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संघर्ष की दास्तां का उत्सव

एक छोटे से कस्बे की दिप्ती के उपर मानो दु:ख का पहाड़ टूट परा हो. हर एक पल उदास सी रहती और उसे हमेशा एक डर सा बना रहता था की दशवीं तक की पढाई कैसे करेगी? जब वो दशवीं कक्षा मे थी तभी अचानक सिर पे से बाप का साया उठ गया. मुसिबत ने चारों तरफ से उसे घेर लिया. एक तो पापा का असमायिक निधन और उपर से इतनी आर्थिक तंगहाली मानो उसके सपनों के पंख मे कील की तरह चुभ रही थी. पर वो बेचारी कर भी क्या सकती थी? हालात के आगे वेबस और लाचार वो लड़की अपने पढाई लिखाई के सपने को चकनाचूर होते खुद अपने आँखों से देख रही थी.

दिल्ली के एक छोटे से कस्बे कंझावला इलाके मे दिप्ति अपने माता पिता के साथ किराए के मकान मे रहती थी. उसके पिता रामलाल आटो चलाते और उसकी माँ उमा दूसरों के घर झारू पोछा और खाना बनाने का काम करती थी.
दिप्ति कंझावले के ही सरकारी स्कूल मे पढ़ति और पढ़ने मे भी होशियार थी. उसके साथ पढने वाले बच्चे के माता पिता कोइ सरकारी सेवा मे तो किसी का अपना छोटा मोटा बिजनेस या कोइ धंधा पानी? जब इन बच्चों के मुहँ से दिप्ती ये सब बातें सुनती की सरकारी सेवा मे क्या सम्मान है सैलरी भी बढ़ियां जिंदगी एकदम मजे ठाठ मे गुजरती है. कोइ बच्चा कहता की मेरे पापा का खुद का बिजनेस है और ठीक ठाक कमा लेतें हैं. इन सब बातों को सुनकर दिप्ती सरकारी सेवा के बारे में सोचती और उन्हीं सपनो में खोई रहती. घर आकर अपने पिता से बाते करती तो उसके पिता उसे प्रोत्साहित करते और समझाते की आजकल के जमाने मे पढा लिखा होना बहुत जरूरी है वरना जिदंगी बड़ी तकलिफ़देह हो जाती है. कहिं चपरासी बनने के लिए भी जाओ तो दसवीं पास जरूर मांगते हैं.

रामलाल खुद आठवीं तक ही पढ़ा लिखा था और पढाई के महत्व को समझता था. लेकिन उमा सिर्फ दूसरी तक पढी थी तो दिप्ती के बातों पर इतना ध्यान नहीं देती थी. जब भी दिप्ती नौकरी की तैयारी की बात अपनी माँ उमा से कहती थी तो वो खिजकर गुस्से से लाल पिली हो जाती थी. गुस्से मे दिप्ती से कहती थी की ज्यादा पढ़ लिखकर तुम्हें कौन सा कल्कटर बनना है? शादी के बाद चूल्हे चौके ही तो संभालने हैं? देख नहीं रही बड़ि मुशकिल से इतनी महँगाइ से घर चलता है उपर से घर का किराया ज़रा सी देर हो की मकान मालिक तुरंत कमरे खाली की धमकी दे डालता है? माँ की बात सुनकर मानो दिप्ति मन ही मन रो पज़ति और हमेशा चिंता मे डूबी रहती की आगे पढाई कैसे करेगी? कहिं उसके घरवाले दसवीं के बाद ही उसकी शादी न कर दे?
सशुराल के लोग उसे पढ़ने देगें की नहीं? इस तरह के उलझे सवालों मे उसका मन खोया रहता लेकिन फिर भी दिप्ती मे पढ़ने की ललक खूब थी. वह पूरे मन लगाकार अपने दशवीं के परीक्षा की तैयारी करती और उसके बाद प्रतियोगिता परीक्षा मे बैठने के सपने देखा करती थी.

ईधर रामलाल का परिवार मोटा मोटी ठिक ठाक चल रहा था. लेकिन उसके घर कोई उत्सव बिलकुल फिका सा रह जाता. दिवाली हो या भाइदूज या दुर्गा मेला उसके लिए तो सब कुछ फिका? उत्सव का रंग उल्लास उसके घर कभी हो ही नहीं पाता था. एक जरूरतें पूरी करो तो दूसरे के लिए मुहँ ताकते रह जाओ. ग़रीबी उपर से आर्थिक तंगहाली तो मानो रामलाल के घर किसी उत्सव का उल्लास मनाने से रोक देता हो? किसी ग़रीब के घर किसी उत्सव मे मिठाईयां ही खरीद हो जाए तो वही उनके लिए जशन होता था. रामलाल इतनी तंगहाली मे भी अपने ढाई साल के छोटे बेटे करण और बेटी दिप्ति के लिए त्योहारों में मिठाईयाँ जरूर लाता था. कभी त्याोहारो के सीजन मे आटो चलाने मे ज्यादा कमाई होती तो अपनी बीबी उमा के लिए नई साड़ि और अपने बच्चों के लिए भी नए कपड़े जरूर लाता था. खुद पुराने कपड़े को ही धूलकर इस्तरी कराकर त्याहारों मे पहनकर काम चला लेता था. उसकी बीबी टोकती भी तो वह हँसकर समझाता की अगले किसी त्योहार मे मै अपने लिए भी नए कपड़े लूँगा. तब जाकर कहीं उसकी बीबी और बच्चे घर पर त्याोहारों का उत्सव मनाते थे.

दिप्ती के दशवीं के एगजाम नजदिक ही थे वो पूरे जोर शोर से मैट्रिक परीक्षा की तैयारी मे लगी थी. रामलाल और उमा भी उसे प्रोत्साहन देते की अच्छे नम्बरों से पास करना. इस प्रकार मानों दिप्ती के सपने को पंख लग जाते और वो खूब मेहनत के साथ इम्तहान की तैयारी मे लगी रहती. उसका छोटा भाइ करण अभी ढाई साल का ही था इस लिए वह घर पे हि रहता खेलता कूदता और छोटे बच्चों के संग थोड़ि बहुत पढ़ना सीख रहा था. एक दिन दिप्ति एडमिट कार्ड लेने अपने स्कूल गई थी उसकी माँ भी काम पर गई थी. छोटा भाई घर पर ही था और रामलाल आटो लेकर सबारी के लिए रोजाना की तरह सड़कों पर अपनी रोजी रोटी के लिए निकल चुका था. ईधर दिप्ति इम्तहान के एडमिट कार्ड लेकर स्कूल से अपने घर पहुँची ही थी की माँ को छाति पिटकर रोते हुए देखा. आसपास लोगों की भीड़ इकठ्टी थी उसी मे से किसी ने रोते हुए दिप्ति से कहा की सड़क दुर्घटना मे रामलाल मारा गया. बस इतना सुनते ही वह भी दहाड़े मारकर जोड़ जोड़ से रोने लगी. दिप्ति उसका छोटा भाई करण और उसकी माँ उमा रामलाल के शव से लिपटकर रोते रोते बदहबास हो जा रहे थे आसपास के लोग सांत्वना देकर समझाते की होनी को भला कौन टाल सकता? उसके बाद पड़ोस के लोगों ने मिलकर रिति रवाज़ के साथ उसका अतिंम संस्कार कर दिया.

रामलाल के असमायिक मृत्यु के बाद उमा पर दुखों का पहाड़ टूट पर, दिप्ति के सपने ध्वस्त होते जा रहे थे. भला हो भी ना कैसे? पूरे परिवार को संभालने वाला आटो चालक रामलाल के कमाई से ही घर चलता था. उमा झाड़ू पोछा करके जो थोड़ा बहुत कमा लेती उसे वह बच्चों की देखरेख और पढाई पर खर्च करता था. पति के मृत्यु के बाद उमा भी कुछ दिनों तक सदमे मे रही घरों मे खाना बनाने भी नहीं जाती थी. घर चलाना मुशकिल हो रहा था. जो बचे खुचे पैसे थे ओ भी दो तीन महिने मे ही खर्च हो गए. ईधर दिप्ती के इम्तहान हो चुके थे अब उसका दशवीं का रिजल्ट भी आ चुका था. फस्ट डिविजन से पास हुई थी और बेहद खुश भी थी और आगे की पढाई के लिए सोचे भी जा रही थी. उसने अपनी माँ से बारहंवी मे एडमिशन करा देने की बात कही तो उसकी माँ उमा झल्ला उठी गुस्से मे बोली यहाँ घर चलाना मुशकिल हो रहा और तुझे पढ़ने की परी है? कोई अच्छा स लड़का देखके तुम्हारी शादी करबा देता हूँ बस अब ससुराल जाकर ही पढ़ना हाँ बस?

दिप्ती अपनी माँ को समझा बुझाकर ओपन बोर्ड से बारहंवी मे किसी तरह एडमिशन करवाई. पढाई का खर्चा निकालने के लिए उसने शापिंग माल मे सेल्स गर्ल का काम पकर ली. रास्ते मे कइ बार लड़के उसे छेड़ते भी तो वह हिम्मत से काम लेती. दिप्ति प्रतियोगिता परीक्षा के तैयारी मे भी लगी थी इधर बारहवीं के रिजल्ट मे भी दिप्ती फस्ट डिविजन से पास की थी. उसके सपनो के फिर पंख लगने लगे. वो रेलवे, बैंकिग सभी परीक्षाओं के फार्म भरती और अपना किस्मत आजमाती फिरती. शुरूआत मे असफलता ही हाथ लगी उपर से लोगों के ताने बाने और माँ की चेतावनी की अब जल्दी से शादी कर ले. इन संघर्ष की दास्तां मे मानो दिप्ति तो कोई उत्सव मनाना ही भूल गई थी. उसे हर पल चिंता होती की कैसे वह प्रतियोगिता परीक्षा पास करेगी और फिर आगे भी पढाई कर पाएगी? आखिरकार उमा ने दिप्ति की शादी भी तय कर दी थी और दिप्ति बहुत उदास रहने लगी थी. कई परीक्षाओं के फाइनल रिजल्ट आने बांकी थें.
शादी के दिन नजदिक थे आज दिप्ती के घर हल्दी का रस्म था और उसके चेहरे पर कोइ खुशी नहीं बस उदास मन से हल्दी के रस्म मे बैठी थी. पड़ोस के लोग थोड़े से आपसी रिशतेदार शादी की तैयारी मे लगे थे. ईधर दिप्ति के मन मे संघर्ष की दास्तां ने शादी के उत्सव को फिका कर दिया था मानो अंदर से वो टूट चुकी हो. तभी अचानक डाकिया उसके घर आया जो डाक दे गया. हल्दी के रस्म के बाद लोग बाग चाय पानी कर रहे थे और इधर दिप्ती ने जैसे ही डाक वाला लिफाफा खोला तो खुशी से उछल पड़ी. आखिरकार उसका चयन बैंक क्लर्क में हो गया था और आज उसी की ज्वाइनिंग लेटर आई थी. दिप्ति ने जैसे ही अपनी माँ और सहेलियों से भी ये बात बताई की सभी खुशी से झूम उठे. ढोल बाजे वाले को पता चला तो वे सब भी झूम झूमकर बैंड बजाने लगे. मानो दिप्ति के संघर्ष की दास्तां के उत्सव की रौनक बढ़ गई थी. लोग उत्साहित होकर एसे झूम रहे थे मानो मृत्क रामलाल के आत्मा को भी आज अपने बेटी के संघर्ष की दास्तां के उत्सव की गूँज सुनाई पर रही हो.

लेखक- किशन कारीगर
(मूल नाम- डाॅ. कृष्ण कुमार राय)
(©काॅपीराईट)

(नोट: कहानी प्रतियोगिता के लिए मौलिक एवं अप्रकाशित रचना)

Competition entry: उत्सव - कहानी प्रतियोगिता
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कवि परिचय:- किशन कारीगर ( मूल नाम- डाॅ. कृष्ण कुमार राय). जन्म:- 5 मार्च 1983ई.(कलकता मे)। शिक्षाः- पीएच.डी(शिक्षाशात्र), एमएमसी(मास कम्युनिकेशन),एम्.एड,बी.एड, पि.जी.डिप्लोमा(रेडियो प्रसारण) । मैथिली/हिंदी/ बांग्ला मे किशन कारीगर उपनाम से…

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