय में इनके सांगों की खूब चर्चा रही है। श्याम गांव घरौदी, जीन्द हरियाणा में एक प्रतीक बन गया है- सुकोमार्य का। हरियाणा प्रदेश के ग्रामीण में किसी खूब-सूरत नौजवान को देखकर आज भी कह दिया जाता है- बेटे श्याम।

श्री धनपत सिंह हरियाणा प्रदेश मे लोकप्रिय सांगीतकार रहे है। वे जहां भी सांग करने गए वहीं उनका भव्य स्वागत हुआ। धनपत के 52 शिष्यों में से बन्दामीर उन्हें बहुत प्रिय थे। इनका मुख्यतः सांग लीलो-चमन नामक सांग इसलिए प्रसिद्ध हुआ क्योंकि इसकी कथा भारत-पाक विभाजन की सत्य घटना पर आधारित थी। दुर्भाग्यवश धनपत जी बीमार हो गए लम्बी बीमारी से लडते-लडते यह महान् लोक कवि 29 जनवरी 1979 को स्वर्ग सिधार गए।20

सामाजिक, धार्मिक एवं राष्ट्रीय चेतना युक्त जनकवि धनपत सिंह ने बादल नामक सांगीत मंे युवाओं को देशभक्ति के मूल्यों के प्रति जागृत करते हुए कहा-

देश शमां पै चाहिये जलना, बणके परवाना,
हम बुलबुल देश हमारा, खास आशियाना,
हंसते-हंसते देश ऊपर, चाहिए मर जाना,
इतिहास मैं लिखी जाए, तेरी याद रहे कुरबानी।

संगीतकार धनपत सिंह ने 50 के लगभग सांगीतों का मंचन एवं लेखन किया है। जिनमें से कुछ इस प्रकार से हैः-

हीर-रांझा ज्यानी चोर
हीरामल जमाल जंगल की राणी
शीलो अशोक बणदेवी
सूरज चन्दा राजा नल
गोपीचन्द गजना गोरी
अमरसिंह राठौर राजा अम्ब
रूप बसन्त राजा हरिश्चन्द्र
लीलो चमन अंजो मनियार
बादल बागी निहालदे सुलतान
पटवे की नया त्यौहार
बादल आदि

8. श्री चन्द्रलाल भाट उर्फ बेदी:-

सांगीतकार चन्द्रलाल भाट का जन्म 1923 में जीन्द रियासत के चरखी दादरी कस्बे के गोधडिया ब्राहाण नामक गांव में हुआ था। चन्द्रलाल के पिता का नाम सोहनलाल था जो भजनोपदेशक थे। उन्होंने अपने गांव के बारे में एक छंद में स्पष्ट करते हुए कहा है…

चरखी बराबर छत नहीं, सांगवाण जहां जाट।
उसी चरखी में गोधडिया ब्राहाण, वहीं से चन्द्र भाट।।

जन्म के कुछ वर्ष बाद इनके माता-पिता इस गांव को छोडकर दत्तनगर, उत्तर प्रदेश चले गये। इस प्रकार चन्द्रलाल भाट दत्तनगर, जिला मेरठ के निवासी बन गये। उनके द्वारा अपनी जन्मभूमि को छोडकर दत्त नगर जाने का उल्लेख निम्न दोहे में है-

जन्मभूमि रियासत जीन्द में, दत्तनगर किया है वास।
गोधडिया विप्र गांव चन्दर का, चरखी में समझ निकास।।

चन्द्रलाल उर्दू में पांचवी पास थे। ये हरियाणवी के अलावा उर्दू, पंजाबी, हिन्दी, एवं राजस्थानी इत्यादि भाषाओं का ज्ञान रखते थे। सांगी चन्द्रलाल भाट के गुरू मंगलचंद थे। ‘प्रेमजान चन्द्रपाल’ नामक सांगीत में उन्होंने अपनी गुरू परम्परा का उल्लेख इस प्रकार किया है-

कविताई के ज्ञाता सेढू लक्ष्मण और गोपाल गये।
स्वामी शंकरदास दादा गुरू नत्थूदास गये।
गुरू छदं लड़ी बन्द मंगलचन्द कर कमाल गये।

इनके सांगों मे आधुनिकता की छाप होती थी। वे फिल्मी तर्जों पर सांग की रागनियां गाया करते थे। ‘‘चन्द्रलाल नई तर्जों में रोज करै कविताई’’

अन्य छंद में
‘‘चन्द्रलाल नये फैशन की रागनी सबाके घायल करगी’’।

चन्द्रलाल जी के शब्दों में ‘‘हमारी टक्कर सांगियों से नहीं, हमारी टक्कर तो बम्बई वालों से है।’’ इन्होंने सबसे पहले नागिन फिल्म के गानों की धुन पर रागनियां गानी शुरू की। इसके बाद तो युवाओं की मांग के अनुसार सभी सांगों की रागनी फिल्मी धुनों पर गाने लगे। इसके अलावा इन्होंने सबसे पहले महिला पात्रों का अभिनय करने के लिए लड़कियों को मंच पर उतारा लेकिन कुछ समय बाद फिर लड़कों से ही अभिनय करवाने लगे। हरियाणवी सांग को नई दिशा देने वाला यह महान् सांगीतकार 6 अगस्त 2004 को इस भौतिक संसार से विदा हो गया।

चन्द्रलाल जी ने ‘‘सैल बाला’ नामक सांगीत में आधुनिक समाज के लोगों के जीवन मूल्यों में परिवर्तन का उल्लेख निम्न पंक्तियों में किया है-

मतलब का रह गया जमाना, सब न्यारे पाटण लागे।
आँख्याँ मै शर्म रही ना, लेकै कर्ज नाटण लागे।।

महान लोककवि चन्द्रलाल भाट उर्फ बेदी ने 100 के आस-पास सांगीतों का लेखन व मंचन किया। इनमें से कुछ सांग इस प्रकार है-

गजना गोरी माया देवी
मेहनादेवी चम्पादे माली की
रतना बादल हीर-रांझा
बीजा सोरठ शाही लाल बहार
कान्ता देवी शाही सुहागन का दुहाग
दमयन्ती स्वयंवर धन्ना जाट
चन्द्रपाल सुमित्रा अंजना दिसौटा
गुलशन गुलबहार निहाल्दे परवाना
इन्दल दिसोटा अजीत सिंह राजबाला
सत्यवान सावित्री संसार चक्र
नौबहार पृथ्वी सिंह किरणमई
हूर मेनका दुष्यन्त शकुन्तला
नौ दो ग्यारह आठ चार बाहर
कृष्णभात गौ-हरण
कीचकवध भीम जीमल मल्लयुद्ध31
रूप बसन्त रूपा राधेश्याम
अनारकली जीजा साली
शैणबाला हरियाणे की चोट
छोरी स्कूटर आली ऊँखा
सत्यवती फूलकंवर छोरा कर्मवीर
सरल देवी भक्त प्रह्लाद
गंगा जमुना संगम की चोट
देवर-भाभी मंगल राजा
मेहनदे शाही मनियार

9. पं. रामकिशन व्यास:-

सांगीत के जादूगर पं0 रामकिशन व्यास का जन्म 13 अक्तूबर 1925 ई0 को नारनौद, हिसार में पं0 सीताराम के घर हुआ। सन् 1940 में रामकिशन व्यास प्रतिष्ठित लोक कवि माईराम की छत्रछाया में आए जहां उन्होंने सांग की विद्या के साथ-साथ कविता लेखन में काबिलियत हासिल की। पहली बार उन्होंने ‘ देवी माई करो सहाई, विद्या वरदान देवी’ भेंट लिखी। इसके बाद उन्होंने सफलता के नए आयाम स्थापित किए। उन्होंने कविता लिखने का अनवरन अभ्यास किया और निम्नलिखित भजन की रचना पर गुरू माईराम ने इन्हें पांच रूपये इनाम में दिये।

मूर्ख नर अज्ञानी ज्ञान कर, क्यूं तू उम्र गंवावै सै,
लाख चैरासी योनि मै, आदमदेह मुश्किल तै पावै सै,

15 वर्ष की आयु में सन् 1940 में ही पं0 रामकिशन व्यास ने पिंझुपुरा, कलायत में तीन और म्यौली में चार सांग किए जिससे उनकी पार्टी को पुरस्कृत किया गया। पं0 रामकिशन व्यास को शशीकला सुखबीर, कम्मो-कैलाश, रूपकला-जादूखोरी एवं नल-दमयन्ती आदि सांगों ने विशेष पहचान दिलाई। उनके सांगों की गंूज हरियाणा, राजस्थान एवं उतर प्रदेश के विभिन्न शहरों तक सुनाई देती थी। उनके स्वांगों में लोकजीवन व जमीन से जुड़े जनमानस का जिक्र होता था, जिस कारण हर कोई उनके सांगों का दिवाना था। सांग के प्रचलन के विषय में व्यास जी का कहना था- ‘‘यह विधा 12वीं शताब्दी के आस-पास शुरू हो गई थी। नारनौल के एक ब्राहाण बिहारी लाल ने शुरू की थी। लेकिन मुगलों के समय में सांग खेलने पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगा दिया गया था। क्योंकि सांगों के माध्यम से अपनी संस्कृति का ज्ञान और देशभक्ति का ज्ञान कराया जाता था। बिहारी के बाद उनके ही एक शिष्य चेतन ने सांग शुरू किये थे। 17वीं शताब्दी में सांगों का दौर पुनः आरम्भ हुआ, परन्तु इसको आरम्भ करने वाले बाबू बालमुकुन्द गुप्त थे, उसके पश्चात् उनके शिष्य गिरधर तथा कुछ समय बाद शिवकौर ने सांग किये। उसके बाद किशन लाल का आगमन हुआ। पंडित रामकिशन ब्यास जी ने अपनी एक रचना मे भी इस सांग प्रचलन को दर्शाया हुआ है द्य इस प्रकार महान सांगी रामकिशन ब्यास जी का 2 अगस्तए 2003 को निधन हो गया।

‘शशीकला-सुखवीर’ नामक सांगीत में लोक कवि पं0 रामकिशन व्यास ने संयुक्त परिवार के महत्व को दर्शाते हुए सुखवीर के पिता के माध्यम से कहा है-

कहया मान सुखबीर, सीर बराबर सुख कौन्या,
मिल जुलकै रहो सारे, न्यारे होण बराबर दुख कौन्या।।

ऐक के पिछे ऐक लिखो, ग्यारा की मालम पटज्यागी,
ऐक न ऐक से अलग लिखोगे, तो नौ की ताकत घटज्यागी,
इसी तरहां से धन दौलत थारी, दौ हीस्यां मैं बंटज्यागी,
दोनों भाई रहो सीर थारी, सुख से जिन्दगी कटज्यागी।

पं0 रामकिशन व्यास ने 16 सांगों की रचना की जो कि निम्नलिखित हैः-

सती-सावित्री हीरामल जमाल
शशीकला-सुखबीर शरणदे नाई की
रूपकला जादूखोरी धर्मजीत
कम्मों कैलाश हीर-रांझा
फूलकली नल-दमयन्ती
सोमवती-चापसिंह जानी चोर
चन्द्रहास द्रौपदी कीचक
सिरड़ी सत साई सत्यवती।

प्रारम्भिक दौर में जो चार कथाएं गुरू पं0 माईराम अलेवा निवासी से सीखी व उनका मंचन किया वे हैः-

पूर्णमल उखा अनिरूद्ध गोपीचंद चमन सुकन्या

10. जनकवि फौजी मेहरसिंह:-

फौजी मेहरसिंह का नाम हरियाणवी लोक-साहित्य में सम्मान के साथ लिया जाता है। इनका जन्म 15 फरवरी, सन् 1918 में गांव बरोणा, जिला सोनीपत में हुआ था। पारिवारिक और आर्थिक कठिनाईयों के कारण मेहरसिंह ज्यादा नहीं पढ़ पाये। महज 4 जमात पास मेहरसिंह गांव के अन्य बच्चों की तरह पशु चराने जाते थे। खेतों में, गांव के गोरे व जोहड के किनारे अपने दोस्तों के बीच रागणी सुनाते थे। फौजी मेहर सिंह 2 सितम्बर 1936 को सेना में भर्ती हुए थे और बाद में आई.एन.ए. में भर्ती हो गये थे। फौजी मेहरसिंह ने पं0 लखमीचंद को अपना गुरू माना। सन् 1936 से 1945 तक उन्होंने लगभग 9 साल तक सेना में नौकरी की। फौज में रहकर उन्होंने हर विषय पर रागनी और सांग लिखे। इन्होंने असंख्य मुक्तक रागनियां एवं भजन आदि भी लिखे।

मेहरसिंह की आवाज अत्यन्त मधु एवं सुरीली थी। आजाद हिन्द के नेता सुभाष चन्द्र बोस के साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर लडने वाला यह सिपाही अपनी ही तरह का अलग पुरूष था जिसने फौजी जीवन व कला में अनूठा समन्वय स्थापित किया था। ग्रामीण परिवेश में पैदा हुए और पले-बढ़े तथा मेहरसिंह ने ग्रामीण जीवन को ही अपनी रागनियों में समेटा है। समाज में फैली कुरीतियों, उंच-नीच, छूआछूत, गरीबी और अमीरी का भेद का भी अपनी रागनियों में बडा ही मार्मिक चित्रण किया हैः-

परमेशर नै दो जात बणादी, एक टोटा एक साहूकारा,
एक बेल कै दो फल लागैं, एक मीठा एक खारा,
जिसकै धोरै पैसे हो वो, सबनै लागै प्यारा,
जिस माणस कै टोटा आज्या, भाई दें दुतकारा।

रागणी विधा को नया रूप, नयी संवेदना, तथा नया अर्थ देने वाले फौजी मेहर सिंह 15 मार्च 1945 को माण्डले हस्पताल में 29 वर्ष की अल्पायु में ही स्वर्ग सिधार गये।

हरियाणवी ग्रामीण समाज में लोक-विश्वासों, शकुन-अपशकुनों का महत्वपूर्ण स्थान है। समाज में ऐसी लोकधारणा है कि जब कोई व्यक्ति किसी कार्य की सिद्धि के लिए अपने घर से निकलता है तो उस समय, कुत्ते का कान मारना, बाई और कव्वे का बोलना, खाली घड़ा लिये औरत का मिलना, छींकना एवं विधवा नारी का केश बिखेरे मिलना इत्यादि अपशकुन अनिष्टकर माने जाते है। सांगीत ‘सरवर-नीर’ में राजा अम्ब जब जंगल से पते लेकर चलता है तो उस समय उसे इसी प्रकार के अपशकुन दिखाई देते है, इन समय लोक कवि फौजी मेहर सिंह कहते है-

गहरी चिन्ता हुई गात म्हं, धड़-धड़ छाती धड़कै।
पता लेकै चाल्या राव, जब शहर लिया मर पड़कै।।
आग्गै सी नै मिली लुगाई, रीति दोघड़ करकै।
आग्गै तै सीधी छींक मारदी, मुंह के सामी करकै।
होग्ये सौण-कसोण कुंवर, इब पैंडा छुटै मरकै।।

लोककवि फौजी मेहरसिंह ने 16 के लगभग सांगीतों एवं 150 के आसपास अन्य सांगो नौटंकी, गजनादे, हीर राँझा मे भी फुटकड़ रागनियों की रचना की। उनके रचित सांग इस प्रकार से हैः-

चन्द्रकिरण राजा हरिश्चन्द्र
सत्यवान-सावित्री चाप सिंह
शाही लकड़हारा अजीत सिंह राजबाला
सेठ ताराचन्द सरवर-नीर
अंजना-पवन सुभाषचंद्र बोस
काला चान्द
पदमावत
जगदेव बीरमती
वीर हकीकतराय
रूप बसंत
भगत पूर्णमल सुंदरादे

इन्होंने असंख्य मुक्तक एवं 50 के आसपास सपनों के भजन एवं रागनियां आदि भी लिखे।

11. चौ. मुंशीराम जांडली:-

महान कवि चौ. मुंशीराम का जन्म 26 मार्च, सन 1915 को गाँव छोटी जांडली, फतेहाबाद-हरियाणा मे एक कृषक परिवार के अन्दर पिता चौ, धारीराम व माता लीलावती के घर हुआ। वैसे तो ये गाँव जांडली पहले हरियाणा के जिला हिसार क्षेत्र के अंतर्गत आता था। चौ. मुंशीराम की शिक्षा प्रारम्भिक स्तर तक ही हो पायी थी, क्यूंकि उस समय उनके गाँव के दूर-दराज के क्षेत्रों तक शिक्षण स्थानों का काफी अभाव था। इसलिए फिर मुंशीराम जी ने उन्ही के पैतृक गाँव मे बाबा पंचमगिरी धाम के अन्दर ही चौथी कक्षा तक शिक्षा ग्रहण की। उसके बाद फिर मंजूर-ऐ-तक़दीर के तहत उनका ध्यान मनोरंजन के साधनों की तरफ आकर्षित होते हुए संगीत कला व हरियाणवी लोकसाहित्य की ओर मुड़ गया। शुरुआत मे तो मुंशीराम जी अपने मुख्य व्यसाय कृषि के साथ-साथ श्रृंगार-प्रधान रस की ही रचना गाया और लिखा करते थे तथा इन्ही के द्वारा अपना समय व्यतित करते थे। कुछ समय पश्चात् वे अपने ही गाँव जांडली खुर्द निवासी ग़दर पार्टी के सदस्य व देशप्रेमी हरिश्चंद्रनाथ वैद्य की तरफ आकर्षित होने लगे जो एक योग गुरु भी थे और उनकी देशभक्ति विचारों एवं देशप्रेम भावनाओं से प्रेरित होकर अंत मे उन्ही को अपना गुरु धारण किया। फिर बाद मे उनके गुरु हरिश्चंद्र नाथ ने ही अपने शिष्य मुंशीराम की लगन व श्रद्धा और प्रतिभा को देखते हुए इनकी जीवन धारणा को सामाजिक कार्यों और देशप्रेम की ओर मोड़ दिया, जो जीवनभर प्रज्वलित रही। गुरु हरिश्चंद्र नाथ का देहांत शिष्य मुंशीराम के देहांत के काफी लम्बे अर्से बाद सन 1993 मे हुआ। इसीलिए वे अपने शिष्य मुंशीराम से जुडी हुई अनेकों यादों दोहराया करते थे। चौ. मुंशीराम की आवाज बहुत ही सुरीली थी जिसके कारण उनके कार्यक्रम दूर-दराज के क्षेत्रों तक सुने जाते थे। फिर मुंशीराम जी के एक पारिवारिक सदस्य चिरंजीलाल ने बताया कि उनके दो विवाह हुए थे, जिनमे मे से उनकी पहली पत्नी रजनी देवी का कुछ समय पश्चात् निधन हो गया था। उसके बाद फिर चौ. मुंशीराम ने अपनी पहली पत्नी देहांत के बाद पारिवारिक अटकलों से उभरते हुए एक बार अपने ही गाँव मे कलामंच पर अपना कला-प्रदर्शन पुनः प्रारंभ किया तो गाँव के ही कुछ लोगों ने उनका मजाक उड़ाते हुए कहा कि ‘शीराम तेरै पै तो रंडेपाँ चढ़ग्या’। फिर उन्होंने कलामंच पर ऐसे घृणित शब्द सुनकर उस दिन के बाद कथा एवं सांग मंचन को तो उसी समय ही छोड़ दिया, किन्तु अपनी रचनाओं को कभी विराम नहीं दिया, क्यूंकि वे एक बहुत ही भावुक व संवेदनशील रचनाकार थे। उसके बाद पुनर्विवाह के रूप मे वे दूसरी पत्नी सुठियां देवी के साथ वैवाहिक बंधन मे बंधे, जिससे उनको एक लक्ष्मी रूप मे एक पुत्री प्राप्त हुई परन्तु वह भी बाल्यकाल मे ही वापिस मृत्यु को प्राप्त हो गई। उसके बाद तो फिर इस हमारे लोकसाहित्य पर ही एक कहर टूट पड़ा और हमारे अविस्मरणीय लोककवि चौ. मुशीराम जी अपनी 35 वर्ष की उम्र मे पंच तत्व में विलीन होते हुए भवसागर से पार होकर अपनी दूसरी पत्नी सुठियां के साथ-साथ हमकों भी अपनी इस ज्ञान गंगा मे गोते लगाने से अछूते छोड़ गए। फिर हमारी सामाजिक परंपरा के अनुसार इनकी दूसरी पत्नी सुठियां देवी को इनके ही बड़े भाई श्यौलीराम के संरक्षण मे छोड़ दिया गया, जिनसे फिर एक पुत्र का जन्म हुआ जो बलजीत सिंह के रूप मे कृषि व्यवसाय मे कार्यकरत रहते हुए अब वे भी हमारे बीच नहीं रहे।

वैसे तो मुंशीराम जी का अल्प जीवन सम्पूर्णतः ही संघर्षशील रहा है और विपतियों की मकड़ीयों ने हमेशा अपने जाल मे घेरे रखाए क्यूंकि एक तो आवश्यक संसाधनों की कमी, दूसरी आजादी के आन्दोलनों का संघर्षशील दौर और दूसरी तरफ गृहस्थ आश्रम की विपरीत परिस्थितियों के संकटमय बादल हमेंशा घनघोर घटा बनकर छाये रहे तथा अंत मे वे फिर एक झूठे आरोपों के मुक़दमे फांस लिए गए। उसके बाद तो फिर एक प्रकार से झूठे मुक़दमे ने उनकी जीवन-लीला को विराम देने मे अहम भूमिका निभाई थी, क्यूंकि इन्ही के पारिवारिक सदस्य श्री रामकिशन से ज्ञात हुआ कि उन्हें एक साजिशी तौर पर एक असत्य के जाल मे फंसाकर झूठे मुकदमों के घेरे मे घेर लिया। उसके बाद फिर झूठी गवाही के चक्रव्यूह से निकलने के लिए सभी गवाहों से बारम्बार विशेष अनुरोध किया गया, लेकिन उन्होंने चौ. मुंशीराम के प्रति कभी भी सहमती नहीं दिखा। फिर अपने न्याय के अंतिम चरणों मे उनसे उनकी अंतिम इच्छा पूछने पर चौ. मुंशीराम ने तीनों न्यायधीशों- जुगल किशोर आजाद एवं दो अंग्रेजी जजों के सामने अपने आप को निर्दोष साबित करने के लिए अपनी जन्मजात व निरंतर अभ्यास से बहुमुखी प्रतिभा का साक्ष्य देते हुए अपनी अदभुत कला द्वारा एक ऐसी प्रमाणिक व प्रेरणादायक रचना का बखान किया कि उस न्यायालय के जज पर ऐसा सकारात्मक प्रभाव पड़ा कि उसको चौ. मुंशीराम के न्यायसंगत मुक़दमे पर अपनी कलम को वही विराम देना पड़ा, जिससे विरोधियों के चक्षु-कपाट खुले के खुले रह गए। इसीलिए इसी मौके की उनकी एक रचना इस प्रकार प्रस्तुत है कि-

ऐसा कौण जगत के म्हा, जो नहीं किसे तै छल करग्या,
छल की दुनियां भरी पड़ी, कोए आज करैं कोए कल करग्या ।। टेक ।।

राजा दशरथ रामचंद्र के सिर पै, ताज धरण लाग्या,
कैकयी नै इसा छल करया, वो जंगल बीच फिरण लाग्या,
मृग का रूप धारकै मारीच, राम कुटी पै चरण लाग्या,
पड़े अकल पै पत्थर, ज्ञानी रावण सिया हरण लाग्या,
सिया हड़े तै लंका जलगी, वो खुद करणी का फल भरग्या ।
श्री रामचंद्र भी छल करकै, उस बाली नै घायल करग्या ।।

दुर्योधन नै धर्मपुत्र को, छल का जुआ दिया खिला,
राजपाट धनमाल खजानाए माट्टी के म्हा दिया मिला,
कौरवों नै पांडवों कोए दिसौटा भी दिया दिला,
ऐसे तीर चले भाइयों केए धरती का तख्त दिया हिला,
वो चक्रव्यूह भी छल तै बण्याए अभिमन्यु हलचल करग्या ।
कुरुक्षेत्र के घोर युद्ध मैं, 18 अक्षरोहणी दल मरग्या ।।

कुंती देख मौत अर्जुन की, सुत्या बेटा लिया जगा,
बोली बेटा कर्ण मेरे, और झट छाती कै लिया लगा,
वचन भराकै ज्यान मांगली, माता करगी कोड़ दगा,
ज्यान बख्शदी दानवीर नै, अपणा तर्कश दिया बगा,
इन्द्रदेव भिखारी बणकै, सूर्य का कवच-कुण्डल हरग्या ।
रथ का पहियाँ धंसा दिया, खुद कृष्ण जी दलदल करग्या ।।

हरिश्चंद्र नै भी छल करया, विश्वामित्र विश्वास नहीं,
लेई परीक्षा तीनों बिकगे, पेट भरण की आस नहीं,
ऋषि नै विषियर बणकै, के डंस्या कंवर रोहतास नहीं,
कफन तलक भी नहीं मिल्या, फूंकी बेटे की ल्हाश नहीं,
28 दिन तक भूखा रहकै, भंगी के घर जल भरग्या ।
श्री मुंशीराम धर्म कारण, हटके सत उज्जवल करग्या ।।

इस प्रकार इस रचना की चारों कली सुनके और उसकी दूरदर्शिता देखके चौ. मुंशीराम को उन जजों ने उसी समय बरी कर दिया। उसके बावजूद मुकदमा, पेशी, जेल, पुलिस, गृहस्थ विपदा आदि की मझदार मे फंसे हुए भंवर सैलानी के रूप मे देशभक्त चौ. मुंशीराम को अपने जीवन-तराजू के पलड़े मे बैठकर और भी महंगी कीमत चुकानी पड़ी और वो दूसरा अत्यधिक भारी पलड़ा था- तपेदिक का लाईलाज रोग। इस प्रकार मात्र 35 वर्ष की अल्पायु मे जनवरी.1950 को ये वैतरणी नदी को पार करते हुये इस निधि के बन्धनों से मुक्त हो गए और एक महान कवि के रूप मे अपने लोक साहित्य के स्वर्णिम अक्षरों को हमारी आत्माओं मे चित्रित कर गये।
अगर चौ. मुंशीराम के कृतित्व पर प्रकाश डाला जाये तो उन्होंने अपने साहित्यिक जीवन मे अनेकों सांग/कथा और फुटकड़ कृतियों की रचना की, परन्तु उस आजादी की लड़ाई के मार्मिक दौर मे संरक्षित न हो पाने के कारण उनकी अधिकांश कथाएं काल के गर्त मे समा गई। वर्तमान मे उनकी लगभग कुछ प्रमुख कथाओं के साथ अन्य कथाओं की कुछ इक्की-दुक्की रचना ही संकलित हो पायी, जैसे. मीराबाई, चंद्रकलाशी, महाभारत, हीर-राँझा इत्यादि, जो ‘मुंशीराम जांडली ग्रंथावली’ नामक प्रकाशित पुस्तक मे संग्रहित है। उनके रचित इतिहासों का प्रमुख सार इस प्रकार है-

राजा हरिश्चंद्र पूर्णमल भगत जयमल.फत्ता
पृथ्वीराज चौहान अमरसिंह राठौड़ फुटकड़ रचनाएँ

12. भारत भूषण सांघीवाल :-

लोक-कवि भारतभूषण सांघीवाल उर्फ श्री नारायण शास्त्री का जन्म 28 फरवरी 1932 को ग्राम सांघ्ज्ञी जिला रोहतक मे हुआ। आपके दादा पं. विद्यापति अपने समय के सिद्धहस्त वैध थे और पिता पं. छोटेलाल विद्यासागर संस्कृत के अच्छे विद्वान थे। इनकी माता का नाम चन्द्रकला देवी था, जो एक धार्मिक प्रवृति की महिला थी। दादा, पिता और माता के संस्कारों का प्रभाव बालक भारतभूषण पर भी पड़ा। इनकी प्रारम्भिक शिक्षा उर्दू में हुई। आठ वर्ष की आयु में ही पिता जी का साया सिर से उठने के कारण सांघीवाल को अनेक समस्याओं से जूझना पड़ा। अनेक संघर्षो को झेलते हुए इन्होंने सन् 1950 में पंजाब विश्वविद्यालय, चण्डीगढ से शास्त्री की परीक्षा उतीर्ण की। तदन्तर साहित्यरत्न और आयुर्वेदरत्न की परीक्षाएं भी उतीर्ण की।40
सांघीवाल जी ने सन् 1950 में प्रसन्नी दवी से विवाह किया। सन् 1951 में संस्कृत के अध्यापक के रूप में अध्यापन कार्य प्रारम्भ किया। उस समय आप नारायण शास्त्री के नाम से प्रसिद्ध थे। कुछ समय पश्चात् आप ‘भारतभूषण सांघीवाल के नाम से विख्यात हुए। चीन आक्रमण के समय सन् 1962 में आपने देशभक्ति से ओत-प्रोत कविताएं लिखी तथा क्रान्तिगाम शीर्षक से इनको प्रकाशित करवाया। सन् 1965 में जय-जय हिन्दुस्तान हरियाणवी नाटक का अनेक स्थानों पर मंचन किया। हरियाणा की सर्वोच्च साहित्य संस्था हरियाणा साहित्य अकादमी ने आपकी सूरज-पांच तथा मांगलकलशम् काव्य कृतियों को प्रथम पुरस्कार से सम्मानित करके इन्हें गौरवान्वित किया है। इसके अलावा आजादी के दीवाने और संस्कृत गीत मंजरी को अकादमी ने प्रकाशन अनुदान प्रदान करके इनका सम्मान किया है। इनकी उल्लेखनीय सेवाओं के उपलक्ष्य मे सन् 1985 ई. में हरियाणा सरकार द्वारा राज्य शिक्षक पुरस्कार तथा 1987 मे भारत सरकार द्वारा राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इनके 6 हरियाणवी संगीत रूपक, सूरजकौर, चांदकौर, झांसी रानी, सुभाष चन्द्र बोस, भगत सिंह एवं उधम सिंह आकाशवाणी रोहतक से प्रसारित हो चुके हैं।
लोक कवि भारतभूषण सांघीवाल ने धर्मवीर हकीकतराय नामक सांगीतरूपक में सर्वधर्म समभाव के सिद्धान्त को इस प्रकार प्रस्तुत किया-

सब धर्मो का सार एक सै, मूर्ख करै लड़ाई।
एक बाप के बेटे सै हम, सारे भाई-भाई।।।
धर्म एक साधन, दर्शन ईश्वर के करावै सै।
मन रै इन्द्रियां पै अंकुश यू लगावै सै।।

डॉ रामपत यादव द्वारा सम्पादित हरियाणवी काव्य ग्रन्थावली में जो हरियाणवी काव्य दिया गया है वह हरियाणवी सांगीत का ही एक रूप है जिसका मंचन किया जा सकता है-

नरसी भगत परशुराम चरित सीताहरण श्रीकृष्ण जन्म
कीचक वध धर्मवीर हकीकत राय महाराणा प्रताप छत्रपति शिवाजी वीरबाला चंचलकुमारी फूलझड़ी स्वामी दयानन्द सरस्वती
महात्मा गांधी जवाहर लाल नामक शीर्षक से इनकी रचना की गई है।

13. पं. लहणासिंह अत्री :-

आधुनिक युग के सांगीत लेखकों में पं0 लहणा सिंह अत्री का प्रमुख स्थान है। इनका जन्म 03.12.1950 ई. को गांव फफड़ाना, तहसील असन्ध, जिला करनाल में हुआ। इनके पिता का नाम श्री अमीलाल तथा माता का नाम श्रीमती सरती देवी है। श्री लहणा सिंह अत्री बचपन से ही सांग देखने में रूचि रखते थे। जब वे छोटी श्रेणी मंे गांव के स्कूल में पढ़ते थे, तो गावं के आस-पास में सांग होता, उसे देखने पहुंच जाते थे। अत्री जी पं0 लखमीचंद जी की कविताई से प्रभावित हैं, संगीत में रूचि होने के कारण इन्होंने मुक्तक रागनी की रचना करना अपने विद्यार्थी जीवन में ही आरम्भ कर दिया था। अत्री जी ने पं0 मांगेराम के शिष्य पं0 लख्मीचंद भम्भेवा निवासी को अपना गुरू धारण किया। यद्यपि पं0 लहणा सिंह अत्री कभी पं0 लख्मीचंद भम्भेवा की सांगीत मण्डली में नही रहे परन्तु उन्होनंे अपनी अन्तरात्मा से उनको अपना गुरू मान लिया। इनकी एक भी ऐसी रचना नहीं जिसमें गुरू स्मरण न किया गया हो।

लोक कवि पं. लहणा सिंह ने अभी तक 7 सांगों और कुछ मुक्तक रागनियों एवं भजनों की रचना की है। अपनी रचनाओं मे अत्री जी ने अनेक पौराणिक, ऐतिहासिक एवं सामाजिक घटनाओं का उल्लेख किया है तथा अनेक सामाजिक समस्याओं को भी अपने सांगीतों मंे स्थान दिया है। दहेज प्रथा की समस्या को गम्भीरता से उठाते हुए एक छंद मे वे कहते हैं-

ईब जागृति आण लागरी, मतना करै विचार इसा,
कार, स्कूटर, फ्रीज मांगता, ना चाहिए घरबार इसा,
जडै़ नणंद जैठाणी सास पीटती, के फूकैगी परिवार इसा,
तेल छिडक खुद आग लगादे, के चाहिए था भरतार इसा,
छल, कपट, सौ कोस दूर यू लहणा सिंह देख्या भाल्या।।

इसी प्रकार बाल-विवाह, बेमेल विवाह, प्रदूषण, जनसंख्या वृद्धि इत्यादि समस्याओं को अपने सांगीतों मंे उठाया है। आप सन् 06.10.1979 से महर्षि दयानन्द विश्वविद्यालय रोहतक में कार्यरत है।

पं0 लहणा सिंह अत्री सांगों का मंचन नहीं करते वे सांगीत लेखक है इन्होंने 7 सांगीतों की रचना की है जो प्रकाशित हो चुके है-

शिवजी का ब्याह बल्लभगढ का नाहर नज्मा कमली
रामरतन का ब्याह प्रीतकौर चन्द्रपाल हीरामल जमाल।

14. डा. रणबीर दहिया :-

डा. रणबीर सिंह दहिया का जन्म गांव बरोणा, जिला सोनीपत के कृषक परिवार में 11 मार्च 1950 को हुआ। हरियाणा की साहित्यिक गतिविधियों मे इनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है। इन्होंने हिन्दी और हरियाणवी दोनों ही भाषाओं मे रचनाएं लिखी है। सन् 1983 ई0 में इनका उपन्यास मलबे के नीचे प्रकाशित हुआ। जिसमें इन्होंने मलबे के नीचे दफन उर्जा को सशक्त अभिव्यक्ति दी है। वर्ष 1998 ई0 में इनका कहानी संग्रह पोस्टमार्टम प्रकाशित हुआ जिसमें सात कहानियों का संकलन है।

डॉ. रणबीर दहिया का लेखन आम आदमी, धरती से जुडे व्यक्ति का लेखन है। शायद इसीलिए इन्होंने स्थानीय भाषा हरियाणा में भी अनेक सांगों एवं मुक्तक रागनियों की रचना की है। उन्होने शहीद जसबीर सिंह, चम्पा चमेली, जलियांवाला बाग, सफदर हाशमी, जालिम अमरीका आण्डी सद्दाम, रणबीर चांदकौर, बाजे भगत, फौजी मेहर सिंह, किस्सा प्रधानमन्त्री तथा उधम सिंह आदि सांग की मुक्तक रागनियां नया दौर-1 व नया दौर-2 मे प्रकाशित हुई है। इसके अलावा रानी लक्ष्मीबाई, भूरा निगाहिया, फूल कमल एवं फौजी किसान नामक शीर्षक से प्रोग्रेसिव प्रिंटर्स, ए-21, झिलमिल इंडिस्ट्रियल एरिया शाहदरा, दिल्ली से भावी प्रकाशन में हैं तथा नया दौर भाग-4 संकट छाग्या हरियाणवी गती नाटिका- रूखाला प्रकाशन, पी-27, इन्द्रप्रस्थ कालोनी, रोहतक-124001 हरियाणा से प्रकाशित हो चुकी है।

डा. दहिया की रागनियों की लगभग 15-16 आडियो-कैसेटस भी तैयार हो चुकी है। इनकी अनेक कहानियां, लेख नाटक, पत्र-पत्रिकाओं में भी प्रकाशित होते रहते है। इन्होंने फौजी मेहर सिंह की रागनियों का संकलन एंव सम्पादन भी किया है। हरियाणवी साहित्य एवं सामाजिक सेवाओं मे अपना महत्वपूर्ण योगदान देने वाले डाॅ0 रणबीर सिंह दहिया वर्तमान में व्यावसायिक दृष्टि से वरिष्ठ सर्जन के रूप में पी.जी.आई. रोहतक से लोगों को शारीरिक विकारों से निजात दिला रहे है। इसके साथ ही ये अनेक सामाजिक सेवा संस्थाओं से जुड़ कर उनको सामाजिक विकृतियों से लड़ने की प्रेरणा भी दे रहे है।

रणबीर-चांदकौर नामक सांगीत में डा. रणबीर सिंह दहिया ने हरियाणा प्रदेश में छोटे किसान परिवारों की आर्थिक स्थिति बिगड़ने का कारण मंहगाई को माना है-

दो किल्ले धरती सै मेरी, मुश्किल होया गुजारा रै
खाद बीज सब मंहगे होगे, कुछ ना चालै चारा रै।।

15. डा. चतरभुज बंसल :-

हरियाणवी लोक कवि डॉ. चतरभुज बंसल जी का जन्म 1 अप्रैल सन् 1951 को गांव सोथा जिला कैथल मे हुआ। इनके पिता का नाम लाला साधु राम बंसल तथा माता का नाम श्रीमती किशनी देवी है। चतरभुज बंसल जी ने आठवीं तक शिक्षा प्राप्त की। उन्हीं के शब्दों में- ‘‘हमारे घर मे कभी भी कोई साहित्यिक वातावरण नहीं रहा और ना ही कोई इस प्रकार का माहौल ही था जो मुझे विरासत के रूप में मिला हो। घरेलू माली हालत बडी दयनीय थी और तो और रहने के लिए अपना घर का मकान भी नहीं था। फिर भी घरवाले यही चाहते थे कि मैं पढ़ जाऊँ। स्कूली शिक्षा मे मेरा मन बिल्कुल नहीं लगता था। पता नहीं मैं आठवीं तक भी कैसे पढ़ गया। स्कूल की शिक्षा के दौरान मुझे पाठ्यक्रम की पुस्तकों से दूसरी पुस्तकें पढ़ने का अधिक शौक था। गुरू धारण सम्बन्धी इनके विचार इस प्रकार है- ‘‘दिल्ली से जो सांयकाल छः बजकर बीस मिनट पर हरियाणवी रागनियों का प्रोग्राम आता था, उसे तो मैं बिना नागा सुनता था और उसे सुनकर मुझे ऐसा होता जैसे मैं भी इस प्रकार के हरियाणवी गीत लिखूं। आखिर मैंने देवों के देव महादेव भगवान शंकर जी को अपना आराध्य देव, ईष्ट देव, गुरूदेव मानकर लिखना शुरू कर दिया और आज तक लिख रहा हूं।’’48 अर्थात् भगवान शिव शंकर को अपना गुरू माना।

डा. चतरभुज की रूचि हरियाणवी कविताएं लिखने में अधिक है। इन्होंने समसामयिक सामाजिक समस्याओं पर आधारित भजनों, रागनियों व सांगों की रचना की है। इनकी लगभग बीस पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है और अनेक अप्रकाशित है। जिनकी निकट भविष्य मंे प्रकाशित होने की संभावना है। इनकी निम्नलिखित रचनाएं प्रकाशित हो चुकी है- ज्ञानमाला 1991, आत्मज्ञान 1995, ज्ञानधारा 1996, गजल संग्रह 1999, ज्ञानबाण 1999, ज्ञानगीत 2000, आजादी के भगत 2001, गीत माला 2002, ज्ञानगंगा 2003, रत्नमाला 2003, सांग-माला पहला भाग 2004। उसके अलावा विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं जैसे हरियाणा संवाद, हरियाणा लीडर, हक-परस्त, दैनिक सीमा, संदेश आदि पत्र-पत्रिकाओं में 500 से अधिक कविताएं प्रकाशित हो चुकी है।49
ध्रुव का जन्म नामक सांगीत मंे लोक कवि ने समाज में प्रचलित बेमेल या अनमेल विवाह एवं बहु-विवाह रूपी समस्या को उठाया है। जिस लड़की को उसकी इच्छा के विरूद्ध ब्रूाहा गया हो और वह भी पहले से विवाहित पुरूष से तथा शादी का कारण उसकी अपनी सौत हों तो उस लड़की के मन में बदले की भावना घर करना स्वाभाविक है। राजा उतानपाद की छोटी रानी सुनिचि अपनी बड़ी बहन सुनीति को बेमेल विवाह करवाने पर उलहाना देती है-

यू बुड्डा मैं याणी स्याणी, शर्म लिहाज नहीं आई ऐ।
भरकै घूंट सबर की माला, इसके गल मैं पाई ऐ।
बाप बराबर लागै से यू, क्यूं इस गेलै लाई ऐ।
किस तरीयां बोलूं हांसू मैं, इसे फिकर नै खाई ऐ।।

हरियाणवी सांग माला में डा. चतरभुज बंस के निम्नलिखित सांगीत प्रकाशित हुए है-
कृष्ण जन्म नरसी भगत प्रह्लाद भगत ध्रुव भगत सरवर-नीर

16. प. मानसिंह जांवली :-
प. मानसिंह जांवली वाले दादा नत्थूलाल के शिष्य और प. रघुनाथ के गुरु थे।

शंकर ने नत्थू को तारा, मानसिंह गुरु तेरा सहारा, सुरती लगी लगन में,
आशा में रघुनाथ लगा है, अहंकार मद लोभ भगा है, मंगल मुदित मगन में,
जल पृथ्वी आकाश अगन में, बजै आप का साज।।

दादा नत्थूलाल के 107 अखाड़ो में से कुछ प्रमुख शिष्यों का वर्णन इस प्रकार मिलता है, जिनमे लोककवि श्री दिन्ना, श्री रामसिंह खेकड़ा, श्री बलवंत (बुल्ली) व प. मानसिंह जांवली वाले है।

थारे उल्टी बात समाई, जिद छोड़ भजन कर भाई,
कथा मानसिंह ने गाई, सदां नत्थू को शीश निवायक।।

प. रघुनाथ के सतगुरु प. मानसिंह खड़े भजन व कड़े चमोले गाया करते थे क्यूंकि इनके सांगो मे इन्ही छंदों का ज्यादातर प्रयोग होता था। प. मानसिंह ऊँची व सुरीली आवाज के धनी थे और उस समय उनके जैसी आवाज का लोककवि या गायक कोई विरला ही था।

सतगुर मानसिंह कैसा, रघुनाथ का कोई अलाप नहीं।।

बुजुर्ग व उतरप्रदेश साहित्य के जानकार एक समय की बात बताते है कि आसपास के क्षेत्रो में उ.प. व हरियाणा के प्रसिद्द सांगीतकारो का मंचन हो रहा था तो प. मानसिंह की आवाज दुसरे क्षेत्रो तक सुनाई दे रही थी अर्थात अन्य सांगियो के मंच तक पहुँच रही थी तो उन मंचो से श्रोता उठकर प. मानसिंह के सांग मंच मे चले गये। दुर्भाग्य से उनकी कविताई भले ही अन्य प्रसिद्द कवियों जैसी लोकप्रिय न हो पायी हो, लेकिन उनकी आवाज अन्य कवियों से सुरीली व बुलंद थी।

गुरु मानसिंह का दुनियां में, सदा चमकता नूर रहै,
राम नाम रघुनाथ रटा हुया, हरदम चढ़ा सरूर रहै,
धर्म की रक्षा करने वाला, सन्त श्री शंकर होग्या।।

17. श्री बलजीत जोगी (पाधा):-
लोककवि बलजीत पाधा प. मानसिंह जी के ही शिष्य थे जो शामली जिले से सम्बन्ध थे। प. मानसिंह के बेड़े में ये सदा बड़े जनाने (रानी-महारानी) के रूप में मुख्य भूमिका ही निभाते थे। ये संस्कृत व हिंदी श्लोको के बहुत अच्छे ज्ञाता थे क्योंकि कार्यक्रम के प्रारंभ में गुरु सुमरण से पहले ये हमेशा आधे घंटे तक संस्कृत के श्लोको को ही गायन विधा में प्रस्तुत करते थे अर्थात मंचन के समय सदा एक विद्वानी भाषा का ही प्रयोग करते थे।

संजय वर्णन करो धीर से, रचना मेरे दुर्योधन की।। टेक ।।

पांडवो का पक्ष लेके ,कौन कौन आये होंगे,
महाकाल का भक्ष लेके, कौन कौन आये होंगे,
बाण कई लक्ष लेके, कौन कौन आये होंगे,
प्रथम संख भेरी बण, किसने शब्द किया होगा,
मूढ़ दुर्योधन का पोच, प्रारब्ध किया होगा
भ्राता ही ने भ्राता ही का, कैसे वध किया होगा,
उत्पन्न हुए एक शरीर, कैसे शुद्ध बुद्ध भूले तन की।।

कपिध्वज पै बाण, परमानंद नै ठुवाये होंगे,
रिपु पै को तान, परमानंद नै ठुवाये होंगे,
करने को मैदान, परमानंद नै ठुवाये होंगे,
गंगे जी के आक्रमण से, कौन कौन बचे होंगे,
जय अजय के होते, हाहाकार शब्द मचे होंगे
दस दिन का पर्ण सुनके, अन्न नहीं पचे होंगे,
उस भीष्म जी के तीर से, सजनी रोई कौन सजन की।।

भीम से विर्कोधर गदा, हाथ लेले लड़े होंगे,
गंभीर वीर धीर, पक्षपात लेले लड़े होंगे,
उस धर्मानंद युधिष्ठिर का, साथ लेले लड़े होंगे,
अश्वथामा द्रोण कर्ण, शील शब्द तोल उठै,
विद्या में निपुण, ब्रह्म ज्ञानियों में बोल उठै,
वीरता म्य रेखा लड़ै, पृथ्वी भी डोल उठै,
उस रवि पुत्र गंभीर से, कैसे बची होगी लाज सबन की।।

बाणों के प्रहार ह्रदय, फुट फुट गये होंगे
सहस्त्रो की घात सिर, टूट टूट गये होंगे,
श्वान सियार गिद्ध रुधिर, घूंट घूंट गये होंगे,
बानों से बिंधे कही, रूहंड कटे पड़े होंगे
हाथियों के युद्ध सिर, शुण्ड कटे पड़े होंगे
बड़े बड़े महारथियों के, मुंड कटे पड़े होंगे
गुरु मानसिंह तदबीर से, करू सेवा मै चौथेपन की।।

18. प. बलवंत उर्फ़ बुल्ली :-
प. बलवंत जी भी उ.प. के प्रसिद्द सांगी व लोककवि हुए है। ये नांगल, बडौत, मेरठ के निवासी थे। ये करुण रस के प्रख्यात सांगी थे। उस समय इनकी कविताई को काफी सराहा जाता था। उनकी कुछ पंक्तिया निम्नलिखित मे इस प्रकार है

अपने भक्त का हाथ नाथ, गया भूल हाथ म्य लेकै,
सुंदरबाई लगी चढ़ावण, फूल हाथ म्य लेकै,

सूरज शीतल चाँद म्य अग्नि, चाहे पृथ्वी पै तारे हो,
पर पत्नी पी से पी पत्नी से, कदे नहीं न्यारे हो,
(सांग : मीराबाई)

19. बुन्दुमीर :-
बुन्दुमीर जन्मांध थे। उनकी अपनी अलग सांग मण्डली थी। वे लोककवि के साथ एक अच्छे लोकगायक भी थे। उनकी रचनाओ की कुछ पंक्तिया निम्न प्रकार है

दिखी ऐ रै हो हो दिखी, रै! कौण दिखी ओट म्य किवाड़ी की,

हीरे जाने वाली बताईये जरा, खता क्या है मेरी बताईये जरा,

20. प. रघुबीर सुपिया :-
प. रघुबीर श्री मानसिंह के शिष्य थे और ये सूप ग्राम के निवासी थे जो पहले मेरठ मे आता था फिर बाद मे बागपत जिला। रघुबीर जी सुपिया के नाम से ही पुकारे जाते थे। रघुबीर सुपिया का ‘नरसी का भात’ एक ऐसा प्रसिद्द सांगीत बनाया था जो शायद किसी विरले कवि ने ही बनाया हो।

21. प. लक्ष्मीचंद सुपिया :-
प. लक्ष्मीचंद भी श्री मानसिंह के ही शिष्य और कवि रघुबीर के सगे छोटे भाई थे। उनकी एक रचना हमेशा विवादित रही क्यूंकि इस रचना मे उन्होंने अपनी छाप न लगाकर अपने गुरु मानसिंह के चरणों मे श्रध्दासुमन रूप मे समर्पित की। लेकिन कुछ सज्जन उसको प. लख्मीचंद जी की बताते है क्यूंकि उनके गुरु भी प. मानसिंह नाम के ही थे जो गाँव बसौधी, हरियाणा निवासी थे। परन्तु वह रचना श्री लख्मीचंद सुपिया वाले की ही है जो इस निम्न मे इस प्रकार है,

हे! गंगे तेरे अर्पण करती, अपना सुत प्यारा मैं,
इतनी कहै संदूक छोड़ दिया, कुंती नै धारा म्य,

22. प. रामरत्न :-
प. रामरत्न भी मेरठ मंडल के सुप्रसिद्ध कवि हुए है और उनकी रचनाये भी काफी प्रचलित रही। इनका जन्म ग्राम टिल्ला निकटतम जांवली के पास ही हुआ। इनकी सत्यवान सावित्री के इतिहास से कुछ पंक्तिया इस प्रकार है,

चमके लागै तेरी, चन्द्रमा सी शान म्य,
फिरै भटकती, जंगल बियाबान म्य,

23. पीरु पीर :-
पीरु इस्लाम धर्म से सम्बन्ध रखते थे मगर इनके गुरु प. गौरीशंकर थे। इनका जन्म ग्राम मिलक, मेरठ (गौतमबुद्ध नगर) मे हुआ। इस्लाम धर्म होने के बावजूद भी इन्होने हिन्दू धर्म के इतिहासों पर रचना की। इनकी रचनाओं की कुछ मुख्य पंक्तिया निम्नलिखित है,

पीरु कहै ज्ञान का सौदा, मिले गौरी शंकर की दूकान पे।

हस्तिनापुर से दुर्योधन नै, आके गऊऐ घेरी,
बचती हो तो लाज बचाले, चलदी चेली तेरी,

खड़ी खड़ी रोती, जैसे काग चुगे मोती,
जै मै हस्तिनापुर म्य होती, सजना लुटाती राजदान म्य,

24. लड्डन सिंह :-
इनका जन्म मुजफ्फरनगर-उ.प. के खेड़ी नावल गाँव मे हुआ और ये राजबल त्यागी के शिष्य थे। इनका कार्यक्षेत्र मुरादनगर, गाजियाबाद रहा है। ये एक ख्यातिप्राप्त कवि थे जिनका देहांत 20 जुलाई, 2020 ई. को हुआ। इनकी एक रचना की पंक्तियाँ निम्न मे इस प्रकार है।

समझ ना सकी देवर, कहानी तेरी मैं,
टापू म्य छोड़ आया, दुराणी तेरी मैं,

मास्टर मूलचंद :-

हरियाणा की सांग परम्परा में दक्षिणी हरियाणा के रेवाड़ी जिला के गांव जैतड़ावास के सुविख्यात सांग सम्राट व लोककवि मास्टर मूलचन्द का योगदान उल्लेखनीय रहा है। इनके बाद इनकी सांग परम्परा को इनके पुत्र मास्टर नेकीराम व सुपौत्र मास्टर राजेन्द्र सिंह ने आगे बढ़ाते हुए इसे लगभग 103 वर्षों तक बनाए रखा और एक ही परिवार की तीन पीढिय़ों द्वारा लगातार सर्वाधिक समय तक सांग मंचन का रिकार्ड अपने नाम कर सांग जगत में एक मिशाल कायम की। सांग के उस स्वर्णकाल में इनकी आहुति मील का पत्थर साबित हुई। वर्तमान में इनकी चौथी पीढि़ भी इनकी सांग परम्परा की संवाहक बनी हुई है।
सांग के स्वर्णकाल में सुविख्यात सांगी व लोककवि मास्टर मूलचंद का उल्लेखनीय योगदान रहा है। मास्टर मूलचंद प्रख्यात सांगी अलीबख्श के बाद दक्षिणी हरियाणा के दूसरे चर्चित सांगी थे। इनका जन्म 1889 में रेवाड़ी जिले के गांव जैतड़वास निवासी संगीताचार्य मास्टर रामसहाय के घर हुआ था। बचपन से ही पिता व गांव की संगीत मंडलियों के प्रभाव के कारण बालक मूलचंद की संगीत व गायन में रुचि रही। इनके पिता व गांववासियों ने जब इनका गाना सुना तो उन्होंने इन्हें सांगी बनने की सलाह दी। इसके बाद मूलचंद रेवाड़ी निवासी संगीताचार्य बुद्धा भगत के पास चले आए और उनसे संगीत की शिक्षा ग्रहण करने लगे। संगीत में पारंगत होने के बाद मूलचंद ने 16 वर्ष की आयु में अपनी अलग सांग मंडली बना ली और सांग मंचन शुरू कर दिए। अंग्रेजी शासन काल में इनकी प्रतिभा की तूती बोलती थी। उस दौर में ये देशभक्ति से भरी रागिनियों के लिए चर्चित थे। इनकी सांग मंडली में रेवाड़ी के गांव बूढ़पुर निवासी नानकचन्द (बाद में प्रसिद्ध सांगी बने) व तेजराम, जैतड़ावास निवासी छंगाराम, बिहारीलाल, श्योलाल, माधोराम, नत्थू, खरखड़ी निवासी श्रीचन्द, बनवारी, भगवानराम, सरजीत, हरदयाल, शाहपुर निवासी बुद्धाराम जैसे कुशल नर्तक व साजिंदे थे। मास्टर मूलचंद ने इस समूह के साथ तीन दशक तक सांगों का मंचन किया। किस्सा राजा सुल्तान निहाल दे, हरिशचंद्र तारावती, अमर सिंह राठौर, भगत पूर्णमल, राजा मोरध्वज, जानी चोर आदि इनके प्रसिद्ध सांग थे। मास्टर मूलचंद सांगों और रागनी के अतिरिक्त अलीबख्श, छोटा-बड़ा देश, काफिया, बरूआ, सवैया, नसीर, बहरे तबील आदि भी गाते थे। तीस वर्षो तक सांग का मंचन करने के बाद मास्टर मूलचंद ने इस कला की बागडोर अपने पुत्र मास्टर नेकीराम के हाथों में सौंप दी। 2 फरवरी 1958 को सांग कला के जादूगर मास्टर मूलचंद का निधन हो गया।

मास्टर नेकीराम:-

मास्टर नेकीराम का जन्म सांग सम्राट मास्टर मूलचन्द व श्रीमती लाडो देवी के घर में 6 अक्तूबर 1915 को हुआ था। बचपन से ही संगीत में अपनी गहन रूचि के चलते बालक नेकीराम ने अल्पायु में ही अपने पिता से इस कला की तालीम लेनी शुरू कर दी। इनके पिता मास्टर मूलचंद प्रभावी सांगी होने के साथ-साथ एक प्रतिभा सम्पन कवि भी थे। मास्टर नेकीराम ने अपने पिता का अनुशरण करते हुए सांग कला को विरासत के रूप में ग्रहण किया और इसे ऐसी गति दी कि वह सांग इतिहास में एक मिशाल बन गई। ये अपने पिता के ही शागिर्द थे, लेकिन इन्होंने अपने पिता के निर्देशानुसार राजस्थान के अलवर जिले के गांव सामधा स्थित मन्दिर के प्रथम महंत महाराज गरीब नाथ के शिष्य और गद्दी महंत महाराज गोपाल नाथ को अपना गुरू बनाया। मात्र 14 वर्ष की अल्पायु में ही अपने पिता के सान्धिय में अपने पहले सांग भगत पूर्णमल का मंचन किया। इसके बाद तो फिर नेकीराम ने पीछे मुडक़र नहीं देखा और कुछ ही वर्षों बाद वे अपने जमाने के एक लोकप्रिय सांगी बने और लोकप्रियता के उस शिखर पर पहुंचे जहां विरले ही पहुंच पाते हैं।

नेकीराम उस दौर में सबसे कम उम्र वाले सांग पार्टी के मुखिया थे। आगे चलकर वे सांग के क्षेत्र में अपने बेहतरीन सांग मंचन और अपनी ऊंची तथा सुरीली आवाज के बल पर अपने दौर के शिखर सितारा बने। उन्होंने अपने समकालीन अधिकतर सांगियों से अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया। नेकीराम की इस उपलब्धि से खुश होकर सांग प्रेमियों ने इनको इनके पिता की तरह संगीत व गायन के मास्टर की उपाधि दी। इसके बाद तो वे सांग जगत में मास्टर नेकीराम के नाम से स्थापित हो गए लेकिन सांग प्रेमी हमेशा ही इन्हें आदर के साथ मास्टर जी कहकर सम्बोधित करते थे।

मास्टर नेकीराम अपने सांग मंचन के दौरान जब अपनी आकृर्षक वेशभूषा में धोती-कुर्ता,बन्द गले का कोट और उस पर जगमगाते अनेक तमगें,सिर पर रेश्मी रूमाल,सूडोल शरीर,तेजस्वी मुख और हाथ में बैत लिए मंच पर शिरकत करते थे तो मंच की रौनक बढ जाती थी। इस सुन्दर और आकर्षक वेशभूषा में इनका व्यक्तित्व सचमुच बादशाह रूपी दिखाई देता था। मास्टर जी के मंच पर आते ही श्रोताओं की हजारों-हजारों निगाहें एक हो जाती थी। मास्टर नेकीराम मंच पर आकर माँ शारदे व गुरू वंदन के बाद जब गाना शुरू करते थे तो दर्शक ही नहीं कलाकार भी थिरकने लग जाते थे। वे एक से बढ कर एक ऐसी रागनियां गाते थे कि जिनका कोई जवाब नहीं। उनकी रागनियों को केवल वे ही गा सकते थे इस सच्चाई को नकारा नहीं जा सकता।

मास्टर नेकीराम की प्रमुख विशेषता यह थी कि जैसे-जैसे रात बढती थी वैसे-वैसे उनकी आवाज भी बढती चली जाती थी। उनका गायन उनके पिता की तरह कर्णप्रिय,अभिनय व संगीत उच्चकोटि का था। उन्हें एक ऐसे सांगी के रूप में जाना जाता है जिन्होंने अपने मधुर गायन व बिन्दास अभिनय से दर्शकों के बीच अपनी अलग पहचान बनाई। पूरा परिवार एक साथ बैठकर उनका सांग देख सकता था मजाल कहीं अशलीलता आ जाए। यहीं कारण था कि वे अपने जमाने के सांगियों से कहीं आगे थे। उनका सांग मंचन लगातार लगभग आठ घन्टे तक चलता था।

8 व 9 जनवरी, 1971 को गाँव नांगल चौधरी (हरियाणा) में हरियाणा कला मण्डल द्वारा मास्टर नेकीराम के दो सांगों का आयोजन कराया गया। यहां इनकी उत्तम सांग प्रस्तुति के लिए हरियाणा कला मण्डल के निदेशक देवीशंकर प्रभाकर ने इन्हें प्रशंसा पत्र भेंट करते हुए एक विशिष्ट सांग सम्राट की संज्ञा दी। यहां संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार की संगीत, नृत्य एवं नाटक की राष्ट्रीय अकादमी संगीत नाटक अकादमी, दिल्ली द्वारा उस दौर में हरियाणा के पहले और इकलौते कलाकार के रूप में मास्टर नेकीराम की मधुर आवाज को रिकार्ड किया और उनके द्वारा मंचित सांग फूल सिंह-नौटंकी की भी रिकार्डिंग की गई। इतना ही नहीं अपार जनसमूह के बीच इस सांग मंचन के सर्वप्रथम छायाचित्र भी लिए जो कि आज भी संगीत नाटक अकादमी के दिल्ली स्थित संग्रहालय में हरियाणा की धरोहर के रूप में सुरक्षित है।

मास्टर नेकीराम ने लगभग 30 सांगों का सृजन किया और उनका 60 वर्षों तक मंचन किया। किस्सा राजा भोज-भानवती, हीर-रांझा,लीलो-चमन, राजा रिसालू, राजपूत चापसिंह-सोमवती, फूलसिंह-नौटंकी, रूप-बसन्त, सेठ ताराचन्द, राजा हरिश्चन्द्र-तारावती, शाही लक्कड़हारा, कीचक-वध, मीराबाई, भगत पूर्णमल, पिंगला-भरथरी, अमर सिंह राठौर, जानी चोर, राजा सुल्तान निहालदे, बाबा भीमराव अम्बेडकर आदि उनके लोकप्रिय एवं प्रभावी सांग थे। उन्होंने अपने कुशल सांग मंचन से भारत वर्ष के सभी हिन्दी राज्यों में अपने प्रदेश का नाम रोशन किया। मास्टर नेकीराम को भारत वर्ष के समस्त राज्यों में स्थापित भारतीय सैनिक छावनियों में भी विशेष उत्सवों के अवसर पर सैनिकों के उत्साहवर्धन हेतू सांग कला के मंचन के लिए आमंत्रित किया जाता था। उन्होंने अपनी एक रचना में कहा है कि

बाबुल गैल्या देख्या काबुल, लाहौर-रांची मुल्तान गया,
कई बार करे सांग फौज म्हं, नेफा-नेपाल भूटान गया,
एमपी-यूपी पंजाब-हरियाणा, कच्छ-भुज राजस्थान गया,
पूर्व-पश्चिम उत्तर-दक्षिण, लगभग सारा हिन्दुस्तान गया,
नेकीराम सतगुरू कृपा से, दुनिया म्हं गुणगान हुया ।।

एक कवि के रूप में भी मास्टर नेकीराम ने अपना कलम तोड़ अन्दाज दिखाया। इन्होंने अपनी रचनाओं में तत्कालीन समस्याओं का सहज रूप से निरूपण, समाज को खण्डित करने वाली कुरीतियों का खण्डन, नैतिक मूल्यों में आई गिरावट, आर्थिक विषमता,रिश्वतखोरी, शिक्षा, तीज त्योहारों, रीति-रिवाजों व सामाजिक मूल्यों का उल्लेख करते हुए समाज में जागरूकता लाने का सफल प्रयास किया। इनकी रचनाओं का प्रंशनीय पहलू यह है कि इन्होंने अपनी सांग रचनाओं में कभी श्लीलता की सीमा नहीं लांघी। इन्होंने अपनी रचनाओं में मातृशक्ति को भी सदैव सम्मान दिया। इनकी एक रचना की पंक्तिया है कि

बेल बधेवा अगत निशानी खोटी बीर बताते क्यों?
उल्टी बुद्धि मति गुद्दी ने बेपीर बताते क्यों?
सुन्दर स्वच्छ पदार्थ कर दिए बेतासीर बताते क्यों?
चार आश्रम कायम कर दिए दोष शरीर बताते क्यों?
हो पूरी पक्की पंसेरी ला पांसग घाट करै सै।
प्रोपगण्डा नेकीराम सब झूठी डाट करै सै।

इतना ही नहीं मास्टर नेकीराम अपनी रचनाओं में हरियाणवी लोक संस्कृति के प्रति अगाध आस्था व राष्ट्र के प्रति समर्पण की भावना का परिचय देना भी नहीं भूले। जब भारत का पाकिस्तान व चीन के साथ हुए युद्धों के दौरान मास्टर नेकीराम ने अनेक देशभक्ति की रचनाएं रची और उनकी प्रस्तुति दी।

युद्ध के दिनों में जहां भी मास्टर नेकीराम के सांगों का आयोजन होता वे अपने सांग से पहले भारतीय सैनिकों के उत्साहवर्धन हेतू इस रागनी को जरूर गाते थे। इसकी कुछ पंक्तियां इस प्र्रकार है:-

छुट्टी बाकी चिठ्ठी आग्यी एक जवान की।
माता बोल्यी जा बेटा जय हो बलवान की।।

झटपट तैयारी करले बेटा देर लगाइए मतना,
सीना खोलकै लडि़ए गोल़ी पीठ पै खाइए मतना,
जा उल्टा भाग मौर्चे पै मेरा दूध लजाइए मतना,
बाप की तरियां लडि़ए बेटा लोग हंसाइए मतना,
सबनै एक दिन मरना परवा कौन्या जान की।
माता बोल्यी जा बेटा जय हो बलवान की।।

वहीं मास्टर नेकीराम भारत रत्न बाबा भीमराव अम्बेडकर के नारे शिक्षित बनो को साकार करते हुए अपने सांगों के माध्यम से आजीवन शिक्षा की अलख जगाते रहे। उन्होंने अपने सांग सेठ ताराचन्द की एक रागनी में कहा भी है कि:-

लिखे पढ़े बिना कदर नहीं सै पढऩे की तैयारी करले।
कोई अनपढ़ बेटा रहज्या किसे का तडफ़-2 कै मरले।।

उन मात-पिता कै पाप चढै़ जिसनै ना सन्तान पढाई,
सारी दुनिया तान्ने मारै जिन्दगी भर मिलै बुराई,
मरती बरिया गती मिलै ना बस रहज्या लोग हंसाई,
कह नेकीराम तू गुरू पीर तै सीख लिए कविताई,
पढ़ लिखकै विद्वान बणज्या भवसागर तै तरले।
कोई अनपढ़ बेटा रहज्या किसे का तडफ़-2 कै मरले।।

प्रसिद्ध विद्वान श्री रत्न कुमार सांभरिया व डॉ. शिवताज सिंह के अनुसार मास्टर नेकीराम ने अपनी सांग रचनाओं में ठेठ आंचलिक शब्दों का प्रयोग किया है। इनमें अहीरवाटी व जाटोती दोनों बोलियों का पुट है। छन्द व अलंकार की दृष्टि से भी येे रचनाएं बेहतरीन है और इनमें गजब का काव्यानुशासन है। इन रचनाओं में मुहावरों का बहुत ही सुन्दर प्रयोग हुआ है।

मास्टर नेकीराम की सांग मण्डली में उनके सभी शिष्य व कलाकार गायन-वादन व अभिनय कला में सिद्धहस्त थे। इनमें रेवाड़ी के गांव भाड़ावास के नेतराम,खरखड़ी के हुक्म सिंह,बधराना के धर्मबीर, झज्जर बेरी के मातादीन,सोनीपत के रामसिंह,अलवर स्थित बढ़ली की ढ़ाणी के अमर सिंह,बादली के प्रकाश, दिल्ली के देशराज, अलवर के गांव जसाई के हरिसिंह, महेन्द्रगढ़ के गांव खेड़ी तलवाणा के मोहन व सरफू जैसे कुशल नृतक, जैतड़ावास के हरदयाल, बिहारीलाल, खम्बूराम,श्योलाल, दिल्ली के धनीराम,सहारणवास के जग्गन, झज्जर के गांव साल्हावास के बनवारी, धर्मपाल, नफेसिंह, डूम्मा के चन्दगी राम, महेन्द्रगढ़ के कांटीखेड़ी के बाबूलाल, रेवाड़ी के रामेश्वर, रामसिंह जैसे प्रतिभा सम्पन्न साजिन्दे, भाटोठा की ढाणी के हरफनमौला हास्य कलाकार हीरालाल आदि के नाम प्रमुख है। हीरालाल व प्रकाश तो इनकी सांग मण्डली में ऐसे थे जैसे शरीर में सांस।

मास्टर नेकीराम एक अच्छे सांग सम्राट व कवि ही नहीं अपितु एक उदारचेता, दानी, परदुखकातर व लोक कल्याण की भावना से परिपूर्ण सच्चे निष्पक्ष समाज सेवी थे। उन्होंने अपने सांगों के माध्यम से अनेक मन्दिर, कुआ, बावड़ी, धर्मशाला, गौशाला, स्कूल,तालाब आदि के निर्माण सहित अनेक जनहित कार्य करवाए। इसके अतिरिक्त उन्होंने अपने सांगों द्वारा गरीब कन्यायों के विवाह व अनेक बेसहारा लोगों की मदद करके एक मानवता की मिशाल कायम की। अपना सारा जीवन दबंग अस्मिता के साथ व्यतीत करने वाले मास्टर नेकीराम ने 60 वर्षों तक लगातार सांग मंचन करने का रिकार्ड अपने नाम करने के उपरान्त अपनी वृद्धावस्था के कारण सांग मण्डली की बागडोर अपने पुत्र मास्टर राजेन्द्र सिंह को सौंप दी। 10 जून 1996 को मास्टर नेकीराम का देहान्त हो गया।

मास्टर राजेंद्र सिंह:-

मास्टर नेकीराम के पश्चात इनके बेटे मास्टर राजेंद्र सिंह ने सांग कला को अपनी पुश्तैनी परंपरा के रूप में स्वीकारते हुए इसका मंचन शुरू किया। इनका जन्म 1 सितम्बर 1957 को हुआ था। बचपन से ही गायन कला के शौकीन राजेन्द्र सिंह ने अपने पिता से सांग कला को सीखा। सांग में पारंगत होकर इन्होंने अपने दादा मास्टर मूलचंद, पिता मास्टर नेकीराम व बहुझोलरी निवासी प्रसिद्ध सांगी अपने गुरु पंडित हरिराम की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए सांग की लोकप्रियता को जिंदा रखने का बीड़ा उठाया और सांग मंचन शुरू कर दिए। इन्होंने अपने बेजोड़ गायन व सांग की बेहतरीन प्रस्तुति से कम समय में ही एक प्रसिद्ध सांगी होने का गौरव प्राप्त किया। इनके उत्कृष्ट सांग मंचन से प्रभावित होकर इनके समकालीन सभी सांगियों ने इनके सुरीले गायन की मुक्तकंठ से प्रशंसा की। मास्टर राजेन्द्र सिंह अपनी कठोर साधना के बल पर सांग कला के पर्याय बनकर उभरे। इन्होंने अपनी पुश्तैनी परंपरा के चलते हरियाणवी सांगों में जो जान डाली वह कुछ ही सांगियों के सांगों में नजर आती थी। इन्होंने अपने अंतिम समय तक अपनी अद्भुत व जादुई गायन शैली से सांग कला को अपने चर्मोत्कर्ष पर रखा। किस्सा सेठ ताराचन्द, लीलो-चमन, चापसिंह, बीना-बेला, उषा-अनिरुद्ध, पिंगला-भरथरी, धर्मदेवी-नौबाहर, राजा भोज-भानवती, फूल सिंह- नौटंकी आदि इनके चर्चित सांग थे। इनकी सांग मंडली में दिल्ली निवासी मधुरकंठी गायक देशराज मुख्य जनाना भूमिका निभाते थे जबकि माढ़ण के दयाराम, पटौदी के रमेश, नावदी रामपुरा के सोनू, बधराणा के धन सिंह,खरखड़ी के हुक्म सिंह स्त्री अभिनय करते थे। इनके अतिरिक्त पटौदी के चमन व छन्नू, बूढ़पुर के विजय,रेवाड़ी के रामेश्वर व राम सिंह, जैतड़ावास के हास्य कलाकार लालचन्द आदि उच्चकोटि के कलाकार थे। मास्टर राजेन्द्र सिंह की लोकप्रियता का पता कई घटनाओं से चलता है। एक बार राजस्थान के गांव दहमी (बहरोड़) में इनके सांग मंचन को देखकर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने एक पगड़ी भेंट करते हुए इनको एक प्रतिभा सम्पन्न सांगी की संज्ञा दी। मास्टर राजेन्द्र सिंह अपने अंतिम समय तक अपने परिवार की विरासत लोक कला सांग को संरक्षण प्रदान करते रहे। मास्टर राजेन्द्र सिंह 46 वर्ष की अल्पायु में 1 फरवरी 2003 को स्वर्ग सिधार गए। वर्तमान में इनके भतीजे मास्टर परसराम व सहयोगी मास्टर देशराज आज इनकी सांग परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं।

पंडित रामस्वरूप:-

हर की भूमि हरियाणा प्रदेश के लोक साहित्य की परंपरा भी अत्यंत समृद्ध व वैभवशालिनी है यहां पर भजनी सत्संगी सांगी व लेखको के साहित्य का भी अपना एक इतिहास रहा है हमारे हरियाणा में भजन मंडलियों द्वारा गीतों का प्रस्तुतीकरण सांग विद्धा से काफी पुराना है यहां अनेक भजनी व सांगी हुए जिनमें मुख्य प्रसिद्ध संगियों में किशन लाल भाट, बंसी लाल,अली बख्स, बालकराम, अहमदबख्स , पंडित रामलाल खटीक,पण्डित नेतराम, सांग पितामह पंडित दीपचंद ,सरूपचंद, हरदेवा श्यामी,बाजे भगत,पंडित सोहन लाल कुंडल,पंडित लख्मीचंद, पंडित माई चन्द,पंडित मांगेराम, धनपत सिंह, पंडित रतिराम, पंडित सुल्तान सिंह, रामकिशन व्यास, चंद्र लाल बादी भजन व कवियों में पंडित गुनिसुखिराम, पंडित राम प्रसाद पेटवाड, पंडित चंदूलाल ,पंडित बस्तीराम ,पंडित रवि स्वरूप,मास्टर रतिराम, कवि शिरोमणि जगदीश चंद्र, पंडित मुंशीराम, पंडित हरिकेश पटवारी, पंडित भोलाराम,पंडित नंदलाल पाथरवाली, शहीद कवि जाट मेहर सिंह ,आजाद कवि चौधरी मुंशीराम जांडली, पंडित जगन्नाथ समचाना, सादी राम, पंडित महौर सिंह, धोलक राम,देवीराम,हरद्वारी लाल, संत साधु राम उर्फ नारायण गिरी जी महाराज,कृष्ण चन्द नादान,रामशरण अलीपुर खालसा,सांगी पंडित छज्जुराम अलीपुरा(उचाना),ज्ञानीराम अलेवा और बहुत कवि सांगी हुए जिनमें से ज्यादातर शंकर दास जी की प्रणाली से हुए

यहीं पर एक ओर कविराज हुए जिनका नाम पंडित रामस्वरूप जी भारद्वाज , गांव सिटावली सोनीपत है जो बहुत सुप्रसिद्ध कवि हुए

कवि राज पंडित रामस्वरूप जी का जन्म 16 मार्च 1916 को पश्चिमी यमुना नहर के ऊपर बसे गांव सिटावली में साधारण से परिवार पंडित बदलूराम जी के पर हुआ इनकी माता का नाम भागोदेवी व इनके दादा का नाम पंडित जोधाराम था

पंडित बदलूराम जी के घर पहली पत्नी की कोख से दो लड़कियों ने जन्म लिया जिनके नाम बख्तोरी व पतोरी थे, व दूसरी पत्नी के गर्भ से तीन लड़के और दो लड़कियों का जन्म हुआ, सबसे बड़े बेटे का नाम पंडित अमीर सिंह, व पंडित रामस्वरूप व छोटे बेटे पंडित ब्रह्मानंद व बेटी जैयदेई कृष्णा देवी हुई

पंडित रामस्वरूप जी का भी पालन-पोषण अन्य बेटे बेटियों की तरह बड़े ही लाड चाव से हुआ समय के साथ ही पंडित रामस्वरूप जी शिक्षा के लिए जुआं गांव के सरकारी स्कूल में पढ़ने लगे थे वहां पर उन्होंने आठवीं तक की पढ़ाई पूरी की,
जवान अवस्था में ही पंडित रामस्वरूप जी का विवाह खीरजपुर अहीर माजरा के पंडित मुंशी राम जी की लड़की श्रीमती छोटी देवी के साथ संपन्न हुआ
पंडित राम स्वरूप जी के घर पर श्रीमती छोटी देवी के गर्भ से तीन लड़के व दो लड़कियों ने जन्म लिया जिनमें सबसे बड़े बेटे पंडित दयानंद शर्मा,बेटी राममूर्ति देवी ,लक्ष्मी देवी, पंडित राम रतन शर्मा, व पंडित राजेंद्र शर्मा हुए

पंडित रामस्वरूप जी के सहपाठी जुआँ निवासी मास्टर नवल सिंह जी ने हमें बताया कि पंडित रामस्वरूप जी पढ़ने में बहुत ही तेज थे वे हमेशा मेधावी छात्रों में जाने जाते थे पंडित रामस्वरूप जी की आवाज बहुत ही सुरीली थी सुनने वाले उनकी आवाज सुनकर मंत्रमुग्ध हो जाया करते थे

एक दिन सुप्रसिद्ध कवि पंडित लख्मीचंद जी सांग करने के लिए गांव सिटावली आन पधारें तो उनके सागों को देखने के लिए दूर-दूर से लोग आते थे
उन्हीं के सांग को देखने के लिए पंडित रामस्वरूप जी भी चले गए,उनके सांग देखकर पंडित रामस्वरूप जी इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने दादा लख्मीचंद जी को गुरु धारण कर लिया, कविराज पंडित रामस्वरूप जी वह चंदन लाल बजाना निवासी एक ही दिन सिटावली गांव में बड़ के पेड़ के नीचे पंडित लख्मीचंद जी के शिष्य बने थे
जब गुरुदेव श्री लखमी चंद जी ने स्टेज पर गाने को कहा तो कविराज पंडित रामस्वरूप जी ने गुरु वंदना करके गाना शुरू किया तो सुनने वालों की तालियों से आकाश गूंज उठा खुद दादा लखमी चंद जी के नेत्र जल उठे और उनके सिर पर हाथ रखा और गले लगाकर प्यार जताने लगे, ये सभी बातें पंडित टिका राम जी गामडी निवासी ने हमें बताई

पंडित रामस्वरूप जी के सांग बहुत ही लोकप्रिय रहे वे अपने समय के बेजोड़ सांगी रहे,उनकी हर अदा पर लोग झूम उठते थे पंडित मांगेराम चंदन लाल भी उनकी रचनाओं को सरहाया करते रामू व जहूर मीर ने भी बहुत प्रशंसा की है
सन 1945 में दादा लख्मीचंद की मृत्यु का सभी शिष्यो को आघात हुआ पंडित मांगेराम पंडित सुल्तान सिंह पंडित चंदन लाल बजाना व पंडित माई राम को साथ लेकर पंडित रामस्वरूप ने सांगों को आगे सुचारू रूप से चलाया व सभी ने एक साथ एकजुट होकर चारों दिशाओं में सांग किए

पंडित रामस्वरूप जी ने अनेक सांगो का मंचन किया,वे अपने सांगो में नई नई बात सुनाया करते,उनकी इस कलां से प्रभावित होकर लोगों ने उनका नाम ” बिघ्नी ” रख दिया पंडित रामस्वरूप जी के शिष्य लक्ष्मीनारायण सिटावली बताया करते थे की उनका स्वर मीठा व सुरीला था उनके सांगों में सर्व प्रथम शिष्य पंडित लक्ष्मीनारायण, जंगली दास,जगन लाल नैना निवासी, फूल सिंह खेड़ा निवासी,चंदगीराम पिनाना निवासी,रामकिशन रोलद पिनाना निवासी, धन्ना सिंह सनखेड़ा,शेर सिंह जुआं निवासी,सूरजभान सीटावली हुए इन सब ने अपने गुरु का नाम उज्ज्वल किया

पंडित रामस्वरूप जी के सांगो से प्रभावित होकर कंवर सिंह निलोठी निवासी भी उनके शिष्य बन गए, बाद में रामचरण गुमड़ निवासी व रामकिशन पिनाना निवासी, मेहर सिंह पुरखास निवासी जोकि उमेद गढ़ में रहते हैं,जिले सिंह बरॉना निवासी जो कि इकतारे के बादशाह हुए वे साधु रूप में हो गए

पंडित रामस्वरूप जी ने लगभग दस सालों तक सांग किए
लेकिन दुर्भाग्यवश उनका कंठ खराब हो गया अतः अब वे सांग को सुचारू रूप से नहीं चला पाए और उन्होंने सांग करना छोड़ दिया
घर का कामकाज चलाने के लिए पंडित रामस्वरूप जी ने पंडित चिरंजी लाल वकील (जो कि पूर्व स्पीकर हरियाणा सरकार कुलदीप शर्मा के पिता थे )उनके यहां मुंशी के पद पर काम करने लगे
एक समय की बात है कि पंडित रामस्वरूप जी चिरंजीलाल जी के यहां मुंशी के पद पर थे तो एक दिन पंडित जी कुछ लिख रहे थे इतने में बाहर से वकील जी जैसे ही आए तो पंडित रामस्वरूप जी ने वह कागज अपनी जेब में डाल लिया,वकील साहब ने कहा कि कविराज दिखाओ हमें भी कि ऐसा क्या लिख रहे थे जो आप हमसे छुपा रहे हो,तो कविराज ने मना किया इसके बाद वकील साहब ने आग्रह किया कि दिखाओ तो सही ,कविराज ने वकील साहब को पढ़ने के लिए वो कविता दे दी वकील साहब ने पढ़ा तो क्या लिखा था उसमें——

जुलम करै या गवर्नमेंट दे दे पास वकीलां नै
सच पूछो तो भारत देश का कर दिया नाश वकीलां नै
वकील साहब इन लाइनों को पढ़कर एक बार तो बहुत गुस्सा हुए लेकिन सच्चाई कभी छुप नहीं सकती उसके बाद उन्होंने कविराज की बहुत सराहना की और बोले कविराज जी आपने बिल्कुल सच्चाई लिख रखी है

इसके बाद एक दिन पंडित चन्दन लाल बजाना निवासी से उनकी भेंट हुई व उन्होंने सहयोग मांगा उनके गुरु भाई की बात टाल भी कैसे देते व उनको पूरा सहयोग दिया और 2 साल तक फिर से सांग किए इसके बाद पंडित रामस्वरूप जी अस्वस्थ रहने लगे, स्वास्थ्य दिन प्रतिदिन बिगड़ता चला गया आखिर 10 दिसंबर 1976 को भौतिक शरीर को त्याग दिया व उनकी जीवन लीला समाप्त हो गई

पंडित रामस्वरूप जी के शिष्य सूरजभान जी ने अपनी कविता में क्या लिखा—-
श्री रामस्वरूप सिटावली आला ब्रह्म ज्ञान का ज्ञाता था
जिनके हृदय वसी भवानी जो कहा वही हो जाता था
बोल वक्त के तुरंत बना के मन लोगों का हरसाता था
छंद सोरठे भजन रागनी सांगो का निर्माता था
सूरजभान करै नमन गुरु को कवियों के शेर मोड चले। 4

एक और कविता में शिष्य सूरजभान जी ने कैसे क्या लिखा——-

श्री रामस्वरूप जी सिटावली आला गया सतलोक के डेरे में
आवागमन से होया दूर इब ना फंसै चौरासी फेरे में
मौत जडे की दासी सै ना आवै काल के घेरे में
सूरजभान कहै मुफ्ती हो जा हर की माला टेरे में
सतगुरु बिना ना पावै रास्ता परमपिता उस ईश्वर का। 4

पंडित रामस्वरूप जी ने अनेकों भजन ,उपदेशक ,ब्रह्म ज्ञान छंद सोरठे व सांगो की रचनाएं बहुत ही गहराई व सरल भाषा में की है पंडित रामस्वरूप जी के कुछ सांग लुप्त हो गए फिर से कुछ रचनाएं मिली जो इस प्रकार हैं वजन ब्रह्म ज्ञान उपदेशक चमोली

प्रसिद्द सांग-
कृष्ण का भात, नल का जन्म,नरसी भगत, सती मनोरमा,बजरंग दे, नर सुल्तान दे, कृष्ण रुक्मणी, नरसी का भात ,हीर रांझा ,बीजा सोरठ ,सती निहालदे ,कृष्ण रुक्मणी मंगल ,नल का जन्म ,सती सिला दे

महाशय दयाचंद मायना:-

हरियाणा में लोक साहित्य की एक बड़ी परंपरा रही है। महिलाओं द्वारा गाए जाने वाले लोकगीत तो हैं ही, उसके साथ लखमीचंद, मांगेराम, बाजे भगत, धनपत निंदाणा, महाशय छज्जू लाल सिलाणा, मा. नेकीराम लोकगायकी के रूप में हरियाणा में खासे प्रसिद्ध हैं। इसी परम्परा में महाशय दयाचंद मायना एक बहुत अति विशिष्ट नाम हैं। दयाचंद का जन्म रोहतक के मायना गांव में 10 मार्च ,1915 को नान्हू राम तथा जुमिया देवी के घर हुआ। नाममात्र शिक्षा ग्रहण कर वे लोकसाहित्य-सृजन में लग गए। सन् 1941 से 1947 तक फौज में भी रहे। उनकी अनेक रागणियों में फौजी जीवन का चित्रण है। सांकोल निवासी मुन्शी राम इनके गुरु थे। इन्होंने 21 किस्सों और 150 से अधिक रागणियों की रचना की। महाशय दयाचंद अपने वक्त में दिल्ली, मुंबई, हावड़ा, हैदराबाद, हरियाणा में लोकप्रिय थे।
महाशय दयाचंद ने कला के माध्यम से सामाजिक आयामों को छूकर लोक में आदर्शों की स्थापना की है। पूर्णिमा-प्रकाश, नीलम-पुखराज, मायावती-मास्टर, कवि कालिदास, नेताजी सुभाषचन्द्र बोस, ब्रिगेडियर होशियार सिंह, वीर हकीकत राय आदि किस्सों में कवि ने जाति-पांति, शिक्षा, सामाजिक संबंधों, देशप्रेम, सांप्रदायिक सद्भाव, स्त्री शिक्षा आदि उद्देश्यों को सर्वग्राह्य बनाया है। पौराणिक कथाओं को भी नवीन संदर्भों में व्याख्यायित कर समाज को जगाने का प्रयास किया। किस्सों तथा रागणियों के माध्यम से वे गरीब, अस्पृश्य,पीडि़त को उसके अधिकार दिलाने की चेतना से भरपूर दिखाई देते हैं।
लोक साहित्य को पारंपरिक पौराणिक दायरे से बाहर निकालकर दयाचंद ने युगीन समस्याओं को लोक के सामने कलात्मक तरीके से प्रस्तुत किया है। ‘पूर्णिमा-प्रकाश’ किस्से में डीएसपी का लड़का प्रकाश दहेज का प्रलोभन देने वालों को ठुकराकर एक तथाकथित अस्पृश्य लड़की से शादी का प्रस्ताव पिता के समक्ष रखता है। इस किस्से की रागणी ‘पहले आली बात पुराने ख्याल बदलने होंगे, ऊंच-नीच के शब्द पिता फिलहाल बदलने होंगे’ में युगबोध देखा जा सकता है— मजदूरां की ध्याड़ी खा-खा, मोटे-मोटे सेठ होगे/खून गरीबां का पी-पी कै,मोटे-मोटे पेट होगे/ घर-घर के म्हां चौधरी सारे,अफसर और मेट होगे/ धन-माया के लोभी लाला, दया-धर्म तै लेट होगे/ धनवानां की जगह ईब कंगाल बदलणे होंगे।’ किस्से में प्रकाश पूर्णिमा को समझाता है कि हमारी सब समस्याओं की जड़ ऊंच-नीच, जाति-पांति ही है: यो भारत गारत कर डाला, ऊंच-नीच के धंधे नै/बाकायदा हक मिलणा चाहिए पशु और परिंदे नै /हो… ईब हर बंदे नै आजादी होणी चाहिए।
नाममात्र शिक्षा प्राप्त महाशय दयाचंद जी ने सबसे अधिक प्रचार शिक्षा का किया व कई किस्से तो शिक्षा को उद्देश्य बनाकर लिखे । ‘मायावती मास्टर’ तथा ‘कवि कालिदास’ शिक्षा की महत्ता के किस्से हैं। धनी बाप की बेटी होने के बावजूद मायावती की अनपढ़ता के कारण उसकी जोड़ी का वर नहीं मिलता। मायावती की टीस देखी जा सकती है: अनपढ़ माणस नै दुनिया मैं, सब बेकार कहैं सै/अगड़, पड़ौसी, यारे, प्यारे, रिश्तेदार कहैं सै/मनैं अनपढ़, मूढ़ गंवार कहै सैं, न्यू सरमाऊं मैं।
कवि भारत की आर्थिक विषमता का सूक्ष्म-द्रष्टा है। ‘नीलम पुखराज’ किस्सा इस विषमता का जीता-जागता प्रमाण है।
महाशय दयाचंद की रागणियां मजदूर, गरीब, अस्पृश्य, निकृष्ट जीवन जीने को विवश व्यक्ति की जिजीविषा की रागणियां हैं। कवि अर्थव्यवस्था की बारीकियों का भी जानकार प्रतीत होता है। उसे लगता है कि धनिक वर्ग गरीबों की माली हालत का जिम्मेवार है। गरीब तो बस सारी उम्र पिसता ही है : मेहनत मजदूरी का तोड़ा, कुछ तुम अटका द्यो सो रोड़ा/गरीबां का जाथर थोड़ा, कुछ महंगाई का बोझ/ए धन आले लोगो, थारै नहीं दया का खोज।
एक फुटकल रागणी में उन्होंने चोर-जार, नशेड़ी और जुआरी की प्रवृत्ति और उनका समाज पर पडऩे वाले नाशक प्रभाव का चित्रण किया है : चार जणां की लिखूं कहाणी एक कागज के गत्ते पै /चोर जार नशेबाज जुआरी/ खड़े पाप के हत्थे पै। रागणी की चारों कलियों में वे एक-एक को लेकर पर्दाफाश करते हैं। कवि चूंकि फौजी भी रह चुके हैं, इसलिए सन् 1965 तथा 1971 की लड़ाइयों में उन्होंने अनेक रागणियां लिखीं। महाशय दयाचंद एक बेहतरीन देशप्रेमी लोकगायक के रूप में उभरकर सामने आते हैं। ‘नेताजी सुभाष चन्द्र बोस’, ‘वीर हकीकत राय’ तथा ‘ब्रिगेडियर होशियार सिंह’ उनके ऐसे ही किस्से हैं। ‘ब्रिगेडियर होशियार सिंह’ के किस्से की एक कली दर्शनीय है—शेरां की छाती तण्या करै/जब गीदड़ का दिल छण्या करै/बार-बार ना जण्या करै सुत जणने आली मात।
कवि अंध-विश्वास व पाखंडों से भोली-भाली जनता को निकालना चाहते हैं। उनके ‘सरवर-नीर’ किस्से से एक रागणी ऐसा ही बयां करती है : मनैं भगत बोहत से देखे सैं जो काढें भूत बजाकै डोरू/एक आधे की कहता कोन्या, बोहत फिरै सैं इज्जत चोरू/साची सै हीणे की जोरू, सबकी दासी हो सै।
कली की अन्तिम पंक्ति में कवि ने सामाजिक-आर्थिक विषमता में स्त्री की दुर्दशा का मार्मिक अंकन किया है। दयाचंद ने अपनी शैली विकसित की। उनकी रागणियां भाव और कला का बेहतरीन सामंजस्य प्रस्तुत करती हैं। उनकी शृंगारिक रचनाएं भी हैं परंतु उनकी शृंगारिकता में अश्लीलता नहीं है। उनकी रागणी—’पाणी आली पाणी प्यादे, क्यूं ठाकै डोल खड़ी होगी/ के कुएं का नीर सपड़ग्या, क्यूं अनबोल खड़ी होगी ‘ विश्व प्रसिद्ध हो चुकी है। महाशय दयाचंद ने प्रचलित उर्दू तथा अंग्रेजी भाषाओं के शब्दों का बेहतरीन प्रयोग किया है। वे हरियाणवी लोक साहित्य के एक स्तम्भ के रूप में जाने जाएंगे। हरियाणवी जीवन-शैली के चितेरे इस लोक कवि का 20 जनवरी, 1993 में देहांत हो गया।

प. राजेराम संगीताचार्य :-

सुर्यकवि प. लख्मीचंद के ताज को कान्तिमय व सुशोभित करता एक ओर मोती कवि शिरोमणि पं. राजेराम संगीताचार्य का जन्म 01 जनवरी, सन 1950 ई0 (वार-रविवार, तिथि-त्रयोदशी, मास-पोष, शुक्ल पक्ष- बदी, विक्रम-संवत 2006) को गांव- लोहारी जाटू, जिला- भिवानी (हरियाणा) के एक मध्यम वर्गीय ‘गौड़ ब्राह्मण परिवार’ मे हुआ। इनके पिता का नाम पं. तेजराम शर्मा व माता का नाम ज्ञान देवी था। फिर जब पंडित राजेराम कुछ पढने योग्य हुए तो कुछ समय स्कुल मे भेजकर बाद मे उन्हें पशुचारण का कार्य सौंपा गया, परन्तु गीत-संगीत की लालसा उनमे बचपन से ही थी। इसलिए ग्वालों-पाळियों के साथ-साथ घूमते हुए, उनके मुखाश्रित से हुए गीतों की पंक्तियों को गुन-गुनाकर समय यापन करते-रहते थे। उसके बाद 10-12 वर्ष की आयु तक पहुँचते-पहुँचते उन्हें कर्णरस एवं गीत श्रवण की ऐसी ललक लगी कि अपने गाँव और आसपास की तो बात ही क्या, वे कोसों-मीलों दूर जाकर भी सांगी-भजनियों के कर्ण-रस द्वारा उनके कंठित भावों का आनंद को अपने अन्दर समाहित करते रहे। फिर उम्र बढ़ने के साथ-साथ सांग के प्रति उनकी आसक्त भावना मे इस प्रकार वृद्धि हुई कि सांग देखने के लिए बिना बताएं और कभी-कभी लड़-झगड़कर कई-कई दिनों तक घर से गायब रहने लगे।
इन्ही दिनों फिर पंडित राजेराम जी के जीवन मे एक नए अध्याय के अंकुर अंकुरित हुए। सौभाग्य एवं सयोंगवश फिर किशोरायु राजेराम 14 वर्ष की आयु मे सन 1964 मे एक दिन सुबह-सुबह ही बिना बताये घर से सुर्यकवि पंडित लख्मीचंद के परम शिष्य सुप्रसिद्ध सांगी पंडित मांगेराम का सांग सुनने के लिए गाँव-पांणछी, जिला-सोनीपत (हरियाणा) मे ही पहुँच गए, क्यूंकि बचपन से ही गाने-बजाने के शौक के कारण वे पंडित मांगेराम जी के सांगों को सुनने के बड़े ही दीवाने थे।

म्हारे घरक्यां तै होई लड़ाई, चाल्या उठ सबेरी मै,
सन् 64 मै मिल्या पांणछी, मांगेराम दुहफेरी मै,
न्यूं बोल्या तनै ज्ञान सिखाऊ, रहै पार्टी मेरी मै,
तड़कै-परसूं सांग करण नै, चाला खाण्डा-सेहरी मै,
राजेराम सीख मामुली, जिब तै गाणा लिया मनै।।
(सांग:11 ‘कृष्ण-लीला’ अनु.-13)

सोनीपत की तरफ ननेरे तै, एक रेल सवारी जा सै,
जांटी-पाणची म्हारे गुरू की, मोटर-लारी जा सै,
दिल्ली-रोहतक भिवानी तै, हांसी रोड़ लुहारी जा सै,
पटवार मोहल्ला तीन गाल, अड्डे तै न्यारी जा सै,
राजेराम ब्राहम्ण कुल मै, बुझ लिए घर-डेरा ।।
(सांग:5 ‘कंवर निहालदे-नर सुल्तान’ अनु.-29)

इसलिए बचपन से ही गाने-बजाने चाव एवं लगाव के कारण उस समय के सुप्रसिद्द सांगी पंडित मांगेराम जी के प्रति आकर्षित होना स्वाभाविक था। फिर उस दिन पंडित मांगेराम जी ने सांग-मंचन करते हुए उनकी सरस्वतिमयी कंठ-माधुर्य ने उस किशोरायु राजेराम का ऐसा मन मोह लिया, कि वहीँ पे उन्होंने पंडित मांगेराम जी को अपना गुरु धारण करके उसी समय उनके सांग बेड़े मे शामिल हो गए।

मांगेराम पाणछी मै रहै, था गाम सुसाणा,
कहै राजेराम गुरू हामनै, बीस के साल मै मान्या,
सराहना सुणकै नै छंद की, खटक लागी बेड़े-बंद की,
लख्मीचंद की प्रणाली का, इम्तिहान हो गया ।।
(सांग:3 ‘चमन ऋषि-सुकन्या’ अनु.-24)

फिर पंडित राजेराम एक-दो दिन के बाद वहीँ से गुरु मांगेराम के साथ प्रथम बार उनके सांगी-बेड़े मे शामिल होकर गाँव खाण्डा-सेहरी मे सांग मंचन के लिए चले गए। उस दिन के बाद फिर गुरु मांगेराम ने अपने शिष्य बालक राजेराम की उम्र के लिहाज से उनकी जबरदस्त स्मरण शक्ति एंव सांगीत कला की मजबूत पकड़ को देखते हुए, उन्होंने अपनी गुरु कृपा से बहुत जल्द ही इस साहित्यिक कला मे निपुण कर दिया।

मानसिंह तै बुझ लिये, औरत सूं हरियाणे आली,
लख्मीचंद तै बुझ लिये, गाणे और बजाणे आली,
मांगेराम तै बुझ लिये, गंगा जी में नहाणे आली,
भिवानी जिला तसील बुवाणी, लुहारी सै गाम मेरा,
कवियां मै संगीताचार्य, यो साथी राजेराम मेरा,
मै राजा की राजकुमारी, सुकन्या सै नाम मेरा,
कन्या शुद्ध शरीर सूं, च्यवन ऋषि की गैल, ब्याही भृंगु खानदान मै ।।
(सांग:3 ‘चमन ऋषि-सुकन्या’ अनु.-14)

लख्मीचंद स्याणे माणस, गलती मै आणिये ना सै,
मांगेराम गुरू के चेले, बिना गाणिये ना सै,
ब्राहम्ण जात वेद के ज्ञाता, मांग खाणिये ना सै,
तू कहरी डाकू-चोर, किसे की चीज ठाणिये ना सै,
राजेराम रात नै ठहरा, ओं म्हारा घर-डेरा हे।।
(सांग:3 ‘चमन ऋषि-सुकन्या’ अनु.-15)

फिर अपने गुरु मांगेराम की इस बहुत ही सहजता एवं कोमल हर्दयता को देखकर अपनी गीत-संगीत की प्यास को बुझाने हेतु वे अपने गुरु मांगेराम जी के साथ ही रहने लगे। उसके बाद उन्होंने 6 महीने तक पूरी निष्ठां एवं श्रद्धा से गुरु की सेवा करके गायन-कला मे प्रवीण होकर ही अपनी इस सतत साधना और संगीत की आत्मीय पिपासा को पूरा किया।

राजेराम उम्र का बाला, मिलग्या गुरू पाणछी आला,
ताला दिया ज्ञान का खोल, किया मन का दूर अंधेरा सै,
ज्ञान की लेरया चाबी री ।।
(सांग:-15 ‘पिंगला-भरथरी’ अनु.-5)

मानसिंह तै बुझ लिए, साधू बाणा कठिन होगा,
लख्मीचंद तै बुझ लिए, सुर मै गाणा कठिन होगा,
मांगेराम तै बुझ लिए, मांगके खाणा कठिन होगा,
हाथ के म्हा झोली-चिमटा, कांधै ऊपर काम्बल काला,
पन्मेशर का भजन करिए, एक तुलसी की लेके माला,
तेरा इतिहास लिखै, राजेराम लुहारी आला,
इसी कविताई है ।।
(सांग:-18 ‘बाबा-छोटूनाथ’ अनु.-7)

इस प्रकार फिर गुरु मांगेराम के सत्संग से शिष्य राजेराम भारद्वाज अपनी संगीत, गायन, वादन और अभिनय कला मे बहुत जल्द ही पारंगत हो गए। इस प्रकार पं0 राजेराम लगभग 6 महीने तक गुरु मांगेराम के संगीत-बेड़े में रहे। उसके बाद प्रथम बार इन्होंने भजन पार्टी सन् 1977-78 ई0 से 1980-81 तक लगभग 4-5 वर्ष रखी।

कर्जा उधार लिया, देणा मूल ब्याज करके,
देणै कै बख्त रोवै, पिछ्तावा नाजाज करके,
राजेराम लुहारी आला, गावै अपणा साज करके,
रोवै टक्कर मार जणू, साहुकार जा लिकड़ दिवाले।।
(सांग: 7 ‘सत्यवान-सावित्री’ अनु.-28)

स्याणे माणस के करया करै, गलती आले काम,
मुर्ख माणस होया करै, सै दुनिया मै बदनाम,
बुरे काम तै हो बदनामी, जाणै देश-तमाम,
राजेराम ब्राहम्ण कुल मै, खास लुहारी गाम,
विरुद्ध पार्टी साज ओपरा, उडै़ गाया ना करूं ।।
(सांग:-15 ‘पिंगला-भरथरी’ अनु.-14)

फिर वे किसी कारणवश अपने भजन-पार्टी को छोड़ गए, परन्तु साहित्य रचना और गायन कार्य शुरू रखा, जिसकों उन्होंने इस कार्य को आज तक विराम नहीं दिया।

*व्यक्तित्व*
पंडित राजेराम भारद्वाज एक बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं। उनके एक घनिष्ठ प्रेमी एवं कला के कायल डॉ॰ शिवचरण शर्मा (हरियाणवी साहित्य की सर्वप्रथम प्रकाशित ‘हरियाणा के कविसुर्य लख्मीचंद’ पुस्तक के संपादक श्री के.सी. शर्मा- आई.ऐ.एस. ऑफिसर के अनुज व प्रोफेसर-सिरसा यूनिवर्सिटी) जो गाँव लोहारी जाटू, भिवानी (हरियाणा) निवासी है, जिनको स्वयं सन 1991 मे हरियाणा लोक साहित्य पर पी.एच.डी. करने का गौरव प्राप्त हैं। उन्होंने पंडित राजेराम के संबंध मे कितना ही उचित कहा है कि जो पंडित राजेराम को एक साधारण कवि या सांगी समझते है, वे अल्पबुद्धि जीव है। वे केवल एक सशक्त कवि और सांगी ही नहीं, अपितु एक बहुत ही साधारण व्यक्तित्व के साथ-साथ एक अदभुत साहित्य एवं संगीत कला के, इस हरियाणवी लोक-साहित्य मे बहुत बड़े सहयोगी भी है, जो इस आधुनिक युग के नवकवियों के लिए एक जीवन्त मिशाल है। पंडित राजेराम गोरे रंग के साथ-साथ एक लम्बे-ऊँचे कद के धनी है और दूसरी तरफ इनकी वेशभूषा धोती-कुर्ता व साफा (तुर्हे वाला खंडका) प्रतिभा में चार चांद लगा देती है। इनका सादा जीवन व रहन-सहन एक अमूल्य आभूषण हैं, जो इतने प्रतिभावान होते हुए भी साधुवाद की तरह जरा-सा भी अहम भाव नहीं है। उनका यह साधुवाद चरित्र हम उनकी निम्नलिखित कुछ पंक्तियों मे देख सकते है।

मानसिंह तै बुझ लिए, मै इन्सान किसा सूं,
लख्मीचंद तै बुझ लिए, मै चोर लुटेरा ना सूं,
मांगेराम गुरु कै धोरै, रोज पांणछी जा सूं,
दुनिया त्यागी होया रुखाला, मै हस्तिनापुर का सूं,
राजेराम राम की माला, रटता शाम सवेरी।।
(सांग:2 ‘श्री गंगामाई’ अनु.-26)

लख्मीचंद तै बूझ लिए, ठिक ठिकाणे आला सूं,
मांगेराम गुरू का चेला, ना कम गाणे आला सूं,
ठाढ़े का दुश्मन हीणे का, साथ निभाणे आला सूं,
गैरा के दुख दूर करणियां, बात बताणे आला सूं,
राजेराम प्रेम का बासी, नहीं तनै देख्या भाला।।
(सांग:5 ‘कंवर निहालदे-नर सुल्तान’ अनु.-34)

साहित्यिक विशेषता:-
पंडित राजेराम जी ने बहुत कम पढ़े-लिखे होते हुए भी अपने साहित्यिक जीवन में हरियाणवी लोक संस्कृति पर जोर दिया, जिनका सीधा सम्बन्ध धरातल से जुड़े तथ्यों से है अर्थात दुसरे शब्दों मे कहे तो ये एक जमीन से जुड़े साहित्यकार है, जिन्होंने अन्य कवियों के हटकर कल्पना से ज्यादा यथार्थ पर जोर दिया, क्यूंकि इन्होने अपने सर्व-स्वभाव अनुसार इनका एक मात्र उद्देश्य दिखावा, छल-प्रपंचो और राजनीती से दूर नित्यकर्म से भक्ति भावना द्वारा काव्य रचना करके दिनचर्या व्यतीत रहना उचित समझा, यानिकी सादा जीवन उच्च विचार।
“मसि कागद छुयो नहीं, कलम गही नहिं हाथ” – संत कबीरदास जैसे निरक्षर कवियों की परम्परा को आगे बढ़ाने वाले पंडित राजेराम जी को इनके वास्तविक अवतार माने जा सकते है, क्यूंकि इन्होने कबीर की साधना पद्दतियो का अनुसरण किया है। इनके जीवन के अनेक अनछुये पहलू कबीर की सहज साधना और दास्य भावना को सांगो का आधार बनाया है। इनके अध्यातम के चश्मे इतने सस्ते भी नहीं बन पाये कि कहीं मर्यादा का उल्लंघन हो और न ही इनका काव्य कोरी नारेबाजी है, बल्कि आम ग्रामवासी की दिल तक पहुंचकर प्रसंशा बटोरने मे सक्ष्म है। इनके मन मे समाजिक व्यवस्था के प्रति नकारात्मक हलचल नहीं हुई। इनके सांग मौलिक और समाजवादी है। समाज के सम्मान को कहीं भी ठेस नहीं लगने दी, परन्तु दादा गुरु पंडित लख्मीचंद व गुरु मांगेराम की कविताई का प्रभाव होने कारण, भोगा हुआ यथार्थ चित्रित कर दिया है।
साहित्य संगीत और कला के बिना पशु तुल्य जीवन बिताने से परहेज करने वाले पंडित राजेराम जी जीवन के प्रत्येक क्षण को गायन के साथ भोगते रहे और यही उनके जीवन का यही परम आनंद रहा है। सांगियो की परम्परा को गतिशीलता प्रदान करने मे इनका बहुत बड़ा योगदान माना जा सकता है। इन्होने वह समय भी देखा है कि ‘न सिर पे छत और न भोजन की उचित व्यवस्था’। इसके उपरान्त छोटी सी रजाई के लिए भी बड़े से बड़ा गुनाह करने मे नहीं हिचकिचाने वाले लोग उनके सम्पर्क मे आये है, परन्तु उनका चरित्र साधू–स्वभाव का ही रहा है। ये शांत चित से साहित्य की सेवा करते रहे और यही चाल आज भी मंद नहीं पड़ी है। इन्होने भ्रष्टाचार-शोषण, अनीति-अन्याय, परिवार-समाज, धर्म–दर्शन, योग-वियोग, अमीरी-गरीबी, नर-नारी, इतिहास- राजनीति, पाप-पुण्य, खेत-खलिहान, सराय-बावड़ी, हाट-बजार आदि, अनेक विषयो के मोती इन सांगो मे पिरोये है। गुरु-भक्ति मे अटूट श्रद्धा देखते ही बनती है क्यूंकि इन्होने गुरु से ज्ञान, ज्ञान से भक्ति और भक्ति से मोक्ष को संभव माना है। सात सुरों की देवी माँ भवानी की विशेष अनुकम्पा इन पर बनी रही। इसका प्रमाण इनके प्रत्येक सांग मे चित्रित हुआ है।
इनके सांगो मे जागरूकता, आशा-निराशा, आस्था, दायित्व-बोध, दया-ममता-न्याय, मर्यादा, यथार्थ-बोध, जीवन-मूल्य, जीव-जगत, आत्मा-परमात्मा, संक्रमित-संस्कृति, शास्त्रार्थ, वास्तविक-काल्पनिक, जन्म-विवाह-मृत्यु, राजा-प्रजा आदि किसी भी पहलू को अछूता नहीं छोड़ा।
इनका साहित्य समाज का एक दर्पण भी माना जाता है, जिसमे प्रतिबिम्बित लोक-जीवन के रंग-बिरंगे चित्रों के सम्पूर्ण चित्रण का समावेश है। इनके लोक-साहित्य मे सामाजिक प्राणी के जन्म, शैशव, यौवन, विवाह, सयोंग-वियोग, सामाजिक रीति-रिवाज, खान-पान, रिश्ते-नाते, कृषि कार्य, नृत्य-गायन, तीज-त्यौहार, गीत-संगीत, मान-मर्यादा, यज्ञ-हवन, छल-कपट, चोरी-डकैती, रिश्वतखोरी, जुआबाजी, प्रेम-इर्ष्या, धर्म-अधर्म, सुख-दुःख, हांस-विलाप, विरह-मिलन, निंदा-स्तुति, दया-दान, पाप-पुण्य, राग-वैराग, तप-त्याग एवं अंतिम संस्कार आदि जीवन मे जन्म से मृत्यु पर्यंत घटने वाली समस्त प्रक्रियायों के सभी पहलुओं का यथार्थ चित्रण है। इनके हरियाणवी लोक-साहित्य की अपनी मिठास कुछ अलग ही है, क्यूंकि इन्होने लोकसंस्कृति की चासनी से निकलकर हरियाणवी लोकसाहित्य की रचना की है। इनका साहित्य लोक-संस्कृति का ऐसा अदभुत आईना है- जिसमे जीवन के विविध आयाम मुंह बोलते-से प्रतीत होते है। इनके साहित्य मे रचा-बसा हरियाणवी लोक-साहित्य आज भी अपनी उपस्थिति से ह्रदय को झंकृत कर देता है- क्यूंकि इन्होने अपने हरियाणवी लोक-साहित्य मे हमारे लोक-जीवन एवं संस्कृति का ऐसा कोई आयाम नहीं, जो इनके हरियाणवी लोक-साहित्य मे उद्घाटित न हुआ हो। इन्होने अपने काव्य मे सांस्कृतिक, धार्मिक, गुरु भक्ति, घर-गृहस्थ उपदेशक भजन, ब्रह्मज्ञान, साध-संगत, सर्व-रस प्रधान, अलंकृत, छन्दयुक्त व सौन्दर्य से ओतप्रोत सहित संगीत के वाद्यान्त्रो व सांस्कृतिक नृत्यों से सम्बंधित भी विशेष रचनाये की, जो आज की युवा पीढ़ी के लिए सांगीत व नृत शिक्षा के तौर पर एक शिक्षक के रूप मे काम करती है। उन्होंने अपने साहित्यिक जीवन में भिन्न-भिन्न प्रकार की अनेको रचनाये लिखी, जिसके कारण कुछ विद्वान् जन व जन साधारण और लोकसाहित्य से सम्बंधित बड़े-बड़े अधिकारी भी उन्हें ‘सगीताचार्य’ के नाम से पुकारते है। अब उन्ही विशेष रचनाओं मे से साक्ष्य के रूप मे उनकी एक संगीतज्ञ रचना निम्नलिखित रूप मे पेश है-

सभी राग चालकै गा दूंगी, राजा के दरबार म्य,
गाणे और बजाणे आली नाचूं सरे बजार म्य ।। टेक ।।

मालकोष-हिण्डोला भैरू, श्रीराग दीपक मल्हार,
छ:हूँ राग याद मेरै, गन्धर्वा की ये नीति चार,
सात सुरां मै सा-रे-गा-मा-पा-धा-निसा और गंधार,
भैरवी बैरारी-सिंधू, माधवी व बंगालिया,
तोड़ी-टोडी गोरी, खम्भावती गुण-कालिया,
रामकली-ललित पटमंजरी, देश थालियां,
नैट-कैनरा और बिलावल, गाऊ देश किदार म्य।।

धन्नाश्री-मालवी, असांवरी बसंत-माल,
देरा-कालि कुंभ-पहाड़ी, कश्मीरी का बुझै हाल,
भोपाली-मल्हारी तिलंका, गुजरी बतावै ताल,
हेमचंद-कल्याण यमन, श्यामकला श्याम की,
मोहनी-सोहनी चांदनी, अमीर सौरट नाम की,
जोगिमा विभास-शंकरा, शिवरंजनी शिवधाम की,
भीम-प्लासी पंचम-पिंगला, लुटी प्रितम प्यार म्य।।

रणसिंहा वायलिन-तमूरा, बिगूल और गिटार,
सारंगी हांरमूनियम, शहनाई विणा-सितार,
इकतारा-दूताराबीण, बासंली मै सुर की मार,
तबला तथा नगाड़ा-ढोलक, पखावज व मृदंग,
डमरू-ढप खड़ताल, ताशा और मंजीरा चंग,
शंक-तुर्री घड़रावल, बजावण का जाणु ढंग,
पत्थर का पाणी पिंघलके, मिलकै गाऊं साज के तार म्य।।

तीस किस्म के नाच बताये, झाँक-झावरा झुमरझूम,
सोहन-कपूरी गिधा-भंगड़ा, डांडिया व भरतनाटूम,
जाणू लय-सूरताल दादरा, ठुमरी-ठप्पा ढुमर-ढूम,
सुंदर शान मधुर बाणी, अवस्था किशोर की,
शरीफ की शराफत, नजर पिछाणू मै चोर की,
राजेराम लुहारी आला, या पतंग बिना डोर की,
बावला जमाना होज्या, नांचूगी जिब कर सोला सिगांर म्य।।
(सांग:14 ‘चापसिंह-सोमवती’ अनु.-29)

प. राजेराम संगीताचार्य जी का कहना है कि जीवन स्वयं एक कहानी है और हर घटना व बात में एक कहानी छिपी रहती है। सिर्फ आवश्यकता है तो अपनी बुद्धि से उसे खोजने व शब्दों में बांधने की। अतः उनका मानना है कि साहित्य लेखन और गायन कोई आसान कार्य नहीं है।
अतः उन्होंने अपनी स्मरण शक्ति व आत्मज्ञान के बल पर इस साहित्य संग्रह के संकलित 16 सांगो, 3 संतवाणीयों व अपनी काव्य विविधा सहित ब्रह्मज्ञान, गंधर्व नीति, ब्राह्मण नीति, रजपूत नीति, साहित्यिक नीति, राजनीति, कूटनीति, नारी सशक्तिकरण, नारी सम्मान व नारी चरित्र विशेष सहित हजारों रचनाये की, जो अपने आप में एक मिशाल है और यह साहित्य संग्रह उन्हें हरियाणवी साहित्य जगत के कवियों मे सम्मान दिलाने के लिए काफी है।

मानसिंह तै बुझ लिये, औरत सूं हरियाणे आली,
लख्मीचंद तै बुझ लिये, गाणे और बजाणे आली,
मांगेराम तै बुझ लिये, गंगा जी में नहाणे आली,
भिवानी जिला तसील बुवाणी, लुहारी सै गाम मेरा,
कवियां मै संगीताचार्य, यो साथी राजेराम मेरा,
मै राजा की राजकुमारी, सुकन्या सै नाम मेरा,
कन्या शुद्ध शरीर सूं, च्यवन ऋषि की गैल, ब्याही भृंगु खानदान मै ।।
(सांग:3 ‘चमन ऋषि-सुकन्या’ अनु.-14)

इनके लोक-साहित्य का प्रमुख आधार हरियाणवी लोक-जीवन है, क्यूंकि सामूहिकता, रागात्मकता, लयात्मकता एवं रसात्मकता लोक-जीवन के वे अंग है, जिनकी नीवं पर उसकी समूची लोक-संस्कृति टिकी हुई है। इनकी साहित्यिक कथा चाहे इतिहास या समाज या पुराण की हो – भलाई हित से जुडी हुई है। कवि ने कथा के बीच मे जीवन के अन्तरंग क्षणों को प्रस्तुत कर दिया है। यही विशेषता इनको अमरता प्रदान करेगी। मेरी कामना है कि इनका साहित्य लोकगायको व जन साधारण तक अवश्य पहुंचे, ताकि समस्तजन इनके ज्ञान से परिचित हो।
प. राजेराम संगीताचार्य अपने साहित्यिक जीवन में अनेकों सांगो, संतवाणीयों व काव्य-विविधा द्वारा असंख्य रचनाये लिखकर, हरियाणवी साहित्य जगत में अपनी एक पहचान बनाने की क्षमता रखते है, जिनका वर्गीकरण इस प्रकार है-

अ.क्र. पौराणिक/ ऐतिहासिक धार्मिक/ आध्यात्मिक सामाजिक/ समस्यामूलक राष्ट्रीय व सामाजिक चेतना
1 गंगामाई 11. नारद-विषयमोहनी 16. सारंगापरी 19. महात्मा बुद्ध
2 चमन ऋषि-सुकन्या 12. गोपीचन्द-भरथरी 17. चापसिंह-सोमवती 20. काव्य विविधा
3 सत्यवान-सावित्री 13. बाबा जगन्नाथ-संतवाणी 18. पिंगला-भरथरी
4 राजा दुष्यंत-शकुन्तला 14. बाबा छोटूनाथ-संतवाणी
5 नल-दमयन्ती 15. मीरगिरी महाराज-संतवाणी
6 कृष्ण जन्म
7 कृष्ण लीला
8 रुक्मणि मंगला
9 सरवर-नीर
10 निहालदे-सुल्तान

साहित्य विशेष या सम्मान/पुरस्कार:- आकाशवाणी केंद्र-रोहतक (हरियाणा) मे सन 2015-2016 के आसपास प. राजेराम जी का एक सांग “हर-हर गंगे” या “देवी गंगामाई” की उस समय सबसे लम्बी समय-अवधि ‘3.5 घंटे’ तक की रिकॉर्डिंग के साथ दो भागों मे प्रसारित हुआ, जो उस समय तक हरियाणा के किसी भी आकाशवाणी केंद्र व किसी भी लोककवि क इकलौता सर्वप्रथम सबसे लम्बी रिकॉर्डिंग के प्रसारित किया गया, जो आकाशवाणी केंद्र के डायरेक्टर ‘श्री कैलाशचंद वर्मा-संगीतज्ञ’ की उपस्थिति/प्रस्तुति मे हुआ था। इस सांग के बेड़े-बंध या गायक कलाकार कुलदीप व आस्था वर्मा (रोहतक आकाशवाणी डायरेक्टर श्री कैलाशचंद वर्मा की सुपुत्री) थी, जिसकी रिकॉर्डिंग का जिक्र संगीताचार्य जी ने अपनी इन निम्नलिखित पंक्तियों मे भी किया है –

दीपचंद, हरदेवा, बाजे, उनका भी घर-गाम देख्या,
फेर चल्या जा सिरसा-जांटी, धोरै जमना धाम देख्या,
लख्मीचंद नौटंकी, मीराबाई का यो बणाया सांग,
मांगेराम नै शिवजी-गौरा, ब्याही का बणाया सांग,
राजेराम नै भाई, इब गंगेमाई का बणाया सांग,
पास किया सरकार नै, कविता निराली, कैसी चक्र मै डाली,
खूब रची करतार नै, या दुनिया मतवाली, कैसी चक्र मै डाली ।। टेक ।।

इससे पहले भी प. राजेराम संगीताचार्य जी को आकाशवाणी केंद्र-रोहतक मे दो बार ‘हरियाणवी कविता पाठ’ के रूप मे आमंत्रित किया गया और अनुबंध-पत्र भी प्रदान किया गया तथा भेंटवार्ता के रूप मे कई बार साक्षात्कार लिया गया। आकाशवाणी केंद्र रोहतक द्वारा आज भी उनकी कला के सम्मान के तौर पर उन्हें मुख्य सरकारी अनुदान/सुविधाये प्रदान की जा रही है, जिसमें पेंशन/भत्ता, फ्री बस सेवा इत्यादि शामिल है। वैसे तो कई बार उन्हें पंजीकृत संस्थाओं द्वारा भी पुरस्कृत किया गया जिसमे पंजीकृत संस्था ‘म्हारी संस्कृति-म्हारा स्वाभिमान’ द्वारा उन्हें ‘हरियाणवी संस्कृत रत्न’ से भी सम्मानित किया गया।

ललित कुमार बवानी खेड़ा :-

ललित कुमार का जन्म 6 जनवरी, 1995 ई0 (वार-शुक्रवार, तिथि-छठी, मास-पोष, शुक्ल पक्ष- सुदी, नक्षत्र-पूर्वभाद्रपदा, राशि-धनु, योग-व्यतापता, विक्रम-संवत 2051) को गांव व तह.- बवानी खेड़ा, जिला- भिवानी (हरियाणा) के एक मध्यम वर्गीय ‘लौर-गुर्जर परिवार’ मे हुआ। इनके पिता का नाम श्री हवासिंह व माता का नाम सुनहेरी देवी था, जो एक एकड़ जमीन के मालिक थे और इसी भूमि पर कृषि करके अपने परिवार का भरण-पोषण करते थे। ये दो भाई थे- जिनमे बड़े का नाम श्री हवासिंह व छोटे का नाम श्री छत्रपाल। फिर ललित कुमार 20 वर्ष की उम्र में गांव व तह. हांसी- जिला हिसार में श्रीमती सुमन देवी के साथ वैवाहिक बंधन मे बंधे। इनकी शैक्षिक योग्यता बारहवी पास तक ही रही, परन्तु गीत-संगीत की लालसा उनमे बचपन से ही थी, क्यूंकि इनके दादा श्री नारायण सिंह धार्मिक प्रवृति के थे, जो गाँव के छोटे-बड़े सामान्य उत्सव में वे मनोरंन के तौर पे गाना-बजाना भी करते थे और सांग विधा के बहुत ही शौक़ीन थे। वे ज्यादातर हरियाणा के शेक्सपियर सुर्यकवि प. लख्मीचंद व कवि शिरोमणि मांगेराम के सांगो में बहुत ही रूचि रखते थे, जिसके कारण उनको इन दोनों महान कवियों के सांग लगभग कंठस्थ थे, जो सांग उस समय में प्रचलित थे। उनके मुखाश्रित से हुए गीतों की पंक्तियों को सुनकर होनहार कवि ललित कुमार गुन-गुनाकर अपना समय यापन करते-रहते थे। उसके बाद 10-12 वर्ष की आयु तक पहुँचते-पहुँचते उन्हें कर्णरस एवं गीत श्रवण की ऐसी ललक लगी कि अपने गाँव और आसपास की तो बात ही क्या, वे कोसों-मीलों दूर जाकर भी सांगी-भजनियों के कर्ण-रस द्वारा उनके कंठित भावों का आनंद को अपने अन्दर समाहित करते रहे। फिर उम्र बढ़ने के साथ-साथ सांग के प्रति उनकी आसक्त भावना मे इस प्रकार वृद्धि हुई कि सांग व रागनी प्रोग्राम देखने के लिए बिना बताएं और झूठ बोलकर पूरा-पूरा दिन घर से गायब रहने लगे। इस प्रकार सांग से लालायित उनका कुछ जीवन अपने जन्मभूमि के लगाव मे ही रहा। इन्ही दिनों फिर ललित कुमार के जीवन मे पुराना अध्याय ख़त्म होने के साथ-साथ एक नऐ अध्याय के अंकुर अंकुरित हुए क्यूंकि इस समय इनके दादा नारायण सिंह का स्वर्गवास हो गया था और उनके सबसे प्रिय पौत्र बालक ललित कुमार के सिर से उनका साया उठ गया था, जिसके कारण वह शास्त्रीय ज्ञान व संगीत लालसा में काफी दोनों तक इधर-उधर भटकता रहा। फिर सौभाग्य एवं सयोंगवश किशोरायु ललित कुमार की अल्पायु मे ही उन्ही के गाँवों में सुप्रसिद्ध गायक व शास्त्रीय ज्ञाता श्री जगदीश तंवर से भेंट हुई, जो गुरु चन्द्रनाथ के शिष्य है, जो इनके दादा गुरु भभुलनाथ के शिष्य है, इस तरह इनकी शुरू से ही नाथो की प्रणाली रही है। फिर उसके बाद तो बालक ललित कुमार वैदिक ज्ञान के लिए लालायित होकर बिना बताये ही घर से श्री जगदीश जी के सत्संग सुनने के लिए पूरा-पूरा दिन उनके पास रहने लगे, क्यूंकि बचपन से ही गाने-बजाने के शौक के कारण वे श्री जगदीश जी के सत्संगो को सुनने के बड़े ही दीवाने थे। इसलिए बचपन से ही गाने-बजाने चाव एवं लगाव के कारण उस समय के सुप्रसिद्ध सत्संगी जगदीश जी के प्रति आकर्षित होना स्वाभाविक था। फिर एक दिन श्री जगदीश तंवर जी ने सत्संग करते हुए उनकी सरस्वतिमयी कंठ-माधुर्य ने उस किशोरायु ललित का ऐसा मन मोह लिया, कि वहीँ पे उन्होंने श्री जगदीश तंवर जी को अपना गुरु धारण करके हर रोज उनकी सत्संग मंडली आनंद उठाने लगे। फिर तो बालक ललित कुमार लगातार गुरु जगदीश के सानिध्य में रहने लगे और उनकी पौराणिक ज्ञान वर्षा में भीगकर उनके सत्संग का आनंद उठाने लगे। उसके बाद तो फिर गुरु जगदीश तंवर ने अपने शिष्य बालक ललित की उम्र के लिहाज से उनकी जबरदस्त स्मरण शक्ति एंव वैदिक रूचि के कारण आत्मीय ज्ञान को देखते हुए उन्होंने अपनी गुरु कृपा से बहुत जल्द ही पौराणिक ज्ञान में पारंगत कर दिया और बालक ललित ने फिर गुरु के आशीर्वाद से अपने आत्मीय ज्ञान से फिर साहित्यिक कला मे निपुणता प्राप्त कर ली। इस तरह अपने गुरु जगदीश की इस बहुत ही सहजता एवं कोमल हर्दयता को देखकर अपनी गीत-संगीत व ज्ञान पिपासा को बुझाने हेतु, वे अपने गुरु जगदीश जी के साथ ही अधिकतम समय व्यतीत करने लगे। उसके बाद उन्होंने कई महीनो तक पूरी निष्ठां एवं श्रद्धा से गुरु की सेवा करके अत्यधिक शास्त्रीय ज्ञान अर्जित करके अपनी इस सतत साधना और संगीत की आत्मीय पिपासा को पूरा किया। इस प्रकार फिर गुरु जगदीश के सत्संग व उनके सिर्फ आशीर्वाद से ही शिष्य ललित कुमार अपनी लेखन कला मे बहुत जल्द ही पारंगत हो गए। उसके बाद प्रथम बार इन्होंने सन 2009 ई0 अपनी 9वीं क्लास से छोटी-मोटी रचनाओं को लिखना शुरू कर दिया, जिसकों उन्होंने इस कार्य को आज तक विराम नहीं दिया। इस प्रकार उन्होंने सर्वप्रथम अपनी सम्पूर्ण व शुद्ध रचना सन 2010 ई. 10वीं में लिखी- जो निम्नलिखित में इस प्रकार है।

बिजली कैसे चमके लागै, रत्ना के म्हा जड़ी हुई,
चन्द्रमा सी श्यान हूर की, फुर्सत के म्हा घड़ी हुई।। टेक ।।

घड़दी सूरत, प्यारी मूरत, चंदा पुर्णमासी का,
पड़ै नूर, भरपूर हूर, योवन सोला राशि का,
रंगरूप, सूरज की घूप, इस सोने की अठमासी का,
यो लागै लाणा, मैला बाणा, भेष बणारी दासी का,
यो चेहरा तेरा उदासी का, बिन मोती माला लड़ी हुई।।

या जबर जवानी जोबन की, कोन्या झूठ कती परी,
अग्निकुंड सा रूप तेरा, तूं दक्ष घरा सती परी,
तूं दासी बणकै करैं गुजारा, बणै कीचक तेरा पति परी,
के ब्रह्मा की ब्राह्मणी, के कामदेव की रती परी,
तू शिवजी की पार्वती परी, कैलाश छोड़ आ खड़ी हुई।।

यां कंचन काया चार दिन की, फेर के बितैगी तेरे पै,
कमर के ऊपर चोटी काली, जणू विषियर नाचै लहरे पै,
सिंध-उपसिन्ध ज्यूँ कटकै मरज्या, तेरे तिलोमना से चेहरे पै,
महराणी का दर्जा देकै, मैं राखूं तनै बसेरे पै,
रहै 105 तेरे पहरे पै, क्यूँ दासी बणकै पड़ी हुई।।

कांची कली नादान उम्र, योवन सतरा-अठारा सै,
तेरी दासी-बांदी टहल करैंगी, लग्या मृगा कैसा लारा सै,
कणि-मणि और मोहर-असर्फ़ी, बरतण नै धन सारा सै,
कहै ललित बुवाणी आळा, तेरा गुर्जर गैल गुजारा सै,
जड़ै स्वर्ग सा नजारा सै, फेर क्यूँ जिद्द पै तूं अड़ी हुई।।

प. हरिकेश पटवारी :-

पं हरिकेश पटवारी का जन्म 7अगस्त 1898 को गांव धनौरी, तहसील नरवाना, जिला जींद (हरियाणा) में हुआ, जो कि एक रेडियो सिंगर थे। धनौरी गांव दिल्ली-पटियाला राजमार्ग पर दाता सिंह वाला से 5 किलोमीटर की दुरी पर है। इनके पिता का नाम उमाशंकर व माता का नाम बसन्ती देवी था। उस समय धनौरी पटियाला रियासत में पड़ता था। पं हरिकेश ने अपनी प्राथमिक शिक्षा गांव धनौरी में और माध्यमिक शिक्षा खन्ना पंजाब से प्राप्त की। इसके बाद कई दिनों तक वो खन्ना में रहे। फिर उन्होंने लोरी बस ली, जो आसपास के मार्गो पर चलती थी। इसके बाद बस को बेच कर आपने राजस्व विभाग में पटवारी के पद पर कार्य किया। पंडित जी हाजिर-जवाबी के लिए भी प्रसिद्ध थे, आपने कई भाषाओ में लेखन का कार्य भी किया।आजादी के बाद आपने हरियाणा के सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक परिवेश को बहुत विश्वसनीय ढंग से अपनी रचनाये प्रस्तुत की। रचनाओं में व्यक्त सच्चाई और सहज कला के कारण रागनियां लोकप्रिय हुईं। आपने लेखन काल में कई रचनाये लिखी, जिसमे से निम्नलिखित चार पुस्तके देहाती बुक स्टोर नरवाना द्वारा प्रकाशित हुई-

1 वैराग्य रत्नमाला 2 आजादी की झलक 3 हरिकेश पुष्पांजलि 4 प्रश्नोतरी

अप्रकाशित रचनाये:- 1 सत्यवान-सावित्री किस्सा 2 जानी चोर 3 हरफूल जाट 4 ऊखा-अनिरुद्ध

पं हरिकेश पटवारी रेडियो सिंगर थे, सन् 1952 में भारत के प्रथम प्रधानमन्त्री पं जवाहरलाल नेहरू के नरवाना आगमन के समय भी पं हरिकेश पटवारी ने अपनी रचनाये प्रस्तुत की । पं नेहरू ने उनकी बहुत प्रशंसा की और उन्हें बहुत सराहा गया। उसके बाद नेहरु जी ने पं हरिकेश पटवारी को दिल्ली आने का न्योता दिया। अतः18 फरवरी 1954 को पं हरिकेश पटवारी इस संसार से चल बसे।

चौ. रामशरण अलीपुरा :-

चौधरी रामशरण का जन्म 08 मार्च, 1963 को गांव अलीपुर खालसा, तहसील घरौंडा, जिला करनाल में हुआ। इनका जन्म रोड़ जाति में गांव के किसान चौधरी आभेराम के घर हुआ। पांच भाई-बहनो मे रामशरण जी अपने पिता कि सबसे छोटी संतान थे। चौधरी रामशरण के दादा नेतराम के पास ढाई-सौ बीघे जमीन थी। चैधरी रामशरण का स्वर्गवास 18 दिसंबर, 2011 को गांव में ही हुआ। रामशरण जी परिवारिक परिस्थितयों के कारण आठवीं कक्षा तक ही शिक्षित हो पाये। चौदह वर्ष की आयु मे स्कूल छोडने के बाद खेती का कार्य सौपे जाने से कवि ने हल चलाकर खेती करना प्रारंभ किया। पाठशाला के समय से ही सगींत से विशेष लगाव होने के कारण रामशरण जी ने खेती के साथ-साथ गायकी भी जारी रखी। आवाज ऊंची, दमदार और सुरीली होने के कारण गांव व आस-पास के लोग उनके द्वारा गायी रागनियों को बडे ध्यान से सुनते और हौंसला बढाते। धीरे-धीरे उन्हे बहुत सी रागनियां याद हो गई जिनको वे महफिल मे गाने लगे। समय अंतराल के बाद उनकी मुलाकात गांव के ही मंदिर मे रहने वाले सन्यासी श्री सतनारायण से हुई। सतनारायण जी अखण्ड ब्रह्मचारी, चार वेद, छह शास्त्र, अठारह पुराणो के ज्ञाता थे, जिसके कारण उन्हे उच्च कोटी का आध्यात्मिक ज्ञान था। रामशरण जी ने सतनारायण को गुरू धारण कर ज्ञान प्राप्त किया। गायकी के लिए सुर-लयदारी और कविता के लिए छंद रचना का ज्ञान उन्होेंने इधर-उधर सांग मंडलियो मे बैठकर अपनी मेहनत से सीखा। अपनी कविताओं में कवि रामशरण ने भी गुरू को बहुत महत्व दिया है, जैसे सांग ‘‘श्रवण कुमार पितृभक्त” में लिखा है-

‘‘कह रामशरण मनै शिक्षा पाई, सतगुरू जी के डेरे पै”

सांग ‘‘राजा वीर विक्रमाजीत” में लिखा है-

‘‘कह रामशरण गुरू की दया तै, मनै हो गया ज्ञान भतेरा।”

रामशरण जी ने अपनी खुद की गायकी के बारे मेें लिखा है-

‘‘न्यूवें मुँह ना बा राखे, जाणु गावण की लहदारी।”

रामशरण जी को सुर-लयदारी का ज्ञान भी उच्च कोटी का था, जिसका प्रमाण उनकी गायकी को सुनने वाले लोग है जो आज भी यह कहते है की उनकी गायकी का कोई तोड़ नही था। रामशरण जी कच्चे साज के साथ-साथ पक्के साज पर भी बहुत बढ़िया गाते थे। रामशरण जी अपने खेत मे काम करते-करते रागनी बना देते थे और कई बार स्टेज पर भी तत्काल रागनी बना कर गाते थे, उसी वजह से उन्होेेंने सांग ‘‘शकुन्तला दुष्यंत‘‘ मे लिखा है –

‘‘मनै घड़णा हो सै तुरन्त काफिया, सही मौका टेम बताणा हो।”

रामशरण जी अपने साथ मण्डली भी रखते जो स्टेज गायकी मे उनके साथ रहती थी। उन्होंने खुद कुरूक्षे़त्र रेडियो स्टेशन में बहुत बार प्रस्तुती दी, उनके बनाये हुए कई सांग रोहतक रेडियो स्टेशन में रिकोर्ड है। सन् 2007-08 में ‘साहित्य अकादमी पंचकुला’ ने उनकी पुस्तक ‘‘धर्म के इतिहास” को भी प्रकाशित कराया, जिसमे चार सांग है। रामशरण द्धारा रचित सांगों की कुल सख्ंया 27 और कुल रागनियों की संख्या 1150 है। उनके द्वारा रचित सांगों के नाम निम्न है-

1. शिवजी का ब्याह 15. रामायण
2. मीराबाई 16. जैमल फता
3. हकीकत राय 17. अम्ब राजा
4. श्रवण कुमार पितृभक्त 18. नर सुल्तान
5. अजीतसिंह राजबाला 19. ज्यानी चोर
6. बीजा सोरठ 20. हीरामल जमाल
7. राजा भोज शरणदे 21. पद्मावत
8. अजामिल ब्राह्म्ण 22. पूर्ण भक्त
9. राजा हरिश्चन्द्र 23. कृष्ण सुदामा
10. महाभारत कथा 24. कृष्ण लीला
11. प्रहलाद् भक्त 25. राजा वीर विक्रमाजीत
12. शकुन्तला दुष्यंत 26. नल दमयन्ती
13. गोपीचंद 27. राजा उतानपात
14. चन्द्रकिरण 28. फुटकर फुहार

अगर रामशरण जी के सांगों का विश्लेषण करें तो उनकी कविताओ से सामाजिक ज्ञान झलकता है, वे हर बात को बडे़ ही उचित ढगं से छंदों में लिख देते थे। वे अश्लीलता से कोसो दुर रहते थे। उदाहरण के लिए पूर्ण भक्त सांग में श्रृगांर रस को उचित ढंग से गाया है।
‘‘पूर्ण भक्त” सांग के माध्यम से उन्होंने सामाजिक बुराईयां जैसे चोरी, जारी, जुआ, मदिरापान पर भी कटाक्ष किया है, जैसे-
चोरी जारी जुआ जामनी, मदिरा पान बुरा हो सै
पर निंदा और बुरी संगति, तन का अभिमान बुरा हो सै
क्रोध जलेवा दुखदाई, मलीन शैतान बुरा हो सै
जो बुआ बहाण मौसी नै तकले, उसका ध्यान बुरा हो सै।

‘‘कृष्ण सुदामा” सांग में निस्वार्थ मित्रता को दर्शाया है और बताया है कि मनुष्य को मुसिबत के समय में अपने दुख दर्द अपनी रिश्तेदारी, दोस्त, सगे को बताना चाहिये जैसे-

‘‘भीड़ पड़ी मै यार प्यार मै, सब नै जाणा चाहिये पिया
रिश्ते नाते सगे-सोई तै, मरम बताणा चाहिये पिया
साची बात पै अटल खड़या रह, परण निभाणा चाहिये पिया।”

‘‘राजा हरिश्चन्द्र” सांग में धर्म परिक्षा को दर्शाया है, उन्होंने बताया कि मुसिबत के समय जगत में कोई साथी नही मिलता, मनुष्य को अकेले ही अपनी मुसिबतो का सामना करना पड़ता है जैसे-

‘‘ना कोये विपत पड़ी मै प्यारा, यू सै मतलब का जग सारा
प्यारा बोल ना रहया – ह्रदय छोल रहया – तन डोल रहया –
कुकर खड़ी हो पूत नै ठा कै।”

‘‘राजा भोज शरणदे” सांग में समाज को बताया है कि बुरे व्यक्ति की बराबरी अच्छे मनुष्य नही कर सकते, इसलिए बुरे व्यक्ति की बराबरी नही करनी चाहिये, जैसे-

‘‘आपा मार भला जग हो सै, बुरे की बराबरी कद लग हो सै
दखे चोर जार तो ठग हो सै – जो झूठी करै सफाई –
साच का पाछै लागै बेरा।”

‘‘जैमल फता” सांग में पारिवारिक रहन – सहन को दर्शाया है, कि परिवार में कभी भी भाईयो को आपस में नही लड़ना चाहिये, क्यूंकि परिवार कुणबे की आपसी लड़ाई में सदैव नुकसान होता है, जैसे-

‘‘घर कुणबे की राड़ मै तो, किसे ना किसे का गाला हो।”

‘‘ज्यानी चोर” सांग में बताया है कि पत्नी, भाई, बेटा बेटी, रिश्तेदारी, गोती, नाती कैसे होने चाहिये ताकि परिवार का विकास हो, जैसे-

‘‘चोरी बरगा माल नही, जै सरकार ना हो तै
बीर जैसा तो वजीर नही, जै बदकार ना हो तै
भाई भी पराये हो ज्यां, ऐतबार ना हो तै
बेटा बेटी नाम डुबो दे, समझदार ना हो तै
प्यार बिना के रिश्तेदारी, गोती नाती रै।”

‘‘राजा वीर विक्रमाजीत” सांग में राजा वीर विक्रमाजीत रत्नकौर के पेट मे रहने वाले सांप को अपने पुन्य के बल पर खत्म करके नया जीवन प्रदान करते है। इस सांग में उन्होंने समाज को बताया है कि नारी की सदैव कद्र करनी चाहिये उनका निरादर नही करना चाहिये, जैसे-

‘‘बीर की सदा कद्र करो, बीर गुण की खान हो सै
नारी रत्न कही जिस कै, सुर मुनि विद्वान हो सै
सदा शारदा दुर्गे लक्ष्मी, सतरूपा किसा ध्यान हो सै
कह रामशरण नारी जग माता, जिनै धर्म का ज्ञान हो सै
नारी का अपमान बुरा हो, ना नाश करण की देरी।”

‘‘हकीकत राय‘‘ सांग में उस समय मुसलमानो द्वारा हिन्दुओं पर किये गये अत्याचारों को दर्शाया है कि कैसे अन्य धर्मो को बलात्पूर्वक मुस्लिम धर्म में मिलाया जाता था और मुस्लिम धर्म ना अपनाने पर मार दिया जाता था, जैसे बताया है –
‘‘हिन्दू तै मुसलमान बणे, घणे मुश्किल तै दिन काटे थे
साधन की लाचारी थी, म्हारे न्यूं भी लते पाटे थे
रोटी और लगोंटी ना थी, सब क्यांहे के घाटे थे
समय समय का खेल बताया, खून चलू भर चाटे थे
हिन्दू न्यारें छाटे थे, जिनकै गात जनेऊ सिर चोटी।”

‘‘अम्ब राजा‘‘ सांग मे सरवर नीर बतलाते है कि हमने किस प्रकार कष्ट सह कर जिंदगी यहां तक व्यतीत की और कवि द्वारा समाज को भी यही शिक्षा दि गई है कि मनुष्य को दुख विपता मे कभी हार नही माननी चाहिए, बल्कि डट कर सामना करना चाहिए, जैसे-

‘‘माँग माँग कै मगँता हो ज्या, पड़ पड़ सवार बणै सै
रगड़ा खा खा लोहा ठोठ भी, खाण्डे की धार बणै सै
सोने का कुन्दन हो जल कै, फैर जेवर तैयार बणै सै
मीठा बोल कै जग नै जीतै जो, उसका प्यार बणै सै
रै आई ना घड़ी सुख की बैरण – इसी किस्मत सै म्हारी।”

‘‘अजीत सिंह राजबाला‘‘ सांग मे अजीत सिंह के पिता के पास जांगीर ना रहने पर अजीत सिंह का ससुर राजबाला को अजीत सिंह के पास भेजने से मना कर देता है। ऐसे ही समाज मे भी घटनाएं घटित हो रही है जिससे रिश्ते नातो को बहुत ठेस पहुॅचती है जैसे कवि ने लिखा है –

‘‘धीरज धर्म और मित्र नारी, बखत पडे मै परखे जा
हीरे मोती लाल दबे धरे, नही घड़े मै परखे जा
लोह मोम का बेरा लागै, जिब काम अड़े मै परखे जा
गुण अवगुण भी परखे जा, जिब लगे किनारे मर कै।”

‘‘महाभारत” सांग मे जब कौरव पाण्डवो मे फुट हो जाती है तो परिवार विनाश की तरफ बढने लगता है। यह बात समाज पर भी लागू होती है कि जहा भाईयों मे फुट पड़ जाती है, वहां विनाश ही होता है, जैसे बताया है कि:-

‘‘वें घर ना कदे बस्या करै, जड़ै आपस मै भाईयां की फूट
विभीषण कै लात मारदी, रावण की गई लंका टूट
मनै नजर फैर कै देख लई, न्यूएं होरी जग मै चारों खूंट
कथा वार्ता सुणी भतेरी, भर बैठी इब विष की घूटं।”

‘‘नल दमयन्ती” सांग मे राजा नल भाई पुष्गर के साथ जुआ खेलते हुए सब कुछ हार जाते है, इस सांग में समाज में जुए जैसी बुराई पर कटाक्ष किया है जैसे-

‘‘ना कोई भाई तै बैर लगाईयो
ना जुए की बाजी लाईयो
काम चलाईयो थोडे मै- ना जिन्दगी कटै तोड़े मै
इस काया के झोडे मै- करड़ाई कुकर फहगी।”

प. जगन्नाथ समचाना :-
पं जगन्नाथ का जन्म 24 जुलाई, सन् 1939 को गांव समचाना, जिला रोहतक हरियाणा में हुआ । यह तीजों के त्योहार का दिन था । जिस समय तीज मनाई जा रही थी, औरतें पींघ झूल रही थी और गीत गा रही थी । एक तरह से जब इन्होने इस धरा पर अपने नन्हे कदम रखे तो प्रकृति का पूरा वातावरण संगीतमय था । अतः यही कारण है कि इनका संगीत से लगाव बचपन से ही है।
पं जगन्नाथ की प्रथम शिक्षा तो उनके अपने घर से ही प्राप्त हुई क्योंकि इनके पूर्वज सभी विद्वान पंडित थे । संस्कृत की विद्या भी इन्हें घर से प्राप्त हुई । इनके पास रहने, इनके सानिध्य मात्र से ही संस्कृत भाषा का काफी अनुभव हो चुका था। केवल चार साल की उम्र में इन्होने, अपने पिताश्री की अनुपस्थिति में एक शादी समारोह में फेरे करवा दिये थे। उस समय स्कूली शिक्षा में इनकी रूचि नहीं थी, क्योंकि इनके ही घर में पाठशाला थी और इनके दादा जी विद्यार्थियों को पढ़ाया करते थे।
पं जगन्नाथ को छह साल की उम्र में परिजनों ने गांव के ही प्राथमिक स्कूल में प्रारम्भिक शिक्षा हेतु भेजा, जिस प्रथम गुरू ने इनका नाम रजिस्टर में लिखा था, वो इनके ही गांव के पंडित रामभगत जी थे । ये उनको ही अपना सत्गुरू मान कर उनके चरणों में रहने लगे। जब स्कूल में शनिवार के दिन सांस्कृतिक कार्यक्रम होता तो गुरू जी इन्हें एक भजन सुनाने का अवसर जरूर देते । एक दिन उस समय के सिंचाई मंत्री चौ. रणबीर सिंह, जो कि स्वतन्त्राता सेनानी भी थे, वह इनके स्कूल में आए । उनके आगमन पर इन्होने एक स्वागत् गान खुद ही बनाया और सुना दिया । उस दिन के बाद सदैव गुरू जी ने उन्हें उत्साहित किया, बस यहीं से लिखने का क्रम शुरू हुआ।
पं जगन्नाथ पंडित लखमी चंद की कविताई से ही ज्यादा प्रभावित हुआ थे। इन्होने अपनी कविता कम गाई, परन्तु पंडित लखमीचन्द जी के बनाए हुए सभी सांग, भजनों को तरीके एवं मर्यादा से घड़वे-बैंजों पर गाया है ।
पं. जगन्नाथ द्वारा उनकी पहली रचना चौ. रणबीर सिंह, सिंचाई मंत्री, पंजाब के स्वागत् में लिखी व गाई थी ।
पं जगन्नाथ कभी भी रागनियों की तरफ प्रवृत नहीं हुए और न ही कभी किसी प्रतियोगिता में भाग लिया । इन्होने तो सभी धार्मिक एवं ऐतिहासिक रचनाओं का सृजन व गायन किया है ।
पं जगन्नाथ के कथन में रचनाओं का पूरा शब्द कर्म संभालना मुश्किल है, जो बचपन में लिखा-वह जवानी में गुम हो गया और जो जवानी में लिखा वो बुढ़ापे में गुम हो गया । वैसे इस समय मेरे पास स्वरचित करीब सोलह इतिहास व आठ सौ भजन, उपदेश हाजिर हैं ।
पं जगन्नाथ के वर्तमान परिदृश्य में हरियाणवी संगीत काफी उन्नति पर है । जिसको आप बार-बार रागनी नाम से सम्बोधित कर रहे हैं – वह रागनी नहीं है, यह केवल हरियाणवी संगीत है, जिसको पहले समय में अश्लील समझते थे, वही किस्से वही कविता, जिसको आज सब सुनना पसन्द करते हैं ।
पं जगन्नाथ के कथनानुसार घड़ा-बैंजू तो मेरे जन्म से पहले भी प्रचलन में थे, परन्तु इनका प्रयोग करने वालों को अश्लील समझा जाता था । क्योंकि ज्यादातर आवारा किस्म के लोग खेतों में कोल्हूवों में इन्हें बजाया करते थे, गांव बस्ती में इस साज़ को बजाने की मनाही होती थी । मैंने सन् 1970 में घड़ा-बैंजू को अपनाया और काफी विरोध् के बावजूद भी मैंने इस साज़ को नहीं छोड़ा । कुछ नये प्रयोग और धार्मिक, ऐतिहासिक रचनाओं का इन वाद्यों के साथ तालमेल, इनकी जन स्वीकृति का कारण बना और आहिस्ता-आहिस्ता सारे समाज ने ही इस साज को स्वीकार कर लिया, यहां तक कि आकाशवाणी दिल्ली व दिल्ली दूरदर्शन पर हरियाणा की तरफ से मैंने घड़े-बैंजू पर सबसे पहले गाना गाया, जिसे दूरदर्शन ने भी सहर्ष स्वीकार किया । बार-बार मेरे कार्यक्रम दिल्ली दूरदर्शन से घड़े-बैंजू पर आते रहे, फिर जनता ने भी स्वीकार कर लिये ।
पं जगन्नाथ को हरियाणा सरकार ने अनेक बार सम्मानित किया। चौ. भूपेन्द्र सिंह हुड्डा सहित पूर्व मुख्यमंत्रियों, चौ. बंशीलाल, चौ. देवीलाल, चौ. ओमप्रकाश चौटाला के कार्यकाल में एंव श्री बलराम जाखड़, चौ अजय चौटाला, श्री दीपेन्द्र हुड्डा के कर कमलों से भी इन्हें सम्मानित होने का अवसर मिला है । एशियाड 82 के समय एक एल. आई.जी. फलैट अशोक विहार दिल्ली में, इनको कार्यस्थल डी.डी.ए. ने सम्मान स्वरूप दिया । श्री साहब वर्मा, तत्कालीन मुख्यमंत्री दिल्ली सरकार ने अपने कार्यकाल में दिल्ली सरकार की तरफ से तीन बार सम्मानित किया । श्री गुलाब सिंह सहरावत, उपायुक्त रोहतक ने एक किलो सौ ग्राम चांदी के डोगे से सम्मानित किया । गांव धराडू, भिवानी की पंचायत ने सोने का तमगा दे कर सम्मानित किया । गांव बापौड़ा, भिवानी की पंचायत ने 5100 रूपये व सोने की अंगूठी से दो बार सम्मानित किया । इसके अतिरिक्त भी असंख्य बार सम्मान मिले हैं। उल्लेखनीय बात यह भी है कि इनको अपने चाहने वालों और संगीत के कार्यक्रमों से बहुत सम्मान व स्नेह मिला है । अक्सर जहां भी किसी संगीत के कार्यक्रम में ये उपस्थित होते तो – पहले इनका सम्मान करते, उसके बाद कार्यक्रम शुरू करते।

मानव मूल्यों के अपसरण को अपने इस शब्द कर्म में उन्होंने करीब चार दशक पहले ही महसूस करा दिया था जो वर्तमान परिदृश्य में भी प्रासंगिक है…

बेशर्मी छाग्यी सारे कै, बिगड़या सबका दीन
आज मैं किस पै, करूं रै यकिन…/ टेक

झुठे तेरे बाट तराजू झुठी खोल्यी तनै दुकान
झुठा सौदा बेचण लाग्या, नहीं असल का नाम निशान
झुठा बोल्लै कमती तोल्लै, आये गयां के काटै कान
झुठा लेखा जोखा देख्या, झुठी देख्यी तेरी बही
झुठे तू पकवान बणावै, झुठे बेच्चै दुध दही
झुठा लेवा झुठा देवा, और बता के कसर रही
खान पान पहरान बदलगे बुद्धि हुई मलीन… /1

झुठी यारी, यार भी झुठे, झुठा करते कार व्यवहार
झुठे रिश्ते नाते रहग्ये, लोग दिखावा रहग्या प्यार
बीर मर्द का, मर्द बीर नै, कोए से नै ना ऐतबार
माया के नशे म्हं चूर फिरते हैं अभिमानी बोहत
बुगले आला दां राख्खैं सै, इसे देख्ये ज्ञानी बोहत
लेण देण नै कुछ ना धोरै, इसे देख्ये दानी बोहत
बड़े-बड़या ने मोह ले यैं तिन्नूं जर जोरू और जमीन…/2

दीखणे म्हं धर्म धारी, काम है चंडाल का
सिंह रूपी वस्त्र धारे, काम नहीं शाल का
पाखण्ड का सहारा लिया, हुकम कल्लु काल का
पलटया है जमाना, होया धर्म कर्म का बिल्कुल अंत
बीज तै बदल गये, कयाहें म्हं ना रहया तंत
वेद-पाठी पंडत कोन्या, टोहे तै ना मिलते संत
कायर-छत्री, निर्धन-बणिया, ब्राहमण विद्या हीन…/3

सत् पुरूषां की मर होग्यी, यो किसा जमाना आग्या रै
वेद व्यास जी कहया करैं थे, वो हे रकाना आग्या रै
गुरू रामभगत की कृपा तै, मन्नैं कुछ कुछ गाणा आग्या रै
बालकपण म्हं मौज उड़ाई, खाये खेल्ले बोहत घणे
गाया और बजाया, देख्खे मेले ठेले बोहत घणे
झुठे यार भतेरे देख्खे, झुठे चेल्ले बोहत घणे
जगन्नाथ ये सच्चे चेल्ले, हों सै दो या तीन…/4

प. गुणी सुखीराम :-

लोक कवि हरिकेश पटवारी जी के प्रदादा गुरू आशुलोकमहाकवि गुणी सुखीराम जी का जन्म विक्रमी संवत1914को सावन शुक्ल तीज को गांव स्याणा जनपद महेन्द्रगढ़ में पं लेखराम के घर हुआ।उनका स्वर्गवास विक्रमी संवत् १९६२को सावन शुक्ल तीज को ऋषि उद्दालक की तपोभूमि स्याणा जनपद महेन्द्रगढ़ में हुआ।
सुखीराम जी के१५नामी शिष्य हुए।सबसे कम उम्र के शिष्य रहे नाजर (कलकत्ता) रहते थे।जो मुसलमान थे फिर भी गुणी जी की तस्वीर की पूजा करते थे। नाजर ने फिल्मी दुनिया में संगीत की नई-नई धुन बनाने में माहिर हुए।
गुणी जी के सभी शिष्य आशुकवि हुए हैं।वहीं पौत्र शिष्यों में भी ज़्यादातर आशुकवि हुए हैं।प्रपौत्र शिष्यों में भी ज़्यादातर आशुकवि हैं जिनमें हरिकेश पटवारी जी का नाम सुना होगा।
गुणी जी के सड़पौत्र शिष्यों में आज भी परमानन्द जी गांव झाडोली(महेन्द्रगढ़)व बालमुकुंद जी गांव-जाखोद जनपद-झुन्झनु(राजस्थान)आशुकवि हैं।

:: साहित्यिक पृष्ठभूमि @ लेखक द्वारा व्यक्त उद्गार ::

एक सामान्य मनुष्य और साहित्यकार में सिर्फ इतना फर्क होता है कि दोनों ही भरे हुए बादलों की तरह होते हैं। परन्तु सामान्य मनुष्य बिना बरसे आगे चलता जाता है, लेकिन साहित्यकार या लेखक खुद को हल्का कर देता है अर्थात् जो अनुभव करता है उसे शब्दों में व्यक्त करता है। जिस समाज और युग में वह जी रहा है, वह समाज और युग उसके व्यक्तित्व को एक विषेष सांचे में ढालता है। भारतीय संस्कृति में रचना और रचनाकार को पृथक नहीं देखा गया है। किसी भी रचना के अंतर्गत को समझने के लिए यह नितांत आवश्यक है कि हम रचनाकार को अच्छी तरह जाने और उसके परिवेश से परिचित हो, तभी हम किसी कृति को पूर्ण रूप से समझ सकेंगे।

संभावित प्रतिक्रिया:- मैं ये चाहूंगा, कि जो भी साहित्य और संस्कृति से जुड़कर अपनी सभ्य्ता को बचाने का प्रयास करेगा तो उसके लिए लोकसाहित्य और लोक संस्कृति में अनेक संभावनाएं विद्यमान हैं। इसीलिए मेरी यही कामना हैं कि जो संभावित योगदान है, उसे युवावर्ग देने में न हिचकिचाए।

सांस्कृतिक सन्देश:- आज काल के गर्त मे तीव्र रूप से समा रही हरियाणवी संस्कृति व साहित्य के संरक्षण हेतु इस युवा पीढ़ी को चेतनाम्रत का पान करना जरुरी है क्यूंकि मनुष्य की अमूल्य निधि उसकी संस्कृति है और संस्कृति के संरक्षण में लोकसाहित्य अत्यंत सहायक हैं। संस्कृति और साहित्य एक ऐसा पर्यावरण है, जिसमें रहकर व्यक्ति एक सामाजिक प्राणी बनता है और प्राकृतिक पर्यावरण को अपने अनुकूल बनाने की क्षमता अर्जित करता है।
संस्कृति का सामान्य अर्थ, संस्कृति सीखे हुए व्यवहारों की सम्पूर्णता है, लेकिन संस्कृति की अवधारणा इतनी विस्तृत है कि उसे एक वाक्य में परिभाषित करना सम्भव नहीं है। वास्तव में मानव द्वारा अप्रभावित प्राकृतिक शक्तियों को छोड़कर जितनी भी मानवीय परिस्थितियाँ हमें चारों ओर से प्रभावित करती हैं, उन सभी की सम्पूर्णता को हम संस्कृति कहते हैं और इस प्रकार संस्कृति के इस घेरे का नाम ही ‘सांस्कृतिक पर्यावरण’ है। दूसरे शब्दों में, ‘संस्कृति एक व्यवस्था है, जिसमें हम जीवन के प्रतिमानों, व्यवहार के तरीकों, अनेकानेक भौतिक एवं अभौतिक प्रतीकों, परम्पराओं, विचारों, सामाजिक मूल्यों, मानवीय क्रियाओं और आविष्कारों को शामिल करते हैं।’ सर्वप्रथम वायु पुराण में ‘धर्म’, ‘अर्थ’, ‘काम’, तथा ‘मोक्ष’ विषयक मानवीय घटनाओं को ‘संस्कृति’ के अन्तर्गत समाहित किया गया। इसका तात्पर्य यह हुआ कि मानव जीवन के दिन प्रतिदिन के आचार विचार, जीवन शैली तथा कार्य व्यवहार ही संस्कृति कहलाती है। मानव समाज के धार्मिक, दार्शनिक, कलात्मक, नीतिगत विषयक कार्य कलापों, परम्परागत प्रथाओं, खानपान, संस्कार इत्यादि के समन्वय को संस्कृति कहा जाता है। अनेक विद्वानों ने संस्कार के परिवर्तित रूप को ही संस्कृति स्वीकार किया है और मेरा मानना है कि संस्कार और साहित्य परस्पर संस्कृति दो पहलू है।

नोट :- उपरोक्तानुसार प्रस्तुत सम्पूर्ण लेख में यथासंभव सतर्कता बरती गयी है, तथापि इसमें त्रुटीयों की संभावना है, अगर इन संदर्भो में आपके पास कुछ जानकारी है तो कृपया हमारे साथ साँझा करे ताकि निकट भविष्य में इन त्रुटियों को यथासंभव दूर किया जा सके।

– संदीप कौशिक,
गाँव – लोहारी जाटू, भिवानी, हरियाणा (भारत)
सम्पर्क सूत्र : +91-8818000892, 7096100892.

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Author
संकलनकर्ता :- संदीप शर्मा ( जाटू लोहारी, बवानी खेड़ा, भिवानी-हरियाणा ) सम्पर्क न.:- +91-8818000892 / 7096100892 रचनाकार - लोककवि पंडित राजेराम भारद्वाज संगीताचार्य जो सूर्यकवि श्री पंडित लख्मीचंद जी प्रणाली…

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